
संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है. इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु रात में चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद व्रत खोलते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है.

चंद्रमा को अर्घ्य देते समय जल को सीधे चंद्रमा की ओर फेंकने के बजाय धीरे-धीरे अर्पित करना चाहिए. पूजा के दौरान मन में श्रद्धा रखें और जल्दबाजी से बचें. धार्मिक मान्यताओं में पूजा की विधि और भाव दोनों को महत्वपूर्ण माना गया है.

मान्यता के अनुसार, चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए साफ जल का इस्तेमाल करना चाहिए. कुछ परंपराओं में जल में अक्षत और फूल डालकर अर्घ्य देने की भी परंपरा है. अपनी पारिवारिक और स्थानीय पूजा परंपरा के अनुसार विधि अपनाई जा सकती है.

चंद्रमा को अर्घ्य हमेशा चंद्रमा के दर्शन करते हुए देना चाहिए. अर्घ्य देते समय भगवान गणेश का स्मरण करें और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें. इसके बाद गणेश जी की पूजा और आरती करना शुभ माना जाता है.

चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश की पूजा पूरी करें. गणेश जी को दूर्वा, फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करने की परंपरा है. इसके बाद व्रत रखने वाले लोग अपनी मान्यता और परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करते हैं.

संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के दौरान मन को शांत रखें और भगवान गणेश का ध्यान करें. किसी के प्रति बुरा भाव रखने से बचें. धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा, संयम और अच्छे कर्मों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी माना जाता है.
Published at : 26 Jul 2026 08:57 AM (IST)