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दुनिया का सबसे डेंजर जोन बन गया नेपाल, हर साल आती हैं बाढ़-लैंडस्लाइड और भूकंप, जमीन के अदंर छिपा है राज | Why Nepal is Vulnerable to floods landslides earthquake geography explained


प्रकृति जब रौद्र रूप दिखाती है, तो इंसान की बसाई बस्तियां और कंक्रीट के मजबूत पुल पल भर में तिनके की तरह बिखर जाते हैं. नेपाल में बुधवार की सुबह कुछ ऐसा ही खौफनाक मंजर देखने को मिला, जहां अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी है. भोटे कोशी और त्रिशूली नदी के उफान ने रसुवा समेत तीन जिलों में जिंदगी को तहस-नहस कर दिया. सड़कें, होटल, गाड़ियां और टावर सब कुछ सैलाब के भीषण वेग में समा गए.

इस भीषण आपदा में अब तक 157 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि करीब 750 लोग अब भी लापता हैं, जिनमें 133 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं. आखिर हिमालय की ऊंची चोटियों पर ऐसा क्या हुआ कि अचानक मौत का यह सैलाब घाटी की ओर दौड़ पड़ा? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और NRSC के शुरुआती सैटेलाइट विश्लेषण ने इस तबाही के पीछे की हैरान करने वाली वजह का खुलासा किया है, जहां 4.9 तीव्रता के भूकंप के बाद एक विशाल ग्लेशियर टूटकर गिरा और इस महाप्रलय की वजह बना. लेकिन ये पहली बार नहीं है, जब नेपाल में इस तरह का प्रलय आया है. इतिहास में नेपाल अक्सर इस तरह की प्राकृतिक आपदा का शिकार रहा है. इसमें सबसे बड़ी वजह है इसका भूगोल. नेपाल देश एक पूरी तरह से लैंडलॉक देश हैं और हिमालय की तराई में बसा है.  

Why Nepal is Vulnerable to floods landslides earthquake geography explained

जून से सितंबर तक चलने वाले इन चार महीनों में ही पूरे साल की करीब 80 फीसदी बारिश बरस जाती है. जरा समझिए कि जब एक तरफ आसमान से मूसलाधार बारिश गिरती है और दूसरी तरफ हिमालय के ग्लेशियर पिघलते हैं, तो नदियां कैसे विकराल रूप ले लेती हैं. यह उफनता हुआ पानी और भारी मलबा पहाड़ों की संकरी घाटियों को चीरते हुए सीधे मैदानी इलाकों की तरफ तबाही बनकर दौड़ता है. खेत-खलिहान और रिहायशी बस्तियां पूरी तरह जलमग्न हो जाती हैं. वहीं मध्य पहाड़ों में लैंडस्लाइड और अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड कहर बरपाती है, तो ऊंची घाटियों में मलबे का बहाव सब कुछ बहा ले जाता है. यह कोई एक बार की घटना नहीं है; तबाही और मौतों का यह खौफनाक मंजर हर साल इसी तरह दोहराया जाता है. अब सवाल उठता है कि आखिर नेपाल दुनिया में सबसे ज्यादा आपदा-ग्रस्त देशों में क्यों गिना जाता है. 

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इसका जवाब नेपाल के बेहद जटिल भूगोल और वहां की परिस्थितियों में छिपा है.

जमीन के नीचे लगातार बढ़ता दबाव: सबसे पहली वजह है नेपाल की जमीनी बनावट. नेपाल ठीक उस जगह पर टिका है, जहां इंडियन टेक्टोनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट के नीचे उत्तर की तरफ खिसक रही है. प्लेटों की इस आपसी टक्कर से जमीन के नीचे भारी दबाव बनता है, जो रह-रहकर दुनिया के सबसे विनाशकारी भूकंपों का रूप ले लेता है.  

चंद किलोमीटर में ऊंची चोटियों से गहरी खाई तक: दुनिया की सबसे ऊंची हिमालयी चोटियों से लेकर संकरी घाटियों और सपाट मैदानी इलाकों के बीच की दूरी बहुत ही कम है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पहाड़ों में कहीं भी हलचल हुई, तो भारी चट्टानें, मिट्टी और पानी पलक झपकते ही जानलेवा रफ्तार से नीचे की तरफ दौड़ पड़ते हैं. 

