
भारत में चीनी के दाम अचानक से ज्यादा बढ़ गए हैं. जब दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारे आने वाले हैं, इन बढ़े हुए चीनी दामों ने कई घरों का बजट बिगाड़ा है. इस बिगड़ते बजट की वजह से लोगों में आक्रोश भी है. इस आक्रोश ने एक थ्योरी को भी जन्म दिया है- सरकार की एथेनॉल नीति की वजह से भी देश में चीनी की कमी हो गई और दाम बढ़ गए.
अब यह थ्योरी पढ़ने में जितनी सरल दिखाई दे रही है, असलियत इससे थोड़ी अलग है. यहां आपको बिल्कुल आसान भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं कि देश में अचानक से चीनी के दाम क्यों बढ़ गए हैं, कितने बढ़ गए हैं. आखिर में यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि सरकार की एथेनॉल नीति को आखिर क्यों बढ़े चीनी दामों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
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देश में कब और कैसे बढ़े चीनी के दाम?
भारत सरकार के आंकड़े डीकोड करने पर पता चलता था कि धीरे-धीरे देश में चीनी के दाम बढ़े हैं. इस साल 21 जुलाई को चीनी की औसत खुदरा कीमत 45 रुपये किलो थी. फिर 10 दिन बाद यानी कि 31 जुलाई को चीनी की कीमत 50 रुपये किलो तक पहुंच गई. यानी कि सिर्फ 10 दिनों में 5 रुपये चीनी महंगी हुई. अब 21 अगस्त आते-आते चीनी की कीमत 65 रुपये किलो पहुंच चुकी है.
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि सिर्फ एक महीने में ही चीनी के दामों में 20 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है. किसी भी सूरत में इसे सामान्य नहीं बताया जा सकता और इसी वजह से बढ़े दामों को लेकर पैनिक जैसी स्थिति भी दिख रही है.
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अब सवाल उठता है कि ऐसा क्या हो गया कि चीनी के दाम एक महीने के अंदर 20 रुपये तक बढ़ गए. इसका एक बड़ा और स्पष्ट कारण है चीनी का कम बनना. इसके ऊपर पिछले साल का जो चीनी का स्टॉक था, वो भी ज्यादा नहीं रहा.
पहले क्या अनुमान था, असल तस्वीर क्या निकली?
Indian Sugar & Bio-energy Manufacturers Association (ISMA) एक चीनी मिलों का संगठन है. इस संगठन में चीनी बनाने वाले मिल तो शामिल होते हैं, साथ में एथेनॉल और बिजली वाले निजी मिल भी रहते हैं.इसी संगठन ने नवंबर 2025 में एक अनुमान लगाया था. अनुमान यह था कि 2025-26 में देश में 343.5 लाख टन तक तो चीनी बन ही जाएगी. लेकिन फिर हकीकत सामने आई और चीनी उत्पादन सिर्फ 309 लाख टन रहा. यहां भी जो ये कम चीनी उत्पादन हुआ, इसका 30 लाख टन हिस्सा एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल हो गया.

अब जितना अनुमान लगाया, उससे 30.5 लाख टन चीनी कम बनी. ऐसे में कम उत्पादन ज्यादा मांग, यानी कि चीनी का महंगा होना. अगर चीनी की स्टॉक स्थिति को भी समझ लिया जाए तो यह तस्वीर और ज्यादा साफ हो सकती है. इस सीजन के शुरुआत में देश के पास 50 लाख टन तो पुरानी चीनी पड़ी थी. ये पिछले साल की 50 लाख टन चीनी है. अब इस साल 279 टन लाख चीनी और गई तो कुल आंकड़ा 329 टन चीनी बैठा. यहां भी करीब-करीब 280 लाख टन चीनी की खपत होगी और आठ लाख टन चीनी का निर्यात हो जाएगा. ऐसे में आखिर में देश के पास बचेगी 41 लाख टन चीनी.
अब यह 41 लाख टन चीनी ही चिंता का सबब है. इंडस्ट्री के एक्सपर्ट बताते हैं कि 2016-17 में इससे पहले देश के पास 39.4 लाख टन चीनी बची थी. ऐसे में इतने सालों बाद फिर ऐसी स्थिति बनी है.
बारिश ने क्या सबकुछ बिगाड़ दिया?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में इस साल चीनी कम इसलिए बनी क्योंकि बारिश ने काफी नुकसान कर दिया. असल में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में पिछले साल सितंबर-अक्टूबर में काफी बारिश हुई. ऐसे में गन्ने के खेतों में जबरदस्त पानी भर गया और धूप भी कम पड़ी. अब बारिश और कम धूप का सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ा और उसमें चीनी की मात्रा कम रह गई.
