खबर

बिहार के इस स्कूल में जितने बच्चे, उतने ही टीचर, छात्रों को पढ़ाने के लिए गुरुजी खुद सीख रहे संथाली भाषा | bihar-katihar-primary-school-teachers-learn-santhali-language-to-teach-students-success-story



Katihar School Success Story: बिहार के कटिहार जिले से शिक्षकों के समर्पण और छात्र-छात्राओं के प्रति उनके लगाव की एक ऐसी अद्भुत कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर आप भी कह उठेंगे कि शिक्षक ही सच में समाज का असली निर्माता होता है.यह पूरा मामला कटिहार प्रखंड की गरभेली पंचायत के अंतर्गत आने वाले प्राथमिक विद्यालय ‘बुढ़िया टीकर’ का है. यहां कक्षा 1 से लेकर कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए विद्यालय का संचालन किया जाता है. इस स्कूल की सबसे खास बात यह है कि यहां कुल 6 बच्चे नामांकित हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए भी 6 ही शिक्षक तैनात हैं.जहां अमूमन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का रोना रोया जाता है, वहीं इस अनोखे प्राथमिक विद्यालय में जितने छात्र हैं, उतने ही शिक्षक भी तैनात हैं. लेकिन असली चुनौती इस अनुपात की नहीं, बल्कि भाषा की थी.

भाषा बनी थी शिक्षा में बड़ी रुकावट

दरअसल, आदिवासी बहुल इस इलाके के बच्चों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उन्हें हिंदी भाषा न तो बोलनी आती थी और न ही वे इसे समझ पाते थे. स्कूल में संथाली (आदिवासी) भाषा के जानकार किसी शिक्षक या शिक्षिका की नियुक्ति नहीं होने के कारण, ये मासूम बच्चे प्रारंभिक शिक्षा के अक्षर ज्ञान से भी पूरी तरह वंचित रह जा रहे थे. 

संथाली सीखने की पहल

इसी हालात को देखते और समझते हुए अब विद्यालय के टीचर्स खुद आगे बढ़ने का फैसला किया. उन्होंने आदिवासी समाज के लोगों की मदद से संथाली भाषा सीखना शुरू किया.  अब वे खुद संथाली भाषा बोलकर बच्चों को प्रारंभिक अक्षर ज्ञान दे रहे हैं. हालांकि, शिक्षकों का यह भी मानना है कि यदि सरकार इस विद्यालय में संथाली भाषा के जानकार शिक्षकों की स्थायी बहाली कर दे, तो बच्चों के लिए आगे की पढ़ाई और भी आसान हो जाएगी.

कागज पर लिखकर याद करते थे संथाली शब्द

स्कूल की वरिष्ठ शिक्षिका कुमारी नीतू ने अपनी इस यात्रा और चुनौतियों को साझा करते हुए बताया कि ”यहां आदिवासी समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं. जिनकी भाषा एकदम अलग है और वो भाषा हमलोग नहीं समझ पाते थे और बच्चे भी हमारी भाषा नहीं समझ पाते थे,जब भाषा समझने में दिक्कत हुई तो ग्रामीणों और रसोइयां की मदद ली.हम संथाली भाषा के शब्दों को एक कागज पर लिखकर रख लेते थे और फिर उसे याद करते थे.”

वहीं, विद्यालय के एक अन्य शिक्षक भारतेंदु कुमार कहते हैं, “आदिवासी बस्ती के इस स्कूल में बच्चों की भाषा समझना वाकई एक बड़ी चुनौती थी. ग्रामीणों के सहयोग से सीखना संभव हुआ.हम सरकार से यही अनुरोध करना चाहते हैं कि जैसे अन्य भाषाओं के लिए विशेष शिक्षक दिए गए हैं, वैसे ही आदिवासी बहुल क्षेत्रों के स्कूलों में स्थानीय भाषा जानने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए.”




Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button