
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में आए भीषण सैलाब ने पुल, सड़कें, इमारतें और बस्तियां तक बहा दीं. इस आपदा को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष मेहता ने NDTV से विशेष बातचीत में कहा कि यह इस सदी का सबसे बड़ा विनाशकारी सैलाब हो सकता है. उनके अनुसार उत्तराखंड में केदारनाथ, रैणी, धराली और हाल में तमक नाले में आई आपदाओं की तरह ही यह घटना भी हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बदलते पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक असर की चेतावनी है.

Nepal Flood Disaster Manish Mehta Wadia Institute
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सदी की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक : डॉ. मनीष मेहता
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष मेहता ने NDTV से विशेष बातचीत में कहा कि नेपाल में आया सैलाब इस सदी की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक माना जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस सैलाब का वेग इतना अधिक था कि उसके रास्ते में आने वाली लगभग हर चीज बह गई. बड़े-बड़े पुल, मकान, इमारतें, चट्टानें और पहाड़ी ढांचे तक इस प्रवाह के सामने टिक नहीं सके.
इस सैलाब का वेग इतना था कि उसके सामने आने वाली हर चीज, हर पहाड़, पत्थर, पुल, घर और बड़ी-बड़ी बिल्डिंग को एक तिनके की तरह उखाड़ दिया.’

Nepal Flood Disaster: सदी की सबसे बड़ी आपदा : मनीष मेहता
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ग्लोबल वार्मिंग को बताया बड़ा कारण
डॉ. मनीष मेहता का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के पीछे ग्लोबल वार्मिंग एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है. उन्होंने कहा कि जिन ऊंचाइयों पर पहले बर्फबारी होती थी, अब वहां बारिश दर्ज की जा रही है. लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई तक बारिश होना हिमालयी क्षेत्रों के लिए गंभीर चेतावनी है. उनके अनुसार, ‘जिस ऊंचाई पर बारिश नहीं होनी चाहिए, अब उस ऊंचाई पर बारिश हो रही है. बर्फ की जगह 4000 मीटर तक बारिश हो रही है.’ उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं. ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके सामने और आसपास बड़ी मात्रा में मलबा, पत्थर, बोल्डर और रेत जमा रह जाते हैं. जब इन क्षेत्रों में तेज बारिश होती है तो भारी मात्रा में पानी जमा होता है और किसी ट्रिगर घटना के बाद पूरा मलबा नीचे की ओर बह निकलता है.

Nepal Flood Disaster: जलप्रलय क्यों हुई?
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लैंडस्लाइड और ग्लेशियर झील टूटने की आशंका
डॉ. मेहता ने NDTV को बताया कि जिस क्षेत्र में नेपाल में यह आपदा आई है, वहां बहुत बड़े स्तर पर लैंडस्लाइड होने की संभावना दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा,’जिस जगह पर नेपाल में यह सैलाब आया है वहां बहुत बड़ा लैंडस्लाइड हुआ है. लैंडस्लाइड की वजह से ग्लेशियर टूटकर नीचे बनी किसी झील से टकराया होगा और झील टूटने से नीचे की ओर विनाशकारी सैलाब आया है.’ उन्होंने बताया कि प्रभावित क्षेत्र में बड़ी मात्रा में ग्लेशियरों द्वारा छोड़ा गया मलबा मौजूद था. वीडियो फुटेज को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि हजारों टन मलबा पानी के साथ नीचे बहा और उसने भारी तबाही मचाई. उन्होंने कहा कि प्रारंभिक संकेत यही बताते हैं कि बड़े पैमाने पर लैंडस्लाइड ने ग्लेशियर और उसके आगे मौजूद झील को ट्रिगर किया, जिसके बाद पानी और मलबे का विशाल प्रवाह नीचे की ओर आया.
केदारनाथ, रैणी और धराली जैसी आपदाओं की मिली झलक
डॉ. मनीष मेहता ने कहा कि नेपाल की यह आपदा उत्तराखंड में पहले घटित हो चुकी कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं की याद दिलाती है. उनके अनुसार यह घटना 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की रैणी आपदा, धराली क्षेत्र की घटनाओं और हाल में तमक नाले में आए सैलाब जैसे मामलों का बड़ा स्वरूप प्रतीत होती है. उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इन सभी के पीछे ग्लेशियर, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा और भू-संरचनात्मक अस्थिरता जैसे कारक जुड़े हुए हैं.
उत्तराखंड में भी खतरे की घंटी
NDTV से बातचीत में डॉ. मेहता ने उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने उत्तराखंड में 13 ऐसी ग्लेशियर झीलों की पहचान की है जिन्हें अत्यंत संवेदनशील और संभावित रूप से खतरनाक माना गया है. डॉ. मेहता के अनुसार, ‘उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में 416 से अधिक ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, लेकिन इनमें से 13 झीलें बेहद खतरनाक श्रेणी में हैं और पांच झीलें सबसे अधिक संवेदनशील मानी जाती हैं.’ उन्होंने कहा कि इन झीलों की लगातार निगरानी करना, वैज्ञानिक अध्ययन बढ़ाना और जरूरत पड़ने पर उनका नियंत्रित जल निकास करना बेहद आवश्यक है.
अर्ली वार्निंग सिस्टम पर जोर
डॉ. मनीष मेहता ने बताया कि उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और अन्य संस्थाएं संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में काम कर रही हैं. इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी झील में असामान्य गतिविधि होती है या उसके टूटने का खतरा पैदा होता है तो समय रहते निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को चेतावनी दी जा सके. उन्होंने कहा कि नेपाल की ताजा आपदा हिमालयी राज्यों के लिए एक बड़ा सबक है और ऐसे जोखिमों को गंभीरता से लेने की जरूरत है.
ज्यादा गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन करने की जरूरत
डॉ. मेहता ने स्पष्ट किया कि नेपाल में आई इस आपदा के वास्तविक कारणों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है. हालांकि शुरुआती संकेत बड़े लैंडस्लाइड, ग्लेशियर गतिविधि, भारी वर्षा और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव की ओर इशारा कर रहे हैं. उनका कहना है कि पूरी जांच और वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद ही आपदा के सही कारणों की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी.
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