

US Saudi Arabia nuclear deal: जंग के बीच अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक ऐसा बड़ा समझौता हुआ है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. यह न्यूक्लियर डील है, जिसके तहत सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू होगा. सऊदी अब नागरिक इस्तेमाल के लिए यूरेनियम का संवर्धन (एनरिचमेंच) कर सकता है यानी उसे शुद्ध कर सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे भविष्य में परमाणु हथियार बनाने का रास्ता खुल सकता है? इसी वजह से इस समझौते पर बहस शुरू हो गई है. 5 सवाल और उनके जवाब से न्यूक्लियर डील की पूरी कहानी समझिए.
अमेरिका और सऊदी में क्या डील हुई?
बुधवार को अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते का ऐलान किया. अमेरिका का कहना है कि इस समझौते में ऐसे सुरक्षा नियम रखे गए हैं, जिससे परमाणु हथियारों का फैलाव न हो. अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. पहला समझौता शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग पर है और दूसरा दोनों देशों के बीच सुरक्षा नियमों पर है. इसकी जानकारी अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने दी है. इन दोनों समझौतों का पूरा डॉक्यूमेंट अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.
आगे क्या होगा?
अब इस समझौते को समीक्षा के लिए अमेरिका की संसद के पास भेजा जाएगा. दोनों पार्टियों के कुछ सांसदों के इस समझौते का विरोध करने की उम्मीद है. हालांकि अभी ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का ऊपरी और निचले, दोनों सदनों पर कंट्रोल है. तो इस समझौते का पास होना लगभग तय है.
टाइमिंग अहम क्यों है?
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका, ईरान के साथ युद्ध लड़ रहा है. इस युद्ध की एक बड़ी वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम रहा है. यही मुद्दा दोनों देशों के बीच रुकी हुई शांति वार्ता में भी सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है. ईरान कहता रहा है कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा है. उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक उद्देश्यों के लिए है. लेकिन अमेरिका उसपर परमाणु बम बनाने के लिए यूरेनियम को अत्यधिक शुद्ध करने का आरोप लगाता रहा है. पिछले साल उसके तीन न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले किए थे. इस बार भी ट्रंप ऐसी ही धमकी दे रहे हैं. ऐसे में अमेरिका ने सऊदी के साथ नागरिक परमाणु समझौता किया है.
डील को लेकर क्या डर है?
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, इस डील के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) का प्लांट बना सकती हैं. अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों के कई सांसद और इजरायल के अधिकारी पहले भी इस तरह की योजना का विरोध कर चुके हैं. उन्हें डर है कि भविष्य में सऊदी अरब इस तकनीक का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए कर सकता है.
अमेरिका ने 2009 में सऊदी अरब के पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भी परमाणु समझौता किया था. लेकिन UAE खुद यूरेनियम को समृद्ध (एनरिच) नहीं करता. विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते पर काफी समय से काम चल रहा था. लेकिन कुछ लोगों ने चिंता जताई कि अगर सऊदी अरब की जमीन पर यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की अनुमति दी गई, तो यह जोखिम बढ़ा सकता है.
अमेरिका स्थित ‘डिफेंस प्रायोरिटीज’ थिंक टैंक में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम की डायरेक्टर रोजमेरी केलानिक का कहना है कि अमेरिका ने ऐसा पहले कभी नहीं किया है. उन्होंने कहा, “हमने कभी किसी दूसरे देश की जमीन पर यूरेनियम को एनरिच करने में मदद नहीं की है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर आप अपना न्यूक्लियर फ्यूल खुद बना सकते हैं, तो न्यूक्लियर हथियार बनाने के लिहाज से आप कहीं ज्यादा बड़ा खतरा बन जाते हैं.”
क्या अमेरिका ने चीन और रूस को मात दी?
वहीं अटलांटिक काउंसिल की न्यूक्लियर एनर्जी पॉलिसी इनिशिएटिव की डॉयरेक्टर जेनिफर टी. गॉर्डन ने इस समझौते की तारीफ करते हुए इसे अमेरिका की रूस और चीन के ऊपर बड़ी जीत बताया. उन्होंने कहा, “सऊदी अरब पहले ही साफ कर चुका था कि वह परमाणु ऊर्जा तकनीक खरीदेगा और अपना नागरिक परमाणु कार्यक्रम शुरू करेगा. असली सवाल सिर्फ यह था कि वह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ काम करेगा या फिर रूस और चीन का रुख करेगा.” अब अमेरिका ने डील करके उसे अपने पाले में कर लिया है.





