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मानवता, एकता, विविधता और स्थायी सुख… अमेरिका में RSS प्रमुख मोहन भागवत के ऐतिहासिक संबोधन की प्रमुख बातें | Mohan Bhagwat Highlights Unity In Diversity And Sustainable Happiness At New York Address



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में अपने संबोधन में मानवता, एकता, विविधता और स्थायी सुख और भारत में विविधता में एकता की बात दुनिया के सामने कही. उन्होंने कहा कि आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है. व्यक्ति, समाज और पर्यावरण को एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं बल्कि साथ लेकर चलना होगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का मूल संदेश ही विविधता में एकता का है और यही विचार पूरी दुनिया को जोड़ सकता है.

भागवत ने कहा कि जीवन में मौजूद विभिन्नताओं के बावजूद इंसान मूल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. उन्होंने इसे माला के मोतियों और उन्हें जोड़ने वाले धागे के उदाहरण से समझाया. उनके मुताबिक लोगों के शरीर, पहनावा, पूजा-पद्धति और जीवनशैली अलग हो सकती है, लेकिन सभी के भीतर मौजूद आत्मा उन्हें आपस में जोड़ती है. यही भावना स्थायी और कभी न खत्म होने वाली खुशी का आधार बनती है.

किसी को दबाकर किसी का विकास नहीं हो सकता है: मोहन भागवत

अपने भाषण में उन्होंने कहा कि इंसान केवल व्यक्तिगत सफलता हासिल करके संतुष्ट नहीं हो सकता. समाज को दबाकर व्यक्ति का विकास या व्यक्ति को दबाकर समाज की प्रगति संभव नहीं है. 

उन्होंने कहा कि व्यक्ति, समाज और पर्यावरण तीनों को साथ-साथ आगे बढ़ना होगा. इसी तरह शरीर, मन और बुद्धि के बीच भी संतुलन जरूरी है. यही वह सिद्धांत है जो समाज को टूटने नहीं देता और सबको एक सूत्र में बांधे रखता है.

मोहन भागवत ने आधुनिक जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की सीमाओं पर भी चर्चा की. उन्होंने न्यूयॉर्क के डोनट का उदाहरण देते हुए कहा कि भौतिक सुख क्षणिक होते हैं और हमेशा संतुष्टि नहीं दे सकते. 

उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति एक समय में चाहे जितने स्वादिष्ट डोनट खा ले, कुछ समय बाद वही चीज आकर्षण खो देती है. अगले दिन फिर वही इच्छा लौट आती है. इससे स्पष्ट होता है कि केवल भौतिक साधनों से स्थायी खुशी हासिल नहीं की जा सकती.

इंसान की सोचने की क्षमता की सबसे बड़ा वरदान: RSS चीफ

मोह भागवत ने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सोचने की क्षमता है. यह एक वरदान है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह किस दिशा में सोचता है. भागवत के अनुसार सही विचार इंसान को ईश्वर के करीब ले जाते हैं, जबकि गलत सोच उसे पशु प्रवृत्तियों की ओर धकेल सकती है. इसलिए विचारों की दिशा ही इंसान के चरित्र और समाज के भविष्य को तय करती है.

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया की जिम्मेदारी इंसानों पर है और मानव समाज को व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना होगा. उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी सीमाओं से ऊपर उठकर मानव कल्याण के लिए कार्य करना है. भगवान ने मनुष्य को सही और गलत में अंतर करने की क्षमता दी है और इसी क्षमता का उपयोग करके वह बेहतर समाज का निर्माण कर सकता है.

भारत का क्या है दायित्व?

आरएसएस चीफ ने भारत की भूमिका पर भी खासा जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दायित्व दुनिया को ‘एकता में विविधता’ का संदेश देना है. भारत में विविधता कोई चुनौती नहीं बल्कि ताकत है. उन्होंने कहा कि विविधता को दबाने की नहीं बल्कि उसका उत्सव मनाने की जरूरत है. यही भारत का स्वभाव है और यही उसकी पहचान भी है.

उन्होंने कहा कि हर राष्ट्र का अपना मिशन और विजन होता है. भारत का मिशन दुनिया को यह समझाना है कि अलग-अलग पहचान और परंपराओं के बावजूद मानवता एक है. उनके मुताबिक देश केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं होता, बल्कि उसकी संस्कृति, मूल्य और जीवन-दृष्टि उसकी असली पहचान बनाते हैं.

मोहन भागवत ने कहा कि मनुष्य के भीतर असीम संभावनाएं हैं और वह चाहे तो ‘नर से नारायण’ बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. उन्होंने लोगों से ऐसी खुशियों की तलाश करने का आह्वान किया जो स्थायी हों और भाईचारे, एकता तथा मानवता के आधार पर पूरी दुनिया को जोड़ सकें.

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