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सुप्रीम कोर्ट की तीन दिवसीय विशेष लोक अदालत शुरू, आपसी सहमति से पुराने मामलों के समाधान पर जोर | Supreme Court three-day special Lok Adalat begins emphasis on resolving old cases through mutual consent 



नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए 21 अगस्त से तीन दिवसीय विशेष लोक अदालत की शुरुआत कर दी है. ‘समाधान समारोह-2026′ के अंतिम चरण के रूप में आयोजित यह विशेष लोक अदालत 21, 22 और 23 अगस्त तक चलेगी. इसका उद्देश्य ऐसे मामलों का समाधान तलाशना है जिन्हें आपसी सहमति और मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यह पहल सहभागी न्याय को बढ़ावा देने और लोगों तक न्याय को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

सहमति के आधार पर होंगे मामले शामिल

विशेष लोक अदालत में केवल उन्हीं मामलों को लिया जा सकता है जिनमें दोनों पक्ष समाधान के लिए तैयार हों. सुप्रीम कोर्ट की 18 अगस्त की अधिसूचना के अनुसार सूचीबद्ध मामलों के अलावा वे मामले भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं जिन्हें अदालत संदर्भित करे या पक्षकार अपने वकीलों अथवा एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) के माध्यम से सहमति के साथ प्रस्तुत करें.

पक्षकार और उनके अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट परिसर में उपस्थित होकर या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी कार्यवाही में भाग ले सकते हैं. इसके लिए अदालत ने विशेष बेंचों और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था भी की है.

किन मामलों पर रहेगा विशेष फोकस?

इस विशेष लोक अदालत में ऐसे विवादों को प्राथमिकता दी जा रही है जिनमें समझौते की संभावना मौजूद है. इनमें पारिवारिक और वैवाहिक विवाद, बैंकिंग मामले, चेक बाउंस से जुड़े प्रकरण, उपभोक्ता और RERA विवाद, भूमि अधिग्रहण, संपत्ति कर, किराया एवं बेदखली, सेवा और श्रम विवाद, मोटर दुर्घटना मुआवजा तथा कर संबंधी मामले शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे मामलों में आपसी सहमति से समाधान होने पर दोनों पक्षों का समय और संसाधन बच सकते हैं.

धार्मिक विवादों में नहीं बनी सहमति

इस विशेष पहल के दौरान वाराणसी के ज्ञानवापी विवाद, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद और संभल शाही जामा मस्जिद विवाद जैसे संवेदनशील मामलों में भी समझौते की संभावना तलाशने का प्रयास किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को समाधान प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ने का अवसर दिया था.

हालांकि इन मामलों से जुड़े हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने कथित तौर पर मध्यस्थता या लोक अदालत के माध्यम से समाधान के प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताई. उनका कहना है कि इन विवादों में धार्मिक स्थलों की स्थिति, स्वामित्व और संवैधानिक प्रश्न जुड़े हैं, जिनका अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए.

लंबित मामलों का बोझ कम करने की कोशिश

‘समाधान समारोह-2026′ का व्यापक उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों की संख्या को कम करना और ऐसे विवादों का जल्द निपटारा करना है जिनमें समझौते की कानूनी गुंजाइश मौजूद है. CJI सूर्य कांत की अगुवाई में शुरू की गई इस पहल में किफायती, त्वरित और सहमति आधारित न्याय पर विशेष जोर दिया गया है.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में मामलों का समाधान लोक अदालत के माध्यम से होता है तो इससे न्याय व्यवस्था पर बोझ कम होगा और लोगों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे. आने वाले तीन दिनों में इस विशेष अभियान के परिणामों पर सभी की नजर रहेगी.

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