
Trending Viral Video: एक आरामदायक लाइफस्टाइल, पक्की नौकरी और शानदार सुख-सुविधाओं से भरे घर को छोड़ कोई ऐसी जगह क्यों जाएगा, जहां न सड़क सही हो और न वक्त पर नाव मिले? 15 साल पहले स्विट्जरलैंड की सैंड्रा लावी गोजकोविक (Sandra Lavie Gojkovic) एक छोटे से इरादे के साथ भारत आईं…बस किसी को थोड़ी मदद देने. उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि, बंगाल के सुंदरबन का एक तूफानी द्वीप उनका इंतजार कर रहा है, जहां न कोई बड़ा एनजीओ कदम रखता था और न ही बच्चों के पास पढ़ाई का कोई ठिकाना था. एक वक्त ऐसा भी आया जब जानलेवा मलेरिया ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया था, लेकिन इस विदेशी महिला का जिद्दी दिल हार मानने को तैयार नहीं था. पढ़ें पूरी खबर.
जब बिना किसी प्लान के पहुंचीं सैंड्रा (When Sandra Arrived Without a Plan)
15 साल पहले सैंड्रा लावी गोजकोविक बंगाल के एक बेहद पिछड़े इलाके में आईं और सुंदरबन के एक दूरदराज द्वीप पर पहुंची और वहां बच्चों के भविष्य को नया रास्ता दिया. बिना किसी प्लान के पहुंची सैंड्रा ने यहां के लोगों की तकलीफों को समझा और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आज पूरे सुंदरबन की तस्वीर बदल रही है.

तस्वीर की शुरुआत हमेशा किसी बड़े बजट या प्लान से नहीं होती. कई बार कुछ बड़े बदलाव बहुत शांति से, चुपचाप होते हैं…इस बात को सैंड्रा लावी गोजकोविक ने सच कर दिखाया है. सफर शुरू हुआ कोलकाता से ढाई घंटे की ट्रेन से, फिर ज्वार-भाटे के भरोसे चलने वाली नाव का सफर तय करके सैंड्रा इस द्वीप पर पहुंची थीं. ये एक ऐसा इलाका था जहां अक्सर साइक्लोन आते रहते हैं और ज्यादातर रेस्क्यू टीम यहां जाने से कतराती थीं.
न नाम की चाह, न कोई बड़ा बजट (Swiss Woman Viral Video)
सैंड्रा के पास कोई बड़ा प्लान या फंड नहीं था, वो बस लोगों की बात सुनना चाहती थीं. गांव वालों ने बताया कि उनके बच्चों के पास पढ़ने के लिए कोई पक्का ठिकाना नहीं है, क्योंकि सरकारी स्कूलों में मास्टर साहब अक्सर गायब रहते थे. बस यहीं से सैंड्रा ने एक प्राइमरी स्कूल की नींव रखी, जो आगे चलकर बड़ा बदलाव साबित हुआ. सफर की शुरुआत आसान नहीं थी और काम शुरू होने से पहले ही सैंड्रा को गंभीर मलेरिया हो गया था.

इलाज के लिए उन्हें वापस अपने देश जाना पड़ा, लेकिन ठीक होते ही उन्होंने अगले ही दिन भारत का टिकट कटा लिया. डॉक्टरों ने इसे बेवकूफी भरा फैसला बताया, लेकिन सैंड्रा का इरादा पक्का था. उन्होंने अपने परिवार से छिपाकर इस स्कूल को बनाया, दीवारों के रंग से लेकर बच्चों के बर्तन तक सब कुछ खुद खरीदे. उनका सपना तब सच होता हुआ नजर आया, जब पहले दिन बच्चों ने स्कूल में एंट्री ली.
स्विस महिला ने कैसे बदली लोगों की किस्मत? (Change Beyond the Classroom)
शुरुआत में बच्चों के माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने से झिझक रहे थे, लेकिन लोकल टीचर्स ने घर-घर जाकर उनका भरोसा जीता. आज उन लोकल टीचर्स की पहल के बदौलत बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट 50 परसेंट से बढ़कर 100 परसेंट हो चुका है. इतना ही नहीं, 30 गांवों के 20 हजार से ज्यादा लोगों को बाल विवाह, मानव तस्करी और घरेलू हिंसा से बचाने के लिए जागरूक किया गया है.
इसके साथ ही महिलाओं को सिलाई और हुनर सिखाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की हर सभंव कोशिश की गई. सैंड्रा का कहना है कि, पूरा कामकाज आज लोकल टीम ही संभालती है.
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