खबर

सच्चे दोस्त को सुनाएं ये 62 साल पुराना गाना, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने बनाया ऐसा फ्रेंडशिप सॉन्ग, मोहम्मद रफी की आवाज ने नहीं होने दिया फीका | Laxmikant Pyarelal composed 7 minute 24 second dosti mohd rafi song chahunga main tujhe saanjh savere on friendship day   



नई दिल्ली:

दोस्ती की जब बात आती है तो बॉलीवुड की मशहूर कंपोजर की जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का नाम जरुर आता है, जिन्होंने साथ मिलकर 2800 से ज्यादा गानों को कंपोज किया. इनमें “चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, धीरे-धीरे…” या फिर “हंसता हुआ नूरानी चेहरा…” शामिल है, जो आज भी जब बजता है, तो दोनों संगीतकारों की याद आती है, जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को उसका सबसे सुरीला ‘स्वर्ण युग’ दिया. लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर और प्यारेलाल के साथ मिलकर उन्होंने लगभग साढ़े तीन दशकों तक भारतीय सिनेमा पर राज किया. वहीं उनका दोस्ती का गाना आज भी लोग रोमांटिक सॉन्ग समझ लेते हैं. 

दोस्ती का गाना, जिसे समझते हैं रोमांटिक सॉन्ग

हम बात कर रहे हैं 1964 में आई फिल्म दोस्ती के गाने चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे की, जिसे मोहम्मद रफी ने आवाज दी थी. वहीं लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कंपोज किया था. जबकि मजरूह सुल्तानपुरी ने इसके बोल लिखे थे. यह गाना 7 मिनट का था. यह फिल्म लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए करियर का सबसे बड़ा ब्रेकिंग प्वॉइंट बना और उन्हें करियर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड बना. वहीं आज यह गाना पॉपुलर तो है. लेकिन कई लोग इसे दोस्ती का नहीं बल्कि रोमांटिक सॉन्ग समझ लेते हैं. गाने के लिरिक्स कुछ इस प्रकार हैं…

चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे
फिर भी कभी अब नाम को तेरे
आवज मै ना दूँगा आवाज मै ना दूँगा
चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे
फिर भी कभी अब नाम को तेरे
आवज मै ना दूँगा आवाज मै ना दूँगा
चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…

ये भी पढे़ं- पहाड़ी धुन से RD बर्मन ने बनाया कल्ट सॉन्ग, किशोर दा और राजेश खन्ना की जुगलबंदी ने 56 साल पुराने गाने को किया अमर

संघर्ष में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की दोस्ती

लक्ष्मीकांत के पिता के एक संगीतकार मित्र ने सलाह दी, “बच्चों को संगीत सिखाओ, पेट पालने का कोई न कोई जरिया तो बन ही जाएगा.” बस, यहीं से मात्र दस वर्ष की उम्र में लक्ष्मीकांत के हाथों में मैंडोलिन आ गया. उन्होंने उस्ताद हुसैन अली और बाद में बाल मुकुंद इंदोरकर से इसकी बारीकियां सीखीं. उन्होंने ‘भक्त पुंडलिक’ (1949) जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में अभिनय भी किया. लक्ष्मीकांत की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब कोलाबा के रेडियो क्लब में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान करीब 11 साल के इस लड़के को मैंडोलिन बजाते हुए खुद सुर कोकिला लता मंगेशकर ने देखा. लता मंगेशकर उस अद्भुत वादन को सुनकर दंग रह गईं. उन्होंने तुरंत लक्ष्मीकांत की पारिवारिक स्थिति जानी और शंकर-जयकिशन, एसडी बर्मन और नौशाद जैसे तत्कालीन दिग्गज संगीतकारों से उनकी सिफारिश की. इसी संघर्ष के दौरान लक्ष्मीकांत की मुलाकात ‘सुरीले बाल कला केंद्र’ में प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा से हुई. प्यारेलाल खुद एक बेहतरीन वायलिन वादक थे, और उनके घर के हालात भी कुछ अच्छे नहीं थे. एक जैसी उम्र, एक सा संघर्ष और संगीत का वही जुनून. 

लक्ष्मीकांत ने थामा प्यारेलाल का हाथ

एक समय ऐसा भी आया जब तंगहाली से टूटकर प्यारेलाल देश छोड़कर वियना जाने की सोचने लगे थे। तब लक्ष्मीकांत ने उनका हाथ थामा और बड़े लाड़ से कहा था, “घबराओ मत यार, हम दोनों मिलकर एक दिन इस इंडस्ट्री में अपना बहुत बड़ा नाम बनाएंगे.” साल 1963 में आई कम बजट की फिल्म ‘पारसमणि’ ने इस जोड़ी को रातोंरात मशहूर कर दिया. इसके बाद साल 1964 की फिल्म ‘दोस्ती’ ने तो इतिहास ही रच दिया. इस फिल्म के गानों ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया. 

750 फिल्मों में कंपोज किए 2800 सॉन्ग

 लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने हर दौर के बदलते मिजाज के हिसाब से गाने कंपोज किए. उन्होंने लगभग 750 फिल्मों के लिए 2,800 से अधिक गीतों की रचना की. गीतकार आनंद बख्शी के साथ उनकी जोड़ी शानदार थी. दोनों ने मिलकर लगभग 302 फिल्मों में यादगार गाने दिए.  

ये भी पढ़ें- 600 फिल्मों में काम करने वाला कपूर खानदान का वो चिराग, हीरो बनकर हुए फ्लॉप तो बने हिंदी सिनेम के खूंखार विलेन





Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button