
देहरादून:
वैसे तो पूरा ही हिमालयी क्षेत्र भूस्खलन के दायरे में है. हिमालय के क्षेत्र में लगातार बड़े-बड़े भूस्खलन हो रहे हैं और पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या और तीव्रता, दोनों में ही काफी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन नेपाल से सटा हुआ उत्तराखंड का पिथौरागढ़ भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है.
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने पिथौरागढ़ जिले के दारमा घाटी में भूस्खलन के खतरे, संवेदनशीलता और उससे जुड़े जोखिम का अध्ययन कर एक रिपोर्ट बनाई है.
इस रिपोर्ट में पिथौरागढ़ के दारमा घाटी का 9 प्रतिशत क्षेत्र ‘बहुत ज्यादा’ संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है. इसके साथ ही 22 फीसदी क्षेत्र को ‘मध्यम जोखिम’ वाले जोन में, 26 फीसदी क्षेत्र को ‘कम जोखिम’ और 43 फीसदी को ‘बहुत कम जोखिम’ वाले जोन में रखा है.
उत्तराखंड का 22% हिस्सा हाई रिस्क जोन में
रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में 22 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में है. उत्तराखंड के सभी 9 पर्वतीय जिले भूस्खलन की जद में है.
रिसर्चर की टीम ने पिथौरागढ़ की दारमा घाटी से 2001 से 2023 तक आए 295 भूस्खलन क्षेत्रों की हाई रिजॉलयूशन मैपिंग की. इस क्षेत्र में हर साल औसतन 2,000 से 2,500 मिलीमीटर बारिश होती है. खास बात यह है कि दारमा घाटी भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़ी है. साथ ही कैलाश मानसरोवर यात्रा जाने के लिए काफी अहम रास्ता है.
अपनी रिसर्च में रिसर्चर्स ने पाया कि बारिश के कारण भूस्खलन का खतरा 13% और भूकंप के कारण 9% तक बढ़ जाता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अगर बारिश और भूकंप दोनों एक साथ आ जाएं तो खतरा 32% तक बढ़ जाता है.
इस रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, दारमा घाटी की कुल आबादी का करीब 58 फीसदी आबादी इन्हीं ‘हाई रिस्क जोन’ में रह रही है.

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कमजोर हो रहीं चट्टानें
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि भूस्खलन वाले क्षेत्र में दक्षिण क्षेत्र की चट्टानें ज्यादा कमजोर हो गई हैं. सूरज की रोशनी और बार-बार बर्फ के पिघलने के कारण चट्टानें ज्यादा कमजोर हो रही हैं. रिसर्च में यह भी बताया गया है कि ढलान में वाली पहाड़ी भी भूस्खलन का बड़ा कारण है.
इसके अलावा सबसे बड़ा कारण यहां लगातार बन रही सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर भी है. सड़कों के कारण 300 मीटर के दायरे में 36.48 प्रतिशत और नदियों या फिर जलधारा के 300 मीटर के दायरे में 53.84 प्रतिशत भूस्खलन क्षेत्र पाए गए हैं. वही ‘हाई रिस्क’ और ‘वेरी हाई रिस्क’ जोन 9% क्षेत्र है.

58% पर आबादी पर मंडरा रहा खतरा
दारमा वैली क्षेत्र में रिसर्च में यह भी पाया गया की 58% आबादी हाई या वेरी हाई रिस्क वाले क्षेत्र में रह रही है. दारमा में सबसे ज्यादा वेरी हाई रिस्क जोन में धार गांव सीधे तौर पर खतरे की जड़ में है. जमकु, खेत, नगलिंग, सोबला, बॉउलिंग और तवा घाट गांव भी हाई रिस्क जोन में है.
दारमा घाटी का क्षेत्र करीब 1,364 वर्ग किलोमीटर है और इसकी लंबाई दारमा नदी के साथ करीब 91 किलोमीटर है. दारमा घाटी में तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार, बालिंग, बालिंग, चांलकाम, उर्थिंग, मंडप, नागलिंग, फिलम, दुग्तू, बौन, गो, मार्चा, तिदांग और सिपु समेत कई गांव बसे हैं.
क्या करने की जरूरत है?
इस रिपोर्ट में कुछ सुझाव भी दिए गए हैं. रिसर्चर ने सुझाव दिया है कि हाई रिस्क वाले गांव में रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज चैनल और इमरजेंसी विस्थापन की योजना बनाई जानी चाहिए. इसके अलावा सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में भी वैज्ञानिक पद्धति से काम होना चाहिए.
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