

ग्वालियर: सिंधिया राजवंश के समय में स्वर्णरेखा नदी ग्वालियर शहर की मुख्य पहचान और प्राकृतिक जल निकासी का मुख्य माध्यम हुआ करती थी. कभी अपनी स्वच्छता के लिए जानी जाने वाली यह ऐतिहासिक नदी आज शहर के दर्जनों नालों और गंदे पानी के कारण अपनी पहचान खो चुकी है. स्वर्णरेखा नदी के बढ़ते प्रदूषण और उसके पुनर्जीवन से जुड़ी जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सख्त रुख अपनाया है.
अदालत ने नगर निगम और राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर ताजा व डिटेल्ड रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने पूछा है कि नदी में गिर रहे कचरे को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और इसे बचाने की भविष्य की क्या योजना है?
यह आदेश जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने विश्वजीत रतोनिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए. मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त 2026 को तय की गई है.
एक साल पहले तैयार किया था डीपीआर
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नगर निगम से कई सवाल किए. कोर्ट ने पूछा- स्वर्णरेखा नदी में कचरा, नाले और जहरीला अपशिष्ट डालने वाले मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं? इसके अलावा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए नगर निगम ने अब तक धरातल पर क्या कार्रवाई की है? आप यह भी बताएं कि प्रदूषण को पूरी तरह रोकने और नदी की सफाई के लिए आगे का क्या एक्शन प्लान तैयार किया गया है? सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वकील ने कहा कि स्वर्णरेखा नदी के पुनर्जीवन के लिए एक डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार कर लगभग एक साल पहले भेजा गया था.
14 दिन में सरकार से मांगा जवाब
इसके बाद कोर्ट ने सरकार को DPR की वर्तमान स्थिति, अब तक हुई कागजी कार्रवाई और जमीनी प्रगति का पूरा ब्योरा पेश करने के लिए राज्य सरकार को भी 14 दिनों की मोहलत दी है. नगर निगम की ओर से भी नई रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगा गया था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है.





