
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को बिश्केक पहुंचे. उज़्बेकिस्तान की अपनी राजकीय यात्रा पूरी करने के बाद, पीएम मोदी अपनी दो देशों की यात्रा के अगले चरण के तहत 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. प्रधानमंत्री मोदी, किर्गिज़ राष्ट्रपति सादिर झापारोव के निमंत्रण पर किर्गिज़ राजधानी पहुंचे. 26वें SCO शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के नेता क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करेंगे और समूह के भीतर सहयोग को और मजबूत करने के तरीकों पर विचार-विमर्श करेंगे.

बिश्केक में पीएम मोदी का रेड कार्पेट पर जोरदार स्वागत हुआ.
10 सदस्यों वाले SCO की स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी. बाद में 2017 में भारत और पाकिस्तान इसके पूर्ण सदस्य बने, फिर 2023 में ईरान और 2024 में बेलारूस इसमें शामिल हुए. माना जा रहा है कि पीएम मोदी इस दौरान कुछ नेताओं से द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे. सबसे खास बात ये है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का सामना यहां पीएम मोदी से कई बार होगा. हालांकि, दोनों के बीच किसी भी तरह की बातचीत की संभावना न के बराबर ही है. देखना है कि शहबाज शरीफ इस समिट में भी भारत पर ही आरोप लगाने में लगे रहते हैं या फिर एससीओ को मजबूत करने में अपनी भागीदारी निभाते हैं.
चीन का क्या मूड
बहरहाल, प्रधानमंत्री के आगमन पर भारतीय समुदाय के लोगों और वहां के निवासियों में उत्साह देखा गया. प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बारे में बात करते हुए, बिश्केक में रहने वाले भारतीय नागरिक दीपक जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री का आगमन विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए “सम्मान और बहुत बड़े सौभाग्य” की बात है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी रविवार को किर्गिस्तान पहुंच गए. सरकारी समाचार एजेंसी ‘शिन्हुआ’ की रिपोर्ट के अनुसार, किर्गिस्तान पहुंचने पर शी ने कहा, “मैं SCO बिश्केक शिखर सम्मेलन में शामिल होने और सभी पक्षों के साथ मिलकर SCO के 25 साल के विकास के अनुभवों पर फिर से विचार करने, सहयोग की योजनाओं पर चर्चा करने और संगठन के भविष्य को आकार देने के लिए उत्सुक हूं.” शी ने कहा कि वह “संगठन के निरंतर नए विकास को बढ़ावा देने” के लिए सभी पक्षों के साथ मिलकर काम करने को लेकर उत्साहित हैं.

शी जिनपिंग भी अपनी पत्नी के साथ बिश्केक पहुंच चुके हैं
भारत से बढ़ रही नजदीकी
31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाले इस शिखर सम्मेलन के दौरान, शी के कई अन्य SCO नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करने की भी उम्मीद है. सितंबर का महीना शी के लिए व्यस्त रहने की उम्मीद है. उनके 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भाग लेने और उसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर बैठक के लिए अमेरिका की यात्रा करने की संभावना है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने मंगलवार को बीजिंग में सीमा विवाद पर ‘विशेष प्रतिनिधि’ (SR) तंत्र की 25वीं बैठक की. दोनों देशों के बीच आठ बिंदुओं पर सहमति बनी और वे सीमा के निर्धारण और सीमा प्रबंधन पर “जल्द और ठोस परिणाम” (Early and Substantial Harvest) की दिशा में बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए. ‘विशेष प्रतिनिधि’ (SR) तंत्र को एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है, जिसका उद्देश्य 3,488 किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा से जुड़े विवादों और कई द्विपक्षीय मुद्दों पर बार-बार होने वाले तनाव का व्यापक समाधान खोजना है.
भारत किस मंशा से गया
बिश्केक में मौजूद एक स्वतंत्र रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘क्रॉसरोड्स सेंट्रल एशिया’ के सह-संस्थापक और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर शायरबेक जुरायेव ने कहा कि यह समिट ऐसे समय में हो रही है जब सेंट्रल एशिया पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. क्षेत्र के देशों के बीच आपसी संबंध बेहतर हो रहे हैं और बाहरी साझेदार ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी और मिनरल रिसोर्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. जुरायेव ने चेतावनी दी कि भारत और किर्गिस्तान के बीच बढ़ते सहयोग को चीन या रूस का मुकाबला करने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. जुरायेव ने कहा कि मोदी की यात्रा के ज्यादा ठोस नतीजे दोनों देशों के बीच बातचीत से निकलने की उम्मीद है, क्योंकि मध्य एशियाई देश अपनी बाहरी साझेदारियों में विविधता लाना चाहते हैं और ज्यादा निवेश आकर्षित करना चाहते हैं.उन्होंने ईमेल के ज़रिए PTI को बताया, “बिश्केक चीन या रूस के मुकाबले भारत को एक संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर नहीं देख रहा है, और इस यात्रा को उस नज़रिए से देखने पर यहां अच्छा असर नहीं पड़ेगा.”
भारत को क्या ध्यान देना चाहिए
नई दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च स्कॉलर अनुसूआ गांगुली ने कहा कि मध्य एशिया के साथ भारत के जुड़ाव में इस क्षेत्र की भारत से भौगोलिक दूरी की समस्या का भी समाधान किया जाना चाहिए. गांगुली ने कहा, “सबसे बड़ी बाधाओं में से एक भारत और मध्य एशियाई गणराज्यों के बीच भौगोलिक दूरी है.” उन्होंने आगे कहा कि चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) कनेक्टिविटी के वैकल्पिक रास्ते देते हैं. उन्होंने कहा, “अब प्राथमिकता इन रास्तों को व्यावसायिक रूप से फायदेमंद, भरोसेमंद और कुशल बनाने की होनी चाहिए.” 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल INSTC, जो स्वेज नहर से गुज़रे बिना ईरान के रास्ते मुंबई को सेंट पीटर्सबर्ग से जोड़ता है, हाल के समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है. गांगुली ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के जारी रहने और इलाके में बदलते हालात की वजह से मध्य एशियाई देशों को अपनी बाहरी साझेदारियों में विविधता लाने की जरूरत महसूस हुई है. इससे भारत को फार्मास्यूटिकल्स, IT, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, मानव-संसाधन विकास और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में अपनी मज़बूत आर्थिक मौजूदगी बनाने का मौका मिला है.
रूस भी पूरी तैयारी के साथ
रूस इस मौके पर अपनी ताकत दिखाने और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कर सकता है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पूरी कोशिश होगी कि इस समिट के जरिए दुनिया में संदेश जाए कि रूस-भारत-चीन मिलकर बड़े निवेश और बड़ी योजनाओं पर काम कर सकते हैं. इस बारे में सभी देशों ने काफी चर्चा की होगी और भविष्य की योजनाओं पर यहां ऐलान संभव है. यहां से रूस और चीन ईरान के पक्ष में भी माहौल जरूर बनाना चाहेंगे, मगर ये शायद घोषणा-पत्र का हिस्सा ना बने.उम्मीद है कि पीएम मोदी और शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन के दौरान SCO नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे, जिनमें किर्गिज़ राष्ट्रपति झापारोव और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शामिल हैं.
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