

रामायण के 300 से ज्यादा अलग-अलग संस्करण पाए जाते हैं, सबसे लोकप्रिय और मुख्य वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस रहे हैं. बात चाहे रामानंद सागर की रामायण की हो या फिर इससे जुड़े किसी दूसरे धारावाहिक या फिल्म की, ज्यादातर मेकर्स ने वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस को ही अपनी रिसर्च का आधार माना है. लेकिन रामायण तो अनेक किरदारों से युक्त है, सभी की अपनी अलग कहानी है. आज उन्हीं अनकही, अनसुनी कहानियों के बारे में आपको बताते हैं.
इस लेख में हम आपको कैकेई की दासी मंथरा, रावण की पत्नी मंदोदरी और लंका की राक्षसी त्रिजटा की कहानी बताने जा रहे हैं.
Advertisement – Scroll to continue
मंथरा की कहानी
रामायण के तेलुगु संस्करण ‘श्री रंगनाथा रामायण’ में दासी मंथरा को लेकर एक ऐसी कथा बताई गई है जिसकी जानकारी ज्यादा लोगों को नहीं होगी. श्री रंगनाथा रामायण के मुताबिक मंथरा के मन में भगवाव श्रीराम के प्रति नफरत कोई अचानक से पैदा नहीं हुई थी बल्कि वो कई सालों तक अपने मन में उनके प्रति विष पाले बैठी थी. वो बदले की भावना से भरी पड़ी थी, हर कीमत पर बस श्रीराम का विनाश चाहती थी.
एक कथा जो मंथरा को लेकर प्रचलित है, उसका संबंध भगवान राम के बचपन से जुड़ा हुआ है. ऐसा कहा जाता है कि एक बार भगवान राम अपने भाइयों के साथ खेल रहे थे. तभी मंथरा ने श्रीराम की गेंद को कहीं दूर फेंक दिया. मंथरा की इस हरकत से नाराज होकर भगवान राम ने छड़ी से मंथरा के घुटने पर मार दिया था. उस प्रहार से मंथरा का घुटना टूट गया और वो रोती-बिलखती रानी कैकेयी के पास भा गई.
मंथरा की आपबीती जान कैकेयी सीधे महाराज दशरथ के पास गई और उन्होंने सभी भाइयों को गुरुकुल भेजने का प्रस्ताव रख दिया. राजा दशरथ भी इस बात से सहमत हो गए और उन्होंने अपने सभी पुत्रों को शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरुकुल भेज दिया. लेकिन मंथरा इस सब से खुश नहीं थी, उसे तो सिर्फ श्रीराम से बदला लेना था. श्री रंगनाथा रामायण के मुताबिक इसी बदले की भावना में मंथरा ने आगे चलकर रानी कैकेयी को भड़काया था और भगवान राम को 14 वर्षों के लिए वन भेजने के लिए विवश कर दिया था.
तमिल संस्करण कम्ब-रामायण के मुताबिक तो मंथरा को उसके कुकर्मों के लिए कारावास में डाल दिया गया था, फिर जब श्रीराम 14 साल बाद वन से लौटे, उन्होंने सबसे पहले मंथरा से मुलाकात की और उसे उस सजा से मुक्त कर दिया.
ये भी पढ़ें- शूर्पणखा को लेकर तुलसीदास और वाल्मीकि ने क्या बताया
मंदोदरी की कहानी
आज की दुनिया मंदोदरी को सिर्फ रावण की पत्नी के रूप में याद रखती है. लेकिन पौराणिक कथाओं के अनुसार मंदोदरी का जीवन इससे कहीं बड़ा था. एक कथा के मुताबिक मंदोदरी पहले मधुरा नाम की अप्सरा थी. वो भगवान शिव की भक्त थी और उनसे मिलने कैलाथ तक चली गई थी. शिव उस समय ध्यान में लीन थे और मधुरा बस उन्हें निहारती रही.
उस समय माता पार्वती वहां मौजूद नहीं थीं, ऐसे में मधुरा ने भगवान शिव को रिझाने के अनेक प्रयास किए, वो उनके सामने नृत्य करती रही. लेकिन उसके तमाम प्रयास विफल रहे, महादेव के तप को भंग नहीं कर पाई. लेकिन तभी मौके पर माता पार्वती आ गईं और उन्हें मधुरा के शरीर पर महादेव की भस्म लगी दिख गई. यह दृष्य देख माता पार्वती भड़क गईं और उन्होंने मधुरा को मेढ़की बनने का श्राप दे दिया. जब देवी पार्वती श्राप दे रही थीं, तुरंत भोलेनाथ ने अपने नेत्र खोले और माता को क्रोध शांत करने के लिए कहा.
जैसे ही माता पार्वती का गुस्सा शांत हुआ, उन्होंने अपने श्राप को सीमित कर दिया. अब मधुरा 12 साल तक एक मेढ़की के रूप में जरूर रहेगी, लेकिन अगर वो भगवान शिव की गहन तपस्या करती रही तो उसे उस योनि से मुक्ति मिल जाएगी. इसके बाद श्राप के तहत मधुरा एक कुएं में जा गिरी और वहां 12 वर्षों तक तपस्या करती रही. उसकी एक ही कामना थी, संसार के सबसे शक्तिशाली और विद्वान व्यक्ति से उसकी शादी हो. भगवान शिव उसके तप से अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्होंने उसकी इस इच्छा को पूरा कर दिया. इसके अलावा उन्होंने उसे चिरकुमारी रहने का वरदान भी दिया, इसका मतलब था कि उसका यौवन कभी क्षीण नहीं होगा.
जैसे ही श्राप का असर खत्म हुआ, मधुरा अपने मूल स्वरूप में वापस आ गई और उसने कुएं से बाहर निकलने के लिए गुहार लगाई. तब उसकी मदद के लिए मय दानव अपनी पत्नी हेमा के साथ आ गए. दोनों ने मधुरा को बाहर निकाला और उसका सौंदर्य देख उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया. दोनों ने मधुरा का नाम तब मंदोदरी रख दिया.
राक्षसी त्रिजटा की कहानी
राक्षसी त्रिजटा को लेकर कई कथाएं रामायण के अलग-अलग संस्करणों में प्रचलित हैं. वाल्मीकि रामायण से यह तो पता चलता है कि त्रिजटा असल में विभीषण की पुत्री थी, लेकिन इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन अगर ‘आनंद रामायण’ का रुख करेंगे तो पता चलता है कि त्रिजटा रावण के अंत के बाद पुष्पक विमान में बैठ अयोध्या तक गई थी. वहां माता सीता ने उसे अनमोल उपहार दिए थे. बाद में माता सीता खुद लंका गई थीं और उन्होंने विभीषण की पत्नी शरमा से कहा था कि इसका ख्याल वैसे ही रखा जाना चाहिए जैसा इसने अशोक वाटिका में मेरा रखा था.
ये भी पढ़ें- वाल्मीकि और तुलसीदास ने सीता की सुंदरता का वर्णन कैसे किया?





