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1.36 लाख वोटर कटे, पर आयोग ने ‘रिकॉर्ड नहीं रखा’: इंदौर आरटीआई का बड़ा खुलासा, मामला हाईकोर्ट पहुंचा | indore 1 36 lakh voters deleted election commission no record rti


मतदाता सूची से कितने नाम कटे, इसका आंकड़ा तो चुनाव दफ्तरों के पास बिल्कुल सटीक मौजूद है. लेकिन जब इन नामों को हटाए जाने के पीछे के डिजिटल रिकॉर्ड मांगे गए, तो कई सरकारी दफ्तरों से एक ही जैसा सूखा जवाब आया कि इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया है. आजकल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पूरे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर तीखी बहस छिड़ी हुई है. इसी माहौल के बीच इंदौर के एक पूर्व पार्षद ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत ऐसी जानकारी मांग ली, जिसकी गूंज अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच चुकी है. इस पूरे मामले ने एक सीधा और बेहद चुभने वाला सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर किसी वोटर का नाम डिजिटल व्यवस्था के जरिए हटाया गया, तो फिर उस बड़े फैसले का डिजिटल रिकॉर्ड आखिर कहां गायब हो गया?

यह पूरा मामला इंदौर जिले में 5 जनवरी 2022 से लेकर 15 अक्टूबर 2022 के बीच का है. इस दौरान जिले की मतदाता सूची से कुल 1,36,552 वोटरों के नाम हटाए गए थे. इसी आंकड़े का हवाला देकर आरटीआई के जरिए सिलसिलेवार ब्योरा मांगा गया था. लेकिन इसके जवाब में कई विधानसभा क्षेत्रों के निर्वाचन दफ्तरों ने साफ कह दिया कि उनके पास गरुड़ ऐप (Garuda App) और ईआरओ नेट (ERO Net) से जुड़ा ऐसा कोई भी डिजिटल रिकॉर्ड संभालकर या सुरक्षित नहीं रखा गया है.
 

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हाईकोर्ट ने दिए 45 दिनों में फैसला करने के सख्त निर्देश

यह पूरी जानकारी निकालने की मुहिम में जुटे इंदौर के पूर्व पार्षद दिलीप कौशल की कानूनी लड़ाई अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंच चुकी है. हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने 17 सितंबर, 2026 को दिए अपने आदेश में राज्य सूचना आयोग को निर्देश दिया है कि वह दिलीप कौशल की लंबित दूसरी अपील पर कानून और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जल्द से जल्द फैसला करे. अदालत ने इसके लिए साफ तौर पर 45 दिन की समयसीमा तय की है. यह अवधि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के दिन से गिनी जाएगी. साथ ही अदालत ने यह भी कहा है कि जो भी फैसला हो, उसकी सूचना सीधे आवेदक को दी जाए. पूर्व पार्षद की यह अपील राज्य सूचना आयोग में 30 जनवरी, 2026 से अटकी पड़ी थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले के गुण-दोष पर अपनी कोई निजी राय जाहिर नहीं की है, अदालत का जोर सिर्फ तय समय में कानूनन फैसला सुनाने पर है.

2022 का पुराना मामला, लेकिन चुनावी पारदर्शिता पर खड़े हुए नए सवाल

यहां यह साफ समझना जरूरी है कि यह मामला साल 2022 में वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का है, यह मौजूदा समय में चल रहे एसआईआर (SIR) का नहीं है. लेकिन इसके बावजूद यह चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़ा वही सबसे बुनियादी सवाल सामने लाकर खड़ा कर देता है कि अगर मतदाता सूची में कोई फेरबदल या बदलाव किया जाता है, तो उसके पीछे के आधिकारिक दस्तावेज आखिर आम नागरिकों तक कैसे पहुंचेंगे?

दस्तावेज जुटाने के लिए दिलीप कौशल ने 23 मई, 2025 को एक आरटीआई आवेदन लगाया था. इसमें उन्होंने गरुड़ ऐप और ईआरओ नेट पर की गई सभी एंट्रियों और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs) के फैसलों से जुड़े तमाम डिजिटल रिकॉर्ड मांगे थे.

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी, कौशल ने इस पूरी प्रक्रिया में शामिल प्राइवेट या ठेका कंपनियों के अनुबंध (एग्रीमेंट), उनके वर्क आदेश, डेटा बैकअप की व्यवस्था और इस बारे में हुए सरकारी पत्राचार की पूरी फाइल भी मांगी थी. इसके बाद जिला निर्वाचन कार्यालय ने 27 मई, 2025 को यह आवेदन अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के अधिकारियों को भेज दिया, जिसके लिखित जवाब जून महीने में आने शुरू हुए.

गरूड़ ऐप और ईआरओ नेट का ब्योरा मांगा तो दफ्तरों ने झाड़ा पल्ला

जब विधानसभा क्षेत्रों के दफ्तरों से जवाब आए तो वे काफी चौंकाने वाले थे. देपालपुर निर्वाचन कार्यालय ने दो टूक शब्दों में लिख दिया कि इस कार्यालय की तरफ से ईआरओ नेट या बीएलओ के गरुड़ ऐप से संबंधित ऐसा कोई डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करके नहीं रखा गया है.

