

नई दिल्ली:
लोकगीत आम जनता द्वारा लिखा और गाया जाने वाला पारंपरिक गीत हैं, जो किसी क्षेत्र,संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन से जुड़ा होता है. ये गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर और गाकर मौखिक रूप से आगे बढ़ते हैं. इन्हें ढोलक, करताल, झांझ या मंजीरा जैसे साधारण वाद्यों की मदद से गाया जाता है. ये अक्सर जन्म, विवाह और अन्य पारिवारिक संस्कारों के अवसर पर गाए जाते हैं. हाल के दिनों में ये गीत सोशल मीडिया पर खूब पसंद किए जा रहे हैं और वायरल हो रहे हैं. आज हम ऐसे ही एक लोकगीत के बारे में बात करेंगे, जो पूर्वांचल और बिहार के लोकगीतों में से है. वो गीत है ‘भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के’. यह सोहर गीत, पंवरिया शैली पर आधारित है.
‘भुअर भुअर बाल होरिलवा के’ वायरल
लोकगीतों में अक्सर बहु, सास, ननद, पति और ससुर की चर्चा होती है. प्रेम के इर्द-गिर्द उसके बोल लिखे जाते हैं. हालांकि भोजपुरी गाने ‘भुअर भुअर बाल होरिलवा के’ में इन रिश्तों अलग बुआ-फूफा, दादा-दादी और चाचा-चाची को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इस लोकगीत का संबंध पूर्वांचल और बिहार में बच्चे के जन्म में गाए जाने वाले सोहर गीतों से है.
पंवरिया शैली क्या है ?
पंवरिया शैली उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के गांवों में बच्चे के जन्म, मुंडन और शादी जैसे मौकों पर गाए जाने वाले गीतों को पंवरिया नाम दिया गया. कहा जाता है कि इस शैली का संबंध रामायण काल से है. दरअसल भगवान श्री राम के जन्म के समय पांवरिया गाने बजाने के लिए राज्य दशरथ के महल में पहुंचे थे. आज यह कला लुप्त होने के कगार पर है, हालांकि कुछ राज्यों में अब भी यह खूब लोकप्रिय है.
क्या है गाने का अर्थ
होरिलवा का मतलब नवजात शिशु है. गाने में शिशु के भूरे-भूरे बालों और गोल-मटोल गालों की चर्चा की गई है. भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के… फूलल फूलल गाल रे होरिलवा के.. यानी बच्चे के जन्म के बाद मां महलों की रानी और पिता रंगदार जैसे रुतबे वाले बन गए हैं. इसके बाद दादा को थानेदार और दादी को मुखिया का दर्जा दिया गया है. बुआ को छेना तो फूफा को करिया रसगुल्ला कहा गया है. बताते चलें कि इस खूबसूरत मंगल गीत को फेमस कवि और कहानीकार नीलोत्पल मृणाल ने लिखा और गाया है.





