

हैदराबाद:
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदाता सूची के बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण और संभावित मतदाता बहिष्कार को लेकर तीखी संवैधानिक टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी अभ्यास, जिससे लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर उन्हें ‘अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक’ बना दिया जाए, अपने आप में मनमाना है.
हैदराबाद में एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान ऐसे दो वर्गों के नागरिकों की कल्पना नहीं करता- एक वे जिनके पास मतदान का अधिकार है और दूसरे वे जिनके पास यह अधिकार नहीं है.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार महज वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह नागरिकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है. उन्होंने कहा, सैद्धांतिक रूप से नागरिकता और मताधिकार एक-दूसरे से जुड़े हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता.
प्रशासनिक कार्रवाई भी संवैधानिक सीमाओं के अधीन
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के संदर्भ में जस्टिस भुइयां ने कहा कि मताधिकार पर संवैधानिक सीमाएं केवल कानून बनाने वाली संस्था पर ही लागू नहीं होतीं, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई पर भी लागू होती हैं.
उन्होंने कहा कि अगर किसी कानून के जरिए मताधिकार को तर्कहीन या अनुचित तरीके से सीमित नहीं किया जा सकता, तो यही बात प्रशासनिक कार्रवाई पर भी लागू होती है.
उन्होंने लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (1995) मामले का हवाला देते हुए कहा कि मृत मतदाता को छोड़कर, मतदाता सूची में एक बार नाम दर्ज हो जाने के बाद उसे बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए हटाया नहीं जा सकता.
‘एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट, एक मूल्य’
जस्टिस भुइयां ने संविधान सभा में डॉ. बीआर आंबेडकर के अंतिम भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के बावजूद राजनीतिक समानता को स्वीकार किया.
उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट, एक मूल्य समानता का एक महत्वपूर्ण पहलू है और संविधान की मूल भावना है.
उन्होंने कहा कि एक अरबपति और रिक्शा चालक के वोट का मूल्य समान है. इसी तरह सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त मंदिर के पुजारी और मैला ढोने को मजबूर व्यक्ति के वोट का मूल्य भी समान है.
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अनुच्छेद 325 और 326 का हवाला
जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 325 एक सामान्य मतदाता सूची की व्यवस्था करता है, जबकि अनुच्छेद 326 लोकसभा और विधानसभा चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराने का प्रावधान करता है.
उन्होंने जोर दिया कि अनुच्छेद 326 में मुख्य जोर ‘हर भारतीय नागरिक’ पर है. जब तक कोई व्यक्ति संविधान में मान्य आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, वह मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम केंद्र सरकार और अनूप बरनवाल बनाम केंद्र सरकार जैसे मामलों में मताधिकार की संवैधानिक प्रकृति को स्वीकार किया है और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा है.
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में क्या मामला
दिल्ली में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची से 47.56 लाख नाम बाहर रह गए, जबकि 33.13 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस के लिए चिह्नित किया गया.
22 सितंबर को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा था. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह जांचने को कहा था कि नोटिस कहीं यांत्रिक तरीके से तो जारी नहीं किए जा रहे.
पश्चिम बंगाल में भी बड़ी संख्या में अपील लंबित हैं. चुनाव आयोग के अनुसार, 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 22.21 लाख ने अपील की, जबकि मतदाताओं के शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली 16.10 लाख अपीलें भी दायर हुईं. कुल 38.31 लाख अपीलों में से 37 लाख से अधिक लंबित थीं.
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‘कोई संविधान से ऊपर नहीं’
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने कहा अनुच्छेद 326 के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता; कोई अदालत इसे माफ नहीं कर सकता. संविधान से ऊपर कोई नहीं है.
उन्होंने संविधानविद नानी पालखीवाला के उस विचार का भी उल्लेख किया कि स्वतंत्रता विरासत में रक्त के साथ नहीं मिलती, बल्कि हर पीढ़ी को उसकी रक्षा करनी पड़ती है.
और अंत में सवाल किया- अपने मतदान के अधिकार के बिना एक नागरिक का मूल्य ही क्या है?
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