
नई दिल्ली:
पेपर लीक से जुड़े मामलों का निपटारा अब फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को खुद इस बात का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि पेपर लीक मामलों में शामिल लोगों को जल्दी और सख्त सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने का फैसला लिया है. उन्होंने बताया कि इसे लेकर निर्देश जारी कर दिए हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने X पर पोस्ट करते हुए बताया कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सरकार की प्राथमिकता है. उन्होंने साफ कर दिया कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई होगी और उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स को बनाने का मकसद मर्डर, किडनैपिंग और रेप जैसे जघन्य अपराधों के ट्रायल के लिए शुरू किया गया था, लेकिन अब पेपर लीक से जुड़े मामलों का ट्रायल भी ऐसी अदालतों में चलेगा.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द कठोर दंड देने के लिए और केस के जल्द निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा.
Nothing is more important than the welfare and future of our youth!
We have decided to set up fast-track courts to ensure swift and stringent punishment for those involved in paper leaks. Have directed the concerned authorities and officials to take all necessary steps in this…
— Narendra Modi (@narendramodi) July 23, 2026
क्या होती हैं फास्ट ट्रैक अदालतें?
केंद्र सरकार के मुताबिक, मजबूत कानून के बावजूद देश भर की अलग-अलग अदालतों में रेप और POCSO एक्ट के कई मामले पेंडिंग हैं. कड़ी सजा का मकसद लोगों में डर पैदा करना है लेकिन यह तभी हो सकता है जब ट्रायल तय समय पर पूरा हो और पीड़ितों को जल्द इंसाफ मिले.
सबसे पहले 11वें वित्त आयोग ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश की थी. पहली बार साल 2000 में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनी थी.
इसके बाद 14वें वित्त आयोग ने 2015-2020 के दौरान देशभर में 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTC) बनाने की सिफारिश की. इनका मकसद गंभीर अपराधों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और 5 साल से ज्यादा पेंडिंग संपत्ति से जुड़े मामलों की तेजी से सुनवाई करना था. वित्त आयोग ने राज्य सरकारों से अनुरोध किया था कि वे टैक्स से मिलने वाले ज्यादा फंड का इस्तेमाल इस काम के लिए करें.
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO से जुड़े मामलों के जल्द से जल्द निपटारे करने का निर्देश दिया. इसके बाद केंद्र सरकार फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) बनाने की स्कीम शुरू की, जिसके तहत रेप और POCSO से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे के लिए देशभर में स्पेशल कोर्ट्स बनाए गए.
इस स्कीम के तहत ऐसे मामलों के ट्रायल के लिए FTSC बनाने के लिए केंद्र सरकार राज्यों की मदद करती है. स्कीम के तहत FTSC बनाने के लिए केंद्र सरकार 60% पैसा देती है, जबकि बाकी का 40% राज्यों को लगाना होता है.
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तो कितनी अदालतें हैं ऐसी?
देश भर में कितनी FTC और FTSC हैं? इसे लेकर केंद्र सरकार ने संसद में कुछ आंकड़े दिए थे. 27 मार्च 2026 को लोकसभा में कानून मंत्रालय ने बताया था कि 31 जनवरी 2026 तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 862 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं. सबसे ज्यादा 373 FTC उत्तर प्रदेश में हैं. दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है, जहां 105 ऐसी अदालतें हैं.
कानून मंत्रालय ने यह भी साफ किया था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई वित्तीय मदद नहीं दी जाती है. सिर्फ FTSC के लिए ही केंद्र सरकार मदद करती है.
लोकसभा में दिए जवाब के मुताबिक, 31 जनवरी 2026 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 774 FTSC हैं. इनमें से 398 सिर्फ POCSO केस के ट्रायल के लिए हैं. सबसे ज्यादा 218 FTSC उत्तर प्रदेश में हैं. दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां 67 FTSC हैं.
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क्या वाकई ‘फास्ट’ हैं ऐसी कोर्ट्स?
आमतौर पर सामान्य अदालतों में ट्रायल खत्म होने और सजा मिलने में सालों लग जाते हैं. लेकिन FTC और FTSC को बनाने का मकसद यही था कि जल्द से जल्द ट्रायल हो और दोषियों को सजा मिले. ऐसी अदालतों में केस आने पर 6 महीने से 1 साल के भीतर फैसला सुना दिया जाता है.
5 फरवरी 2026 को कानून मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि 2023, 2024 और 2025 यानी तीन साल में FTC में 40.26 लाख मामलों का निपटारा किया गया. इन्हीं तीन सालों में FTSC में 2.28 लाख से ज्यादा केस निपटाए गए.
इन अदालतों में काफी जल्दी मामलों का निपटारा होता है. केंद्र सरकार के मुताबिक, 2024 में रेप और POCSO से जुड़े मामलों के लिए बनी FTSC में डिस्पोजल रेट 96% से ज्यादा है. सरकार के मुताबिक, अकेले 2024 में FTSC में 88,902 नए मामले सामने आए थे, जिनमें से 85,595 मामलों का निपटारा कर दिया गया. इसका मतलब हुआ कि FTSC में सालभर में जितने केस आते हैं, उनमें से 96% का ट्रायल सालभर में खत्म कर दिया गया.

केंद्र सरकार के मुताबिक, FTSC में रेप और POCSO से जुड़े मामलों के निपटारे की औसत दर आम अदालतों की तुलना में 3 गुना ज्यादा है. एक आम अदालत में हर महीने औसतन 3.3 मामलों का ही निपटारा हो पाता है तो वहीं हर FTSC में हर महीने 9.51 केस निपट जाते हैं.
हालांकि, इसके बावजूद कई बार कुछ मामलों के निपटारे में काफी वक्त भी लग जाता है. केंद्र सरकार ने संसद में माना था कि केस के निपटारे में देरी के कई कारण हैं. इनमें फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, केस का बहुत उलझा हुआ होना, पुलिस की जांच सही से न होना, फोरेंसिक रिपोर्ट देरी से आना और केस से जुड़े लोगों का सहयोग न मिल पाना शामिल है.
सरकार को हर FTSC से हर तिमाही में 41 से 42 मामलों और सालाना कम से कम 165 मामलों का निपटारा करने की उम्मीद है.
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