
Parivartini Ekadashi 2026: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है. साल 2026 में परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा. पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात से शुरू होगी और 22 सितंबर की रात तक रहेगी.
परिवर्तिनी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के चातुर्मास में करवट बदलने से जोड़ा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. इस व्रत में केवल उपवास ही नहीं, बल्कि मन, वाणी और आचरण की शुद्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है. ऐसे में अगर आप 22 सितंबर को एकादशी व्रत रखने वाले हैं तो इसकी तैयारी 21 सितंबर यानी दशमी तिथि से ही शुरू करना उचित माना जाता है.
दशमी की रात हल्का और सात्विक भोजन करें
एकादशी व्रत की तैयारी दशमी से ही मानी जाती है. दशमी की रात भोजन हल्का और सात्विक रखना चाहिए. एकादशी व्रत की विधि में दशमी तिथि पर मांसाहार, प्याज, मसूर दाल आदि से बचने की बात कही गई है. कई परंपराओं में दशमी की रात अनाज का सेवन न करने की भी सलाह दी जाती है, ताकि अगले दिन व्रत के संकल्प में बाधा न आए.
मन और वाणी पर संयम रखें
एकादशी को केवल भोजन का त्याग नहीं माना गया है. इस व्रत में झूठ बोलने, कटु वचन कहने, छल-कपट और अनावश्यक विवाद से दूर रहने की परंपरा है. इसलिए 21 सितंबर से ही मन को शांत रखें और किसी के प्रति क्रोध या अपशब्दों से बचें. धार्मिक मान्यता में व्रत की सफलता के लिए आचरण की शुद्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है.
घर और पूजा स्थान की सफाई करें
एकादशी से पहले घर के पूजा स्थान की सफाई करना और भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करना शुभ माना जाता है. 21 सितंबर को पूजा स्थल साफ करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की सामग्री तैयार कर सकते हैं. अगले दिन स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लेकर पूजा करें.
दशमी से ही भगवान विष्णु का स्मरण बढ़ाएं
परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है. इसलिए 21 सितंबर से ही विष्णु मंत्र, विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या भगवान विष्णु के नाम का स्मरण किया जा सकता है. एकादशी की धार्मिक परंपरा में कथा श्रवण और भगवान के नाम का जाप भी महत्वपूर्ण माना गया है.
एकादशी के साथ द्वादशी पारण का भी रखें ध्यान
व्रत का समापन सही समय पर करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है. एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी को सूर्योदय के बाद किया जाता है और इसे द्वादशी तिथि के भीतर करने की परंपरा है. हरि वासर में पारण नहीं किया जाता.
संतान सप्तमी व्रत इन 5 लोगों के लिए है वरदान, हर मुराद होती है पूरी!
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
