
रोजाना लोगों के घरों में आने वाले पैकेट दूध में ‘जहरीला डिटर्जेंट’ मिलाया जा रहा है. यह चौंकाने वाला खुलासा NDTV की एक्सक्लूसिव पड़ताल में सामने आया. जब NDTV की टीम ने दूध में हो रही मिलावट की जमीनी हकीकत जानने के लिए सीधे FDA खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टेस्टिंग लैब के अंदर कदम रखा, तो वहां का नजारा हैरान और परेशान करने वाला था.
लैब में जांच के लिए आए तमाम खाद्य पदार्थों में सबसे बड़ी तादाद दूध के सैंपल्स की थी. लेकिन सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ, जब जांच के दौरान इन अधिकांश सैंपल्स में ‘डिटर्जेंट’ की भारी मिलावट पाई गई.
दूध में डिटर्जेंट क्यों मिलाते हैं?
आखिर डिटर्जेंट का दूध में क्या काम है? इसका जवाब है- ‘गाढ़ा झाग’. मिलावटखोर पानी, यूरिया और अन्य सस्ते रसायनों को मिलाकर सिंथेटिक यानी नकली दूध तैयार करते हैं. लेकिन असली दूध जैसी रंगत और बाल्टी में धार मारते समय उठने वाला प्राकृतिक गाढ़ा झाग लाने के लिए इसमें डिटर्जेंट मिला दिया जाता है. डिटर्जेंट से उठा यह झाग आम ग्राहक को यह धोखा देता है कि दूध एकदम ताजा, गाढ़ा और शुद्ध है.

सेहत के लिए कितना खतरनाक है यह डिटर्जेंट वाला दूध?
डिटर्जेंट मिला हुआ यह सफेद तरल पदार्थ दूध नहीं, बल्कि जहर है. इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. इसके सीधे सेवन से गंभीर फूड पॉइजनिंग, पेट दर्द, उल्टी-दस्त और आंतों में अल्सर होने का खतरा रहता है. डिटर्जेंट में मौजूद कास्टिक सोडा और अन्य खतरनाक रसायन जब खून में मिलते हैं, तो लंबे समय में यह लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को डैमेज कर सकते हैं. बच्चों का शरीर बेहद संवेदनशील होता है, ऐसे में इस तरह के सिंथेटिक दूध के सेवन से उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
FDA की लैब में कैसे होती है इन मिलावटों की सटीक जांच?
NDTV की टीम ने देखा कि FDA की प्रयोगशालाओं में दूध की मिलावट को पकड़ने के लिए बेहद वैज्ञानिक और कैमिकल टेस्ट अपनाए जाते हैं. लैब तकनीशियन दूध के सैंपल में विशिष्ट अभिकर्मक डालते हैं और रंग में होने वाले बदलाव से मिलावट का भंडाफोड़ करते हैं. सिंथेटिक दूध या डिटर्जेंट जैसी खतरनाक मिलावट का पता लगाने के लिए ब्रोमोक्रेसोल पर्पल सॉल्यूशन का इस्तेमाल होता है. जैसे ही इसे दूध में डाला जाता है, मिलावटी दूध तुरंत बैंगनी रंग में बदल जाता है. NDTV की पड़ताल में अधिकांश सैंपल्स इसी टेस्ट में फेल हुए और बैंगनी हो गए.
दूध को गाढ़ा करने के लिए मिलाए गए स्टार्च को पकड़ने के लिए सैंपल में आयोडीन की कुछ बूंदें डाली जाती हैं, जिससे दूध का रंग तुरंत नीला या काला हो जाता है. दूध में कृत्रिम रूप से प्रोटीन की मात्रा अधिक दिखाने के लिए मिलाए गए यूरिया की पहचान के लिए पैरा-डाइमिथाइलअमीनोबेंज़लडिहाइड p-DMAB रसायन डाला जाता है, जो दूध के सैंपल को पीला कर देता है.
दूध को लंबे समय तक फटने से बचाने के लिए मिलाए जाने वाले खतरनाक रसायन ‘फॉर्मेलिन’ को जांचने के लिए, एक टेस्ट ट्यूब में दूध लेकर उसमें किनारे से सल्फ्यूरिक एसिड H2SO4 जिसमें फेरिक क्लोराइड की थोड़ी मात्रा हो ये डाला जाता है. यदि दोनों तरल पदार्थों के मिलने की जगह पर बैंगनी रंग का एक छल्ला बन जाए, तो फॉर्मेलिन की पुष्टि हो जाती है.

पानी की मिलावट पकड़ने के लिए लैक्टोमीटर द्वारा दूध का घनत्व मापा जाता है, इन्हीं सटीक और वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करके लैब तकनीशियन हर प्रकार के मिलावटखोरों की चालाकी को बेनकाब करते हैं.
NDTV की पड़ताल में हमने पाया महाराष्ट्र से इकट्ठा दूध के सैंपल्स में डिटर्जेंट पाया जा रहा है. महाराष्ट्र में मिलावटी दूध के खिलाफ एफडीए की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों ने पूरे राज्य में मिलावटखोरों के पसीने छुड़ा दिए है, लातूर के किलारी इलाके में टीम ने छापेमारी कर लगभग 7500 लीटर नकली दूध और भारी मात्रा में प्रतिबंधित पाउडर जब्त किया, तो वहीं सोलापुर के सांगोला में करीब 15 लाख रुपये कीमत का 37,532 लीटर मिलावटी दूध नष्ट किया गया जो एक बड़े उद्योग समूह को सप्लाई किया जा रहा था.
इन कार्रवाइयों का खौफ इस कदर है कि सतारा के मोही गांव में एक व्यक्ति ने पुलिस के डर से सैकड़ों लीटर मिलावटी दूध सड़क पर ही बहा दिया और मौके से फरार हो गया. इसके अलावा, एफडीए के निरीक्षण में डेयरी फार्म्स के भीतर दूध स्टोरेज क्षेत्रों की दीवारों पर फफूंद, चूहों और कीड़ों से बचाव की कोई उचित व्यवस्था न होने तथा वाहनों की सफाई के रिकॉर्ड का अभाव जैसी गंभीर खामियां भी उजागर हुई हैं.
FDA के नए आयुक्त तुकाराम मुंडे की इस सख्त कार्रवाई की हरतरफ़ सराहना हो रही है, पर मुंबई के दूध विक्रेताओं और छोटे व्यापारियों ने एफडीए मुख्यालय पहुंचकर विरोध भी दर्ज कराया. इन व्यापारियों का कहना है कि सरकार द्वारा अचानक खुले दूध की जगह उसे अनिवार्य रूप से पैक करके बेचने की गाइडलाइन रातों-रात लागू करना अव्यावहारिक है, क्योंकि कई विक्रेताओं के पास रोजाना 600 लीटर जैसे भारी मात्रा में खुले दूध की सप्लाई आती है.
उन्होंने तर्क दिया कि ताजे दूध की शेल्फ लाइफ महज 4 से 5 घंटे होती है और वसई-विरार से निकलकर बोरीवली, कांदिवली और मलाड जैसे इलाकों तक सप्लाई पहुंचने में काफी समय लगता है, इसलिए प्रशासन को उनकी व्यावहारिक समस्याओं को समझते हुए नई पैकेजिंग व्यवस्था जुटाने के लिए कुछ मोहलत देनी चाहिए.
NDTV की स्पेशल रिपोर्ट में FDA लैब के अंदर हुई हानिकारक चीज़ों की मिलावट ये दर्शाती है कि इसपर कार्रवाई कितनी जरूरी है.
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