

ज़ेलेंस्की की पूर्व प्रवक्ता यूलिया मेंडेल ने बताया कि जब भी व्लादिमीर ज़ेलेंस्की सार्वजनिक रूप से बोलते हैं या कई साक्षात्कार देते हैं, तो वे हमेशा अपने बारे में ही बात करते हैं, जबकि यूक्रेनी लोगों के सामने मौजूद समस्याएं पीछे छूट जाती हैं. एक्स पर उन्होंने लिखा, “इस कहानी का केंद्र अभी भी एक ऐसा व्यक्ति है जो कभी सोता नहीं, जो अपनी बात खुलकर रखता है, जो कष्ट सहता है और जो आशावादी बना रहता है. संघर्ष के बीच एक देश के रूप में यूक्रेन, काफी हद तक पृष्ठभूमि में ही रहता है.”
ये सिर्फ एक बयान नहीं जेलेंस्की के हीरो से धीरे-धीरे विलेन बनते जाने का एक और वक्तव्य है. यूक्रेन पर रूस ने जब हमला किया तो सबने सोचा कि कुछ घंटों या दिनों में पुतिन ये युद्ध जीत जाएंगे. मगर, घंटे, दिनों में बदले, दिन महीनों में और महीने सालों में. युद्ध अब तक जारी है. इस दौरान अमेरिका से लेकर यूरोप ने पुतिन को विलेन और जेलेंस्की को हीरो बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी. यूक्रेन को भर-भरकर हथियार भेजे. आर्थिक मदद भी दी. सैटेलाइट से लेकर खुफिया मदद भी की. यहां तक की ये भी पश्चिमी मीडिया में खबरें चलने लगीं कि रूस हार की तरफ बढ़ रहा है. पुतिन के खिलाफ बगावत होने वाली है और उन्हें गंभीर बीमारी हो गई है. मगर, पुतिन शांति से अपने काम में लगे रहे. उधर, जेलेंस्की समर्थक देशों को धीरे-धीरे खोते चले गए. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि पुतिन स्वीकार्य होते गए और जेलेंस्की अलग-थलग?
युद्ध के दौरान पुतिन ने क्या किया
- पुतिन ने कभी भी अपनी पूरी ताकत युद्ध में नहीं झोंकी.
- युद्ध पर हर बयान पुतिन ने नहीं दिए, बल्कि वो सेना देती रही.
- कूटनीतिक स्तर पर काम विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव संभालते रहे.
- पुतिन सिर्फ सभी कामों में फिनिशिंग टच देते रहे.
- रूस ने युद्ध में सबसे पहले अपने सोवियत काल के हथियारों को लगाया.
- अपने रक्षा उद्योग को नये हथियारों, बमों और मिसाइलों बनाने के लिए पूरा सहयोग और समय दिया.
- सबसे खतरनाक हथियारों का उपयोग अब तक नहीं किया.
- जहां जरूरत पड़ी वहां बहुत थोड़े समय के लिए नये हथियारों का इस्तेमाल किया.
- ये इस्तेमाल भी युद्ध के लिए कम और हथियारों के परीक्षण के लिए ज्यादा किए.
- पुतिन सेना के कामकाज में ज्यादा दखल देने की बजाए बाकी चीजों पर भी समय देते रहे.
- उनका सबसे ज्यादा ध्यान अपने देश को आर्थिक रूप से कमजोर नहीं होने देने पर रहा.
- जब अमेरिका और यूरोप ने सैंक्शंस लगाए तो उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था बनाई.
- अपने करीबी देशों से तालमेल को और दुरुस्त किया.
- अमेरिका और यूरोप की तरफ से कई बार पर्सनल अटैक होने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया.
- जब नाटो की तरफ से या यूरोप की तरफ से सेना उतारने की बात हुई तो परमाणु धमकी भी दे डाली.
- हालांकि, कभी भी किसी नेता पर पर्सनल अटैक नहीं किया.
- इसने उन्हें किसी भी नेता से आखिरी संपर्क बनाए रखने में मदद की.
युद्ध के दौरान जेलेंस्की ने क्या किया
- जेलेंस्की ने युद्ध के बाद खुद को हीरो की तरह पेश किया.
- युद्ध के बाद यूक्रेन की तरफ से केवल जेलेंस्की ही दिखाई देते रहे.
