खबर

सोनम-सिया तो खतरनाक पर भारत समेत एशियाई महिलाओं में तलाक लेने का ट्रेंड क्यों बढ़ रहा? | why indians and asian women taking divorce with her husbands


भारत समेत एशिया भर में तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. जापान की ईको तोयामा ने अपने पति को छोड़ने के लिए 32 साल तक इंतजार किया. उन्होंने बताया कि शादी के दौरान, अपने घर पर उन्होंने घर के सारे काम और बच्चों की देखभाल की, साथ ही परिवार को आर्थिक रूप से भी सहारा दिया. उनके पति उनकी सोशल लाइफ से लेकर उनके करियर की महत्वाकांक्षाओं तक, हर चीज पर कंट्रोल रखना चाहते थे, जिससे उन्हें घुटन और दुख महसूस होता था. फिर भी, अपने दो बच्चों की वजह से वह उस रिश्ते में बनी रहीं.

आखिरकार, जब वह 60 साल की हुईं, तो हालात बदल गए. उनके बड़े हो चुके बेटों को अब उनकी जरूरत नहीं थी, और उनके पति भी स्वस्थ थे. यानी वह इतने बूढ़े नहीं हुए थे कि उन्हें किसी देखभाल करने वाले की जरूरत पड़े. यह एक बहुत अच्छा मौका था, और उन्होंने इसका फायदा उठाया. उन्होंने बताया, ‘तलाक के बाद मुझे सिर्फ खुशी महसूस हो रही थी. मेरे मन में बस यही एक भावना थी. मैं इतनी खुश थी कि मेरा मन कर रहा था कि बस इधर-उधर दौड़ती-भागती रहूं”

अब शर्म की बात नहीं

सीएनएन के अनुसार, ईको तोयमा जैसी कहानियां दुनिया भर में आम होती जा रही हैं क्योंकि हर साल “ग्रे डिवोर्स” यानी 50 साल और उससे ज्यादा उम्र के जोड़ों के बीच तलाक  की संख्या बढ़ रही है. यह ट्रेंड अमेरिका जैसे देशों में तो देखा ही गया है, लेकिन एशिया में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहां लोग आम तौर पर ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं. दक्षिण कोरिया, जापान, हांगकांग, ताइवान और मुख्य भूमि चीन जैसी कई जगहें आबादी से जुड़े संकटों का सामना कर रही हैं, क्योंकि वहां जन्म दर घट रही है और बुज़ुर्गों की आबादी बढ़ रही है. ‘ग्रे डिवोर्स’ (बुढ़ापे में होने वाले तलाक) के बढ़ते मामलों के पीछे अक्सर महिलाएं ही होती हैं, जिन्हें लंबे समय से पारंपरिक एशियाई समाजों में जेंडर से जुड़ी पाबंदियों और तलाक लेने में कानूनी, आर्थिक और सामाजिक रुकावटों का सामना करना पड़ा है. अब यह स्थिति बदल रही है; उदाहरण के लिए, जापान में दशकों की शादी के बाद अलग होने वाले जोड़ों में, 2024 में पुरुषों की तुलना में दोगुनी महिलाओं ने तलाक के लिए अर्जी दी. इससे आने वाले दशक में एशिया की बुजुर्ग आबादी की तस्वीर बदल सकती है: जैसा कि विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है, ज्यादा लोग अकेले रहेंगे और उन्हें ज्यादा कल्याणकारी सहायता की जरूरत होगी – लेकिन साथ ही, शायद वे खुद अपने दम पर आगे बढ़ने के लिए ज्यादा सशक्त भी होंगे. तोयामा जैसी महिलाओं के लिए, जो 1960 और 70 के दशक में बड़ी हुईं, तलाक कोई आम बात नहीं थी. अक्सर इसे गलत नजरिए से देखा जाता था और शर्म की बात माना जाता था.

Latest and Breaking News on NDTV

नौकरी, टीवी और सोशल मीडिया

कैनसस की वॉशबर्न यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर सैंगयूब पार्क ने कहा कि उस समय, अगर कोई महिला तलाक लेती थी, तो यह लगभग जिंदगी खत्म होने जैसा था. पार्क ने दक्षिण कोरिया में उम्र के आखिरी पड़ाव पर होने वाले तलाक पर 2023 में एक रिसर्च पेपर लिखा था. उनके अनुसार, 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में यह स्थिति बदलने लगी, क्योंकि ज्यादा महिलाएं नौकरी करने लगीं और हायर एजुकेशन लेने लगीं. पार्क ने कहा कि ‘ग्रे डिवोर्स’ की संख्या लगातार बढ़ी है. खासकर पिछले दशक में जब ‘जेन X’ (1965-1980 के बीच पैदा हुए लोग) के लोग 50 की उम्र में पहुंचने लगे. यह एक अहम डेमोग्राफिक ग्रुप है. 1965 और 1980 के बीच पैदा हुई ‘जेन X’ वह पहली पीढ़ी थी, जो ग्लोबलाइज होते एशिया में बड़ी हुई और जिसने टीवी और फिल्में देखीं. पार्क ने कहा कि पॉप कल्चर के जरिए उन्होंने अमेरिकी वैल्यूज को भी अपनाया, जैसे पारिवारिक जिम्मेदारियों के बजाय अपनी पसंद को प्राथमिकता देना. इन वैल्यूज और बड़े आर्थिक कारणों ने मिलकर तलाक के प्रति लोगों की सोच को धीरे-धीरे बदलने में मदद की.