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चार महीने की मूसलाधार बारिश: हर साल चार महीने मानसून आफत बनकर बरसता है. इसके चलते लैंडस्लाइड, फ्लैश फ्लड और नदियों में उफान रोज की बात हो जाती है. उस पर मजबूरी यह है कि सीमित संसाधनों के कारण यहां की एक बड़ी आबादी बिना किसी भूकंपरोधी तकनीक के, सीधे खतरनाक ढलानों या नदियों के किनारे बने घरों में रहने को लाचार है.

खौफनाक सच्चाई

‘नेपाल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन पोर्टल’ के अनुसार, भूकंप के जोखिम के मामले में नेपाल दुनिया भर में 11वें पायदान पर है. 2021 की जनगणना के मुताबिक, नेपाल के 99 फीसदी वार्ड यानी पूरा देश किसी न किसी आपदा की जद में हैं. देश के 63.6% वार्ड बाढ़ के खतरे का सामना कर रहे हैं, जबकि 59.7% वार्डों पर लगातार लैंडस्लाइड का साया मंडराता रहता है.  

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नेपाल में बाढ़ और लैंडस्लाइड का कहर 

1993 का वह खौफनाक मंजर: उस साल आई भीषण आपदा को नेपाल आज तक नहीं भूला है, जब लैंडस्लाइड और मलबे के बहाव ने 44 जिलों में 1,259 लोगों की जान ली थी. 47 अरब रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ था.

पेड़ों का अंधाधुंध कटान, बिना प्लानिंग की सड़कें

पेड़ों की जड़ें पहाड़ों की ढलान को बांधकर रखती हैं. जैसे-जैसे जंगल साफ हुए, पहाड़ों की ढाल बिल्कुल कमजोर पड़ गई. बीते कुछ दशकों में पहाड़ों पर अंधाधुंध बुलडोजर चले हैं. कमजोर ढलानों को काटकर बनाई जा रही सड़कें बारिश होते ही मलबे का सैलाब बन जाती हैं.

मौतों का सबसे बड़ा कारण लैंडस्लाइड

पिछले 10 सालों (2015-2024) में मॉनसून के दौरान हुई कुल 2,317 मौतों में से 1,296 मौतें सिर्फ लैंडस्लाइड की वजह से हुईं. अक्टूबर 2025 में पूर्वी नेपाल के इलाम (Ilam) जिले में एक ही वीकेंड पर लैंडस्लाइड ने ऐसा कहर बरपाया कि 37 लोगों की जान चली गई और रातों-रात पूरे गांव के गांव नक्शे से मिट गए.

नेपाल में बार-बार विनाशकारी भूकंप, इसके पीछे की असली वजह समझें

हिमालय की खूबसूरत वादियां और नेपाल पर मंडराता महाविनाशक भूकंपों का खतरा ये दोनों असल में पृथ्वी की दो सबसे बड़ी टेक्टोनिक प्लेटों की भीषण टक्कर का नतीजा हैं. करोड़ों साल पहले जब भारतीय प्लेट उत्तर की तरफ खिसकते हुए यूरेशियन प्लेट के नीचे धंसने लगी, तब इस जबर्दस्त टक्कर से हिमालय पर्वतमाला का निर्माण हुआ. यह सिलसिला थमा नहीं है. आज भी भारतीय प्लेट हर साल लगभग 40 से 50 मिलीमीटर की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है. 

जमीन के नीचे बारूद की तरह जमा होती है ऊर्जा?

इस पूरे इलाके में एक मुख्य फॉल्ट लाइन है, जिसे मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT) कहा जाता है. दोनों प्लेटों की रगड़ से यहां दशकों और सदियों तक भारी दबाव जमा होता रहता है. जब यह फॉल्ट इतना भारी खिंचाव और दबाव बर्दाश्त नहीं कर पाता, तो यह संचित ऊर्जा अचानक एक झटके में बाहर निकलती है. और जब-जब यह ऊर्जा फटती है, नेपाल दहल उठता है. 

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नेपाल के भूकंप इतने विनाशकारी क्यों साबित होते हैं?