देपालपुर की तरह इंदौर-2, इंदौर-5, राऊ और सांवेर विधानसभा क्षेत्रों के दफ्तरों से भी लगभग यही रटा-रटाया जवाब मिला. इनमें से दो निर्वाचन दफ्तरों ने डिजिटल रिकॉर्ड न रखने के पीछे की वजह भी बताई. इंदौर-1 के कार्यालय का कहना था कि उस समय भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से ऐसे निर्देश नहीं थे, जिसकी वजह से वीडियो, डीवीडी, पेन ड्राइव, व्हाट्सऐप या ईमेल जैसी प्रतियों के रूप में डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं रखा गया.

इंदौर-3 के दफ्तर ने भी ठीक यही दलील दी कि आयोग का निर्देश न होने के चलते रिकॉर्ड तैयार नहीं हुआ.

वहीं इंदौर-4 के निर्वाचन कार्यालय का जवाब बाकी दफ्तरों के मुकाबले थोड़ा अलग था. इस कार्यालय ने दलील दी कि गरुड़ ऐप और ईआरओ नेट पर वोटरों के नाम हटाने की पूरी कवायद चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत उनके रोजमर्रा के नियमित कामकाज का हिस्सा है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने भी यह साफ कह दिया कि उनके विधानसभा दफ्तर में इससे संबंधित मांगे गए वीडियो, डीवीडी या किसी अन्य डिजिटल रिकॉर्ड को बचाकर नहीं रखा गया है.

तीन विधानसभा क्षेत्रों में ही कट गए करीब 57 फीसदी नाम

इन सरकारी जवाबों के साथ जो आंकड़े सामने आए हैं, वे इस मामले की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं. आरटीआई आवेदन में दी गई जानकारी के अनुसार, इंदौर-4 विधानसभा क्षेत्र में 28,391 नाम काटे गए और इंदौर-5 में 28,091 नाम हटाए गए. अगर सिर्फ इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों को ही जोड़ लिया जाए, तो यह संख्या 56,482 हो जाती है.

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इसमें जब राऊ विधानसभा सीट के 21,346 कटे हुए नामों को मिला दिया जाता है, तो यह आंकड़ा सीधे 77,828 पर पहुंच जाता है. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जिले भर में कटे कुल 1.36 लाख नामों में से करीब 57 फीसदी नाम तो सिर्फ इन्हीं तीन विधानसभा क्षेत्रों से गायब कर दिए गए थे.

इसके अलावा अगर बाकी सीटों की बात करें तो इंदौर-2 में 19,983 नाम, इंदौर-1 में 12,102 नाम और इंदौर-3 में 8,107 नाम हटाए जाने का ब्योरा दर्ज है. वहीं सांवेर विधानसभा सीट पर 8,531 और देपालपुर में 2,214 वोटरों के नाम काटे गए थे. जब इन आठों विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों का कुल जोड़ निकाला जाता है, तो यह संख्या 1,28,765 तक पहुंच जाती है.

दफ्तरों के बीच घूमती रही फाइल, पर नहीं मिला बैकअप और अनुबंध

डिजिटल रिकॉर्ड तलाशने के चक्कर में यह आरटीआई आवेदन एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर काटता रहा. जब कंपनियों के ठेके, एग्रीमेंट और डेटा बैकअप से जुड़े तीखे सवाल पूछे गए, तो ज्यादातर दफ्तरों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह जानकारी उनकी शाखा से ताल्लुक नहीं रखती है.इंदौर-4 के कार्यालय ने तो इन सभी सवालों को वापस जिला निर्वाचन कार्यालय की तरफ ही मोड़ दिया और कहा कि यह उनकी जिम्मेदारी है. गौर करने वाली बात यह है कि यह आवेदन मूल रूप से जिला निर्वाचन कार्यालय से ही नीचे विधानसभा क्षेत्रों को भेजा गया था. इस तरह कागजों पर स्थानीय दफ्तरों के जवाब तो मिल गए, लेकिन जिस डिजिटल रिकॉर्ड और तकनीकी सबूत की मांग की गई थी, उसका अता-पता किसी भी जवाब में नहीं मिला.

इंदौर से लेकर पूरे मध्य प्रदेश की 230 सीटों तक पहुंची गूंज 

इंदौर के दफ्तरों से गोलमोल जवाब मिलने के बाद दिलीप कौशल ने 31 जुलाई, 2025 को सीधे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के साथ-साथ मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को औपचारिक शिकायत भेज दी. इस शिकायत के जरिए उन्होंने इस मुद्दे का दायरा सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पूरे मध्य प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों तक पहुंचा दिया. उन्होंने अपनी शिकायत में सवाल उठाया कि पूरे राज्य के अंदर मतदाता सूची से नाम हटाने के मामलों में रिकॉर्ड रखने की क्या व्यवस्था है और क्या हर जगह इसी तरह से नियमों की अनदेखी की गई है?

2023 के नतीजे और पक्के सबूतों की अधूरी तलाश 

अगर राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें, तो साल 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य की 230 में से 163 सीटों पर भारी जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस सिर्फ 66 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. अगर इंदौर जिले की बात करें, तो यहां की सभी नौ सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था. हालांकि, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने ताजा आदेश में इन चुनावी नतीजों पर कोई भी सवाल नहीं उठाया है. अदालत का पूरा दखल केवल और केवल लंबित आरटीआई अपील पर कानून के दायरे में 45 दिनों में फैसला कराने तक सीमित है. वहीं दूसरी तरफ दिलीप कौशल की कोशिश उन दस्तावेजों को पाने की है, जो साफ-साफ बता सकें कि आखिर 2022 में मतदाता सूची से सवा लाख से ज्यादा वोटरों के नाम किस प्रक्रिया और किन तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर हटाए गए थे.
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