कानून में सुधार भी बड़ी वजह

इस इलाके के डेटा में यह बात साफ दिखती है. पिछले साल दक्षिण कोरिया में, कम से कम 30 साल से शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक की संख्या, पांच साल से कम समय से शादीशुदा युवा जोड़ों के तलाक से ज्यादा हो गई, ऐसा पहली बार हुआ. सरकारी डेटा के मुताबिक, ताइवान में भी लंबे समय से शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक बढ़े हैं. हांगकांग में कई लॉ फर्मों ने ‘ग्रे डिवोर्स’ (बुज़ुर्गों के तलाक) में तेजी देखी है, और मुख्य भूमि चीन में पिछले 30 सालों में बुज़ुर्गों के तलाक की संख्या दोगुनी हो गई है. इसकी एक वजह आबादी से जुड़ी हो सकती है. बढ़ती उम्र वाली आबादी में बुज़ुर्गों की संख्या ज्यादा होती है, इसलिए बुज़ुर्गों के तलाक भी ज्यादा होंगे. आजकल युवा कम शादी कर रहे हैं, इसलिए उनके तलाक भी कम हो रहे हैं. लेकिन कानूनी सुधारों ने भी बड़ा असर डाला है. इनसे उन महिलाओं के लिए सुरक्षा का घेरा बना है, जिन्हें पहले अपनी जिंदगी गुजारने के लिए पतियों पर निर्भर रहना पड़ता था. उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया ने 2014 में यह नियम बनाया कि भविष्य की पेंशन और नौकरी छूटने पर मिलने वाली रकम (सेवरेंस पे) को संपत्ति के बंटवारे में शामिल किया जा सकता है. इसका मतलब है कि अगर किसी महिला ने शादी के दौरान घर के सारे काम और बच्चों की देखभाल की, जिससे उसके पति को काम करने का मौका मिला, तो तलाक के बाद वह पति की बुढ़ापे की पेंशन का कुछ हिस्सा पाने की हकदार है. जापान ने 2007 में ऐसा ही सुधार लागू किया था.

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: Pexels

ये उपाय इसलिए भी बहुत जरूरी हैं, क्योंकि एशिया में बुजुर्गों के बीच गरीबी की दर बहुत ज्यादा है. OECD देशों में, दक्षिण कोरिया में 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में गरीबी की दर सबसे ज्यादा है. हांगकांग (जो OECD का सदस्य नहीं है) में भी यह दर इतनी ही ज्यादा है. हालांकि जापान का स्थान इससे थोड़ा नीचे है, फिर भी यह वैश्विक औसत से ज्यादा है. और इन सुधारों के बावजूद, लिंग के आधार पर गहरी असमानता अभी भी बनी हुई है.

भारत का मामला अलग

हालांकि, भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश-नेपाल में अभी तक ये समृद्ध परिवारों में ही देखने को मिल रहा है. वहीं गरीब या मध्यम स्तर के परिवारों में ये अपराध की शक्ल ले रहा है. सोनम से लेकर सिया तक के मामले इसके गवाह है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में दो दशक पहले 0.6 फीसदी महिलाएं तलाकशुदा या अलग थीं. अब ये करीब 1 फीसदी हो गई हैं. प्राइवेट मार्केट रिसर्च कंपनियों की स्टडी कहती है कि भारत में तालक देने वाली महिलाओं की औसत आयु 21 है और पुरुषों की 36 है. अब करीब 58 फीसदी महिलाएं खुद पहल कर अपने पतियों से तलाक ले रही हैं. इसमें भी सबसे ज्यादा रिश्ते शादी के 3 साल बाद टूट रहे हैं. तलाक के कारणों का आंकड़ भी बड़ा अजीब है.

2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, आपसी सहमति से तलाक लेने के मामले 33 फीसदी है. क्रूरता के नाम पर 23 फीसदी तलाक हुए. घरेलू हिंसा और लगातार झगड़ों के कारण 26 फीसदी तलाक हुए. व्यभिचार, परित्याग, विवाह पूर्व धोखा, यौन समस्या के कारण 16 फीसदी तलाक हुए. करीब 1 फीसदी तलाक धार्मिक मतभेदों के कारण हुए. एशिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी महिलाएं बड़ी संख्या में नौकरी कर रही हैं. सोशल मीडिया के कारण भी महिलाएं काफी ज्यादा वोकल हुई हैं. ऐसे में अब वो अपने पतियों से बहुत दबकर रहना पसंद नहीं करतीं. साथ ही अपनी वैचारिक और आर्थिक आजादी को सुरक्षित रखना चाहती हैं. 

यह भी पढ़ें-

जिसका डर था वही हुआ, होर्मुज में बिछी माइंस से टकराया तेल टैंकर, हुआ भयंकर विस्फोट

यूरोप के हीटवेव के बाद अब पहली बार अमेरिका के एक पूरे शहर में खत्म हो सकता है पानी

उत्तर-पश्चिम चीन के टूरिस्ट स्पॉट पर अचानक आई बाढ़ से 10 लोगों की मौत, 23 घायल

दक्षिण चीन सागर में वियतनाम का एक जहाज डूबा, 62 लोग थे सवार, अब तक 45 को बचाया गया




Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button