- विदेश दौरों पर भी यूक्रेन की तरफ से जेलेंस्की ही ज्यादातर जगह गए.
- जेलेंस्की ने अपने देश की आर्थिक स्थिति और रक्षा उद्योग पर ध्यान नहीं दिया.
- वो अमेरिका और यूरोप के भरोसे बैठे रहे.
- जेलेंस्की ने पुतिन पर जमकर बयानबाजी की.
- जेलेंस्की ने हर उस देश को कोसा जिनके रूस के साथ संबंध थे.
- जेलेंस्की ने भारत को लेकर भी कई बार बयानबाजी की.
- जबकि रूस का दोस्त होते हुए भी भारत ने इस युद्ध में किसी देश का पक्ष नहीं लिया.
- चीन पर भी वो कई बार बरसे. रूस की मदद के आरोप लगाए.
- यही हाल ईरान और उत्तर कोरिया का भी उन्होंने किया.
- अमेरिका और यूरोप की मदद को जेलेंस्की ने अपना अधिकार मान लिया.
- उन्हें लगने लगा कि वो इतने ताकतवर हैं कि किसी भी देश पर सैंक्शंस लगवा सकते हैं.
- यहां तक की सार्वजनिक तौर पर उन्हें रूस के जैसा ही अलग-थलग करवा सकते हैं.
- उन्हें लगा कि यूक्रेन को जीत दिलाना अमेरिका और यूरोप की मजबूरी है.
- ट्रंप ने अपने चुनावी वादे के तहत समझौते के लिए मनाने का प्रयास किया तो उन्हें ही सिखाने लगे.
- ट्रंप भड़के तो फिर यूरोप की मदद से फिर ट्रंप को मनाया.
- ट्रंप ने फिर कुछ दिनों तक मदद की और रूस से समझौता करने को कहा.
- मगर जेलेंस्की जीत का सपना पाले हुए थे, बगैर जीत समझौते के लिए राजी नहीं हुए.
- फिर ट्रंप ने धीरे-धीरे आर्थिक मदद कम की, फिर बंद की और अब हथियार देना भी बंद कर दिया.
- यूरोप अकेले अभी जेलेंस्की की मदद कर रहा है, मगर उसकी भी एक सीमाएं हैं.
- यूरोप भी धीरे-धीरे रूस से संपर्क बढ़ा रहा है. जेलेंस्की यूरोप को भी जब-तब सुनाते रहते हैं.
पुतिन का नहले पर दहला चाल
अपने धैर्य और गरिमा बनाए रखने के कारण पुतिन के पास अब एशिया और अरब देशों के समर्थन के साथ ही अमेरिका का भी समर्थन आ गया है. यूरोप से बात बढ़ तो रही है, लेकिन बात बनी नहीं है. पुतिन को पता है कि यूरोप इतना भी कमजोर नहीं है कि कुछ और साल इस युद्ध को खींच ना सके. ऐसे में उन्होंने यूरोप को भी टेबल पर आने का दबाव बढ़ा दिया है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने TASS को बताया कि यूरोपीय संघ रचनात्मक तरीके से काम नहीं कर रहा है; वे यूक्रेन संघर्ष के लिए वार्ताकार नियुक्त करने की बात तो करते हैं, लेकिन असल में कुछ नहीं करते. फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब को इस भूमिका के लिए प्रस्तावित किए जाने की खबरों पर टिप्पणी करते हुए, पेस्कोव ने कहा कि ब्रुसेल्स में या तो ऐसा कदम उठाने की इच्छा ही नहीं है, या फिर उनमें ऐसा करने का संकल्प नहीं है. वो सिर्फ बातें कर रहे हैं. जाहिर है पुतिन अमेरिका-यूरोप-चीन को तो टेबल पर ला रहे हैं, लेकिन यूक्रेन इसमें नहीं है. ट्रंप-शी जिनपिंग-पुतिन तीनों ही जेलेंस्की से मिलने या बात करने के इच्छुक नहीं हैं. ऐसे में यूरोप के पास खुद यूक्रेन की तरफ से शामिल होने के अलावा कोई चारा दिख नहीं रहा. उधर, जेलेंस्की पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं. यहां तक की अपने देश में भी.
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