आंकड़े भी इसी बात की गवाही दे रहे हैं. ISMA ने जितने भी अनुमान लगाए थे, वो सभी गलत साबित हो गए. उदाहरण के लिए पहले ISMA ने कहा था कि देश को महाराष्ट्र से 130 लाख टन चीनी मिल जाएगी, लेकिन असल में मिली सिर्फ 99.2 लाख टन चीनी. इसी तरह कर्नाटक को लेकर कहा गया कि कम से कम 63.5 लाख टन चीनी मिलेगी, लेकिन असल आंकड़ा रहा मात्र 47.2 लाख टन. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से उम्मीद लगी कि यहां से 103.2 लाख टन चीनी मिल जाएगी, लेकिन मिली सिर्फ 89.7 लाख टन.
वैसे यूपी को लेकर तो एक और बात कही जा रही है. रेड रॉट बीमारी और टॉप शूट बोरर कीड़े ने गन्ने की फसल को काफी बर्बाद किया था. उसका सीधा असर भी उत्पादन पर पड़ गया.
अब जानकार बता रहे हैं कि चीन का उत्पादन तो कम हुआ ही, इसके साथ-साथ लोगों ने खुद से काफी कुछ मान भी लिया. अप्रैल-जून के बाद जब जुलाई में अचानक से चीनी के दाम बढ़े, इसका एक कारण लोगों का परचेसिंग बिहेवियर भी रहा. लोगों को लगा कि अगले साल भी चीनी शायद कम ही बनने वाली है. ऐसे ही डर का माहौल कारोबारियों में भी बन गया जिन्हें लगा कि 2026-27 में गन्ने की पैदावार भी कम हो सकती है.
अब यह पूरी एक क्रोनोलॉजी है. ग्राहक डरा, व्यापारी डरा और फिर इस वजह से स्टॉक रखने वालों और बड़ी कंपनियों ने ज्यादा चीनी खरीदना शुरू कर दिया. इसी तरह अगस्त में कुछ मिलों ने चीनी बेचना भी बंद कर दिया, उन्हें लगा कि आगे चलकर तो दाम बढ़ जाएंगे. इसी वजह से चीनी के दाम अचानक से बढ़ गए. इसे ऐसे कह सकते हैं- चीनी पहले से कम थी, आगे उसके और ज्यादा कम होने का डर सताया, इस डर की वजह से लोगों ने पहले से खरीदना शुरू कर दिया और अंत में इसी कारण से चीनी के दामों में तेजी आ गई.
एथेनॉल को जिम्मेदार क्यों नहीं ठहरा सकते?
अब लोगों को ऐसा लगता है कि सरकार ने क्योंकि एथेनॉल बनाने पर जोर दिया है, इस वजह से चीनी के दाम भी बढ़ गए हैं. धारणा तो यहां तक बनी है कि जो चीनी शायद आम लोग इस्तेमाल करते, उसकी बड़ी मात्रा एथेनॉल बनाने में चली गई है. लेकिन यह धारणा है, सोशल मीडिया पर चलने वाली एक डिबेट का हिस्सा है. अगर सिर्फ आंकड़ों में बात करें तो तस्वीर कुछ अलग निकलती है.
इसे ऐसे समझ सकते हैं- इस साल भारत में चीनी से 30 लाख टन ऐथनॉल बनी है. लेकिन एक सच्चाई तो यह भी है कि इस साल चीनी का उत्पादन 34.5 लाख टन कम रहा है. एक और बात समझने लायक है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तेल कंपनियों को 810.67 करोड़ लीटर एथेनॉल दिया गया था. यहां बड़ी बात यह है कि गन्ने से बना एथेनॉल सिर्फ 259.24 करोड़ लीटर था. यानी कि सिर्फ 32 फीसदी. बाकी जो 551.43 करोड़ लीटर एथेनॉल था, वो तो अनाज से बना था, यानी कि 68 फीसदी.
यहां भी मक्के से 288 करोड़ लीटर एथेनॉल बना, FCI के चावल से 207.1 करोड़ लीटर एथेनॉल बना, टूटे या खराब अनाज से 56.33 करोड़ लीटर एथेनॉल बन गया. ऐसे में सिर्फ यह कह देना कि एथेनॉल की वजह से ही चीनी महंगी हो गई, यह सही तस्वीर नहीं है. एथेनॉल कई दूसरे अनाज से भी बन रहा है.
जानकार यह जरूर मानते हैं कि आने वाले दिनों में मिलों को गन्ने के रस और B-हेवी मोलासेस से एथेनॉल बनाने से रोक सकती है क्योंकि सरकार की भी प्राथमिकता यही है- देश में चीनी की कमी नहीं होनी चाहिए.





