मध्य प्रदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज, आई बीजेपी की पहली प्रतिक्रिया, जानें- क्या कहा?


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 12 जून को मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नेता मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली उनकी याचिका नामंजूर कर दी. जज जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जज जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने हालांकि स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. 

वहीं इस मामले में मंत्री विश्वास सारंग ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि कांग्रेस बिना किसी वास्तविक मुद्दे के राज्यसभा चुनाव को लेकर विवाद खड़ा कर रही है. सारंग के मुताबिक, मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र पूरी तरह तकनीकी कारणों से निरस्त हुआ था, लेकिन कांग्रेस ने इसे जानबूझकर राजनीतिक मुद्दा बनाया. 

उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस को पहले से पता था कि तीसरी सीट पर चुनाव होने की स्थिति में भाजपा की जीत तय है, इसलिए क्रॉस वोटिंग के डर और अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए गलत नामांकन दाखिल किया गया. उन्होंने कहा कि नामांकन खारिज होने के बाद कांग्रेस ने राजनीतिक स्टंटबाजी की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर दिया. 

सारंग ने कहा कि इस फैसले से एक बार फिर साबित हुआ है कि कांग्रेस लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाती है और उनके साथ छेड़छाड़ करती है. उन्होंने दिग्विजय सिंह पर भी निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस के नेता सुप्रीम कोर्ट तक पर सवाल उठा रहे हैं, जो उसकी अलोकतांत्रिक मानसिकता को दर्शाता है. सारंग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह सही है और कांग्रेस लगातार बेईमानी की राजनीति के रास्ते पर चल रही है. 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

इससे पहले बेंच ने कहा,’यदि अदालत यह तय करने लगे कि किन मामलों में नामांकन रद्द किया जाना इतना गलत है कि वह सीधे अनुच्छेद 32 या 226 के तहत हस्तक्षेप कर सकती है, और किन मामलों में उम्मीदवार को चुनाव याचिका का रास्ता अपनाना चाहिए, तो अदालत संविधान के अनुच्छेद 329 में ऐसी व्यवस्था जोड़ रही होगी जो वहां लिखी ही नहीं गई है.’

अदालत ने कहा,’हमें डर है कि ऐसी किसी भी व्याख्या को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता, जिसके तहत कुछ मामलों में यह अदालत हस्तक्षेप करे और कुछ अन्य मामलों में पक्षकारों को चुनाव न्यायाधिकरण का सहारा लेने के लिए छोड़ दे.’

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 329 चुनाव संबंधी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है, ताकि न्यायिक देरी के कारण चुनाव प्रक्रिया प्रभावित न हो. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार का नामांकन निर्वाचन अधिकारी द्वारा निरस्त किए जाने के बाद उसके पास राहत पाने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं होता. 

कोर्ट ने नटराजन से यह भी पूछा कि क्या वह ऐसा कोई फैसला दिखा सकती हैं, जिसमें अदालत ने इस प्रकार के मामलों में हस्तक्षेप किया हो. बेंच ने कहा,’निर्णय कितना भी त्रुटिपूर्ण क्यों न हो, एक बार नामांकन खारिज हो जाने के बाद सामान्यतः इसका उपाय कहीं और उपलब्ध होता है. क्या इस कोर्ट का ऐसा कोई निर्णय है, जिसमें हमने इस चरण में हस्तक्षेप किया हो?’

नटराजन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने दलील दी कि किसी उम्मीदवार को केवल वही आपराधिक मामला घोषित करना होता है, जिसमें न्यूनतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान हो. उन्होंने कहा कि वर्तमान मामले में केवल समन जारी हुए थे. सिंघवी ने कहा कि मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नटराजन का नामांकन पत्र निर्वाचन अधिकारी ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत एक आपराधिक मामले का खुलासा न करने के आरोप में गलत तरीके से खारिज कर दिया. राज्यसभा चुनाव के निर्वाचन अधिकारी अरविंद शर्मा के आदेश में कहा गया कि उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद यह पाया गया कि नटराजन ने अपने नामांकन के साथ दाखिल फॉर्म-26 में एक कोर्टीन शिकायत का उल्लेख नहीं किया और इस प्रकार अधूरा शपथपत्र प्रस्तुत किया. 

मध्य प्रदेश विधानसभा के एक अधिकारी के अनुसार, सत्तारूढ़ भाजपा के उम्मीदवार महेश केवट ने निर्वाचन अधिकारी से शिकायत की थी कि नटराजन ने अपने शपथपत्र में तेलंगाना में उनके खिलाफ दर्ज एक मामले का उल्लेख नहीं किया है. 



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