कम गहराई (Shallow Depth): हिमालयी क्षेत्र में आने वाले ज्यादातर भूकंप जमीन की ऊपरी सतह के काफी करीब होते हैं. भूकंप का केंद्र कम गहरा होने की वजह से तरंगों की ऊर्जा सीधे ऊपर जमीन पर मौजूद बस्तियों, मकानों और इंसानी आबादी से टकराती है, जिससे भारी तबाही मचती है. 

टिक-टिक करती टाइम बम जैसी घड़ी

भूवैज्ञानिकों ने हिमालयन फॉल्ट के कई हिस्सों में ‘सीस्मिक गैप’ (Seismic Gap) की पहचान की है. इसका सीधा मतलब यह है कि इन इलाकों में बहुत लंबे समय से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, जिससे जमीन के नीचे बेहिसाब ऊर्जा कैद हो चुकी है. ऐसे में यहां भविष्य में किसी बड़े भूकंप की आशंका सिर्फ एक संभावना नहीं, बल्कि लगभग तय मानी जा रही है.2013 के एक बड़े शोध के मुताबिक, पूर्वी नेपाल के इलाके में मेन फ्रंटल थ्रस्ट पर हर 750 से 870 साल के अंतराल में औसतन 8 या उससे अधिक तीव्रता का महाभूकंप आता है. खतरे की यह घड़ी लगातार टिक-टिक कर रही है. 

नेपाल में प्राकृतिक आपदाओं का भयावह इतिहास

1934 का नेपाल-बिहार महाभूकंप

– 15 जनवरी 1934 को आए 8.0 तीव्रता के इस जलजले ने उत्तरी बिहार और नेपाल को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था.
– माउंट एवरेस्ट के पास केंद्र वाले इस महाविनाश में लगभग 12,000 लोग चंद मिनटों में काल के गाल में समा गए थे. 

1988 का सीमावर्ती भूकंप

– 20 अगस्त 1988 को 6.9 तीव्रता के झटके से नेपाल का उदयपुर जिला और बिहार का सीमावर्ती इलाका बुरी तरह दहल उठा था.
– इस त्रासदी में 1,003 लोगों की मौत हुई और लगभग 5 लाख लोग बेघर होकर दाने-दाने को मोहताज हो गए थे. 

1993 की विनाशकारी जल प्रलय

– जुलाई 1993 की मूसलाधार बारिश ने बागमती बैराज को ध्वस्त कर नेपाल के इतिहास की सबसे भयावह मौसमी तबाही मचाई थी.
– हजार साल में एक बार आने वाली इस भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने 700 से ज्यादा जिंदगियों को लील लिया था. 

2014 का सुनकोशी भूस्खलन और हिमस्खलन

– अगस्त 2014 में जुरे गांव का पहाड़ खिसकने से सुनकोशी नदी रुक गई और कृत्रिम झील बनने से 150 से अधिक लोग मारे गए थे.
– इसी साल अप्रैल में खुंबू आइसफॉल पर आए भीषण एवलांच की चपेट में आकर 16 जांबाज शेरपा गाइडों की जान चली गई थी. 

2017 और 2024 की मानसूनी बाढ़ का कहर

– साल 2017 में आई मानसूनी बाढ़ ने पूरे तराई क्षेत्र को जलमग्न कर दिया था, जिसमें 140 से ज्यादा मौतें हुईं और लाखों लोग प्रभावित हुए.
– सितंबर 2024 में काठमांडू घाटी में हुई रिकॉर्डतोड़ बारिश और भूस्खलन ने एक बार फिर 240 से ज्यादा लोगों की जान ले ली. 

2015 का महाविनाशक ‘गोरखा भूकंप’

– 25 अप्रैल 2015 को बारपाक केंद्र वाले इस भयानक भूकंप ने काठमांडू की ऐतिहासिक धरोहरों को खंडहर बना दिया था.
– 1934 के बाद की इस सबसे खौफनाक त्रासदी में नेपाल और पड़ोसी देशों को मिलाकर कुल 8,962 लोगों की मौत हुई थी. 

2023 का जाजरकोट भूकंप

– 3 नवंबर 2023 की रात जाजरकोट में आए 5.7 तीव्रता के भूकंप ने सोते हुए लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया.
– साल 2015 के बाद के इस सबसे जानलेवा झटके में 153 लोगों की जान चली गई और 375 से ज्यादा लोग घायल हुए. 




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