

इंडोनेशिया का नाम सुनते ही आंखों के सामने बाली के खूबसूरत समंदर, लक्जरी रिसॉर्ट्स और विदेशी पर्यटकों की तस्वीरें घूमने लगती हैं. लेकिन इस चमचमाती दुनिया से महज दो घंटे की दूरी पर एक ऐसा भयानक सच छिपा है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए. यहां के ‘सुंबा द्वीप’ पर 21वीं सदी में भी दास प्रथा चल रही है.
इस द्वीप पर पैदा होने वाले बच्चे किसी आजादी के साथ नहीं, बल्कि अपने मालिकों के ‘गुलाम’ बनकर आंखें खोलते हैं. यहां की स्थानीय भाषा में इन बेबस लोगों को ‘अता’ कहा जाता है.
मालिकों की मर्जी ही इनका कानून
सुंबा द्वीप पर सदियों पुरानी जाति व्यवस्था का कब्जा है. यहां की कुल आबादी लगभग 6.85 लाख है. इनमें से अधिकतर ईसाई हैं. लेकिन यहां की सामाजिक व्यवस्था प्राचीन ‘मरापू’ परंपरा से संचालित होती है. इस परंपरा में समाज को तीन वर्गों में बांटा गया है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, ईस्ट सुंबा में ही करीब 1,700 से लेकर कई हजार लोग आज भी इस गुलामी के चंगुल में फंसे हुए हैं. इन ‘अता’ लोगों के पास अपने जीवन का कोई अधिकार नहीं होता. बचपन से ही इन्हें खेतों में काम करने, मवेशी चराने और मालिकों के घरों में खाना पकाने में झोंक दिया जाता है.
अगर कोई बच्चा या बड़ा काम करने में थोड़ी भी ढिलाई बरतता है, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता है और उस पर खोलता पानी तक फेंक दिया जाता है. हद तो यह है कि इन गुलामों को शादी के दौरान तोहफे की तरह एक-दूसरे को सौंप दिया जाता है.
जब जुल्म ही बन जाए परंपरा
इस द्वीप पर गुलाम महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी नरक से भी बदतर है. सामाजिक और धार्मिक दबाव के कारण यहां गुलाम महिलाओं के साथ होने वाले यौन शोषण को रेप माना ही नहीं जाता.
साल 2024 में 18 साल की एक बेबस गुलाम लड़की ने साहस दिखाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. उसने आरोप लगाया कि 13 साल की उम्र से उसके मालिक और मालिक के बेटे ने सालों तक उसका रेप किया, जिससे उसने एक बच्चे को जन्म दिया. लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है. डर के मारे अधिकतर पीड़ित अदालत या पुलिस के पास जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते.
कानून में बैन, लेकिन परंपरा के नाम पर खुली छूट
इंडोनेशिया में डच औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद 1945 के संविधान के तहत गुलामी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी. करीब 160 साल पहले कानूनी रूप से यह प्रथा खत्म हो चुकी है, लेकिन राजधानी जकार्ता से 2,000 किलोमीटर दूर स्थित सुंबा द्वीप की भौगोलिक दूरी और मरापू धर्म की गहरी जड़ों के कारण यह प्रथा आज भी जिंदा है.
इंडोनेशिया के मानवाधिकार मंत्री युसरिल इहज़ा महेंद्र का कहना है कि इंडोनेशिया एक विविधतापूर्ण देश है और सरकार अचानक कोई नियम थोपने के बजाय धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव लाने पर भरोसा रखती है.
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