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‘ना तू नाच सकता है…ना एक्टिंग कर सकता है’ ये कहकर किया गया था रिजेक्ट, आज 75 की उम्र में भी साउथ का सबसे बड़ा सितारा है ये एक्टर, कर चुका है 400 से ज्यादा फिल्में | This 75 year old south super star was once rejected saying you cant dance and act now he has done more than 400 films



नई दिल्ली:

मलयालम सिनेमा में जब भी बड़े सितारों की बात होती है, ममूटी का नाम सबसे आगे आता है. पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में सैकड़ों फिल्मों और किरदारों के जरिए उन्होंने अलग पहचान बनाई. ममूटी का सफर सीधे फिल्मों से शुरू नहीं हुआ था. वह पहले वकालत करते थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें उस रास्ते से निकालकर कैमरे के सामने ला खड़ा किया और फिर एक वकील धीरे-धीरे मलयालम सिनेमा का मेगास्टार बन गया. ममूटी का असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है. उनका जन्म 7 सितंबर 1951 को हुआ था. केरल में पले-बढ़े ममूटी ने पढ़ाई के बाद एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने केरल की अदालतों में वकालत भी की लेकिन अभिनय का सपना उनके जीवन में पहले से मौजूद था. पढ़ाई के दिनों में ही उन्हें फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करने का मौका मिला था.

ममूटी ने 1971 में फिल्म ‘अनुभवंगल पालिचाकल’ में एक बाल कलाकार के रूप में कैमरे के सामने अभिनय किया. हालांकि उस समय उनकी भूमिका बहुत छोटी थी, लेकिन फिल्मों के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया. इसके बाद उन्हें कुछ और छोटे मौके मिले और फिर 1980 में ‘विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल’ के जरिए उन्हें पहचान मिली. इसके बाद ममूटी ने धीरे-धीरे मुख्य भूमिकाओं की ओर कदम बढ़ाया और जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाने लगी.

रिजेक्शन को किया इग्नोर

ममूटी को लेकर कहा जाता है कि एक बार एक डायरेक्टर ने उन्हें यह कहकर रिजेक्ट किया था कि वह ना तो डांस कर सकते हैं ना ही एक्टिंग कर सकते हैं. उन्हें वकालत की दुनिया में लौट जाना चाहिए लेकिन ममूटी ने इस रिजेक्शन को दिल से नहीं लगाया. 

1980 बना करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट

1980 का दशक ममूटी के करियर के लिए बेहद अहम साबित हुआ. ‘अहिंसा’, ‘संध्याक्कु विरिंजा पूवु’, ‘अथिरात्रम’, ‘यात्रा’, ‘निराकूट्टू’ और ‘न्यू दिल्ली’ जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच मजबूत पहचान दिलाई. समय के साथ ममूटी ने मलयालम सिनेमा में अपनी जगह इतनी मजबूत कर ली कि वह इंडस्ट्री के बड़े सितारों में गिने जाने लगे. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘मथिलुकल’, ‘विदेयन’, ‘पोंथन माडा’ और ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय की आलोचकों ने भी खूब तारीफ की. ‘डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर’ में उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर का किरदार निभाया और यह उनके करियर के सबसे यादगार प्रदर्शनों में शामिल रहा.

ममूटी ने सिर्फ मलयालम फिल्मों तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया. अलग-अलग भाषाओं और तरह-तरह के किरदारों में खुद को ढालने की उनकी क्षमता ने उन्हें क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे पहुंचाया. उन्होंने अपने करियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और आज भी वह नए विषयों और अलग तरह की कहानियों को चुनने से पीछे नहीं हटते.

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ममूटी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं. इसके अलावा उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कारों और फिल्मफेयर दक्षिण पुरस्कारों से भी कई बार सम्मानित किया गया है. सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्म श्री से सम्मानित किया था. 70 की उम्र पार करने के बाद भी ममूटी के काम करने का जुनून कम नहीं हुआ है। आज भी वह लगातार नई फिल्मों और चुनौतीपूर्ण किरदारों का हिस्सा बन रहे हैं.






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