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रेलवे के फायरमैन से भोजपुरी सिनेमा के ‘पितामह’ तक, 500 फिल्मों में किए शानदार रोल, कभी बने आशा पारेख के ससुर तो कभी विनोद खन्ना के पापा | Asha Parekh father in law to Vinod Khanna father this actor did 500 films his journey from Railway fireman to Bhojpuri cinema Pitamah



नई दिल्ली:

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हैं जिनकी जिंदगी फिल्मी कहानियों से भी ज्यादा रोमांचक रही है. ऐसा ही एक नाम है नजीर हुसैन, जिन्हें दो बीघा जमीन, देवदास, नया दौर, साहिब बीबी और गुलाम, ज्वेल थीफ और अमर अकबर एंथनी जैसी क्लासिक फिल्मों में पिता, चाचा या दादा के रोल में देखा गया. लेकिन उनकी असली कहानी रेलवे के फायरमैन से शुरू होती है, जो विश्व युद्ध, आजादी की लड़ाई और सुभाष चंद्र बोस के प्रभाव से गुजरकर बड़े पर्दे पर चमकी.

नजीर हुसैन को लेकर एक समय ऐसा आया कि वह अधिकतर फिल्मों में नजर आने लगे थे. फिल्मों में बुजुर्ग का रोल उनके ही हिस्से में जाता था. उनकी एक्टिंग में वो कलाकारी थी कि वह हंसा भी सकते थे और पल भर में आंखें नम कर देते थे.

रेलवे के फायरमैन से सिनेमा में 500 फिल्मों तक का सफर

नजीर हुसैन का जन्म मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए उन्होंने रेलवे में फायरमैन का काम शुरू किया. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध ने उनकी जिंदगी बदल दी. ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होकर वे मलेशिया और सिंगापुर भेजे गए, जहां युद्धबंदी बन गए. कैद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने आजाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल होने का फैसला किया और भारत की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया. यह दौर उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला.

आजादी के बाद नजीर हुसैन को नौकरी ढूंढने में काफी संघर्ष करना पड़ा. लेकिन उनकी स्टेज परफॉर्मेंस ने उन्हें नई राह दिखाई. न्यू थिएटर्स के बी.एन. सरकार उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें कोलकाता ले गए. वहां वे बिमल रॉय से मिले. दोनों ने मिलकर ‘पहला आदमी’ फिल्म बनाई, जो नजीर हुसैन के खुद के आईएनए अनुभव पर आधारित थी. इसमें उन्होंने अभिनय के साथ कहानी और संवाद भी लिखे. इस फिल्म से उनके स्टारडम की शुरुआत हुई.

लगभग 500 फिल्मों के करियर में नजीर हुसैन ने हिंदी सिनेमा में ‘कैरेक्टर आर्टिस्ट’ के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई. वे अक्सर सौम्य, गरिमापूर्ण और विश्वसनीय पिता या बुजुर्ग के रोल में नजर आते थे. देव आनंद के साथ उनकी जोड़ी खास तौर पर लोकप्रिय रही. ‘दो बीघा जमीन’ में किसान के रोल से लेकर ‘अमर अकबर एंथनी’  तक, उन्होंने हर किरदार में गहराई भर दी. 

भोजपुरी सिनेमा के कहलाए पितामह

हिंदी सिनेमा के अलावा नजीर हुसैन का योगदान क्षेत्रीय सिनेमा में भी यादगार है. उन्हें भोजपुरी सिनेमा का ‘पितामह’ माना जाता है. 1963 में उन्होंने ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ फिल्म बनाई, जो भोजपुरी की पहली फिल्म थी. इस फिल्म ने पूरे क्षेत्र में सिनेमा की नींव रखी और आज भी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री इसी की वजह से फल-फूल रही है.

नाजिर हुसैन का निधन 1987 में हुआ, लेकिन उनकी छवि आज भी भारतीय सिनेमा की नींव का हिस्सा बनी हुई है. वे उन गिने-चुने कलाकारों में शामिल थे जिन्होंने न सिर्फ अभिनय किया बल्कि फिल्मों की कहानी को भी आकार दिया.





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