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जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपनी पहली सेंट्रलाइज्ड इंटेलिजेंस एजेंसी शुरू कर रहा है, जानिए क्यों महत्वपूर्ण | Japan first centralized intelligence agency since World War II find out why this is significant


जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार एक नई सेंट्रलाइज्ड इंटेलिजेंस एजेंसी शुरू कर रहा है. नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो शुक्रवार से औपचारिक रूप से शुरू हुआ. यह पुरानी व्यवस्थाओं की जगह लेगा. जानकारों का कहना है कि यह बड़े बदलावों की नींव रखेगा, जिनमें अमेरिका की CIA या UK की MI6 जैसी नई विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसी बनाना शामिल हो सकता है.

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने जुलाई में मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के हवाले से बताया कि उनके प्रशासन ने अपनी इंटेलिजेंस क्षमताओं को मजबूत करने के लिए सलाह लेने के मकसद से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे पश्चिमी सहयोगियों से संपर्क किया है. अब तक, जापान की मुख्य इंटेलिजेंस एजेंसी ‘कैबिनेट इंटेलिजेंस एंड रिसर्च ऑफिस’ (CIRO) रही है, जिसमें लगभग 700 कर्मचारी हैं, लेकिन उसके पास बहुत कम अधिकार हैं.

क्या करेगी ये खुफिया एजेंसी

टेम्पल यूनिवर्सिटी के जापान कैंपस में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर जेम्स डीजे ब्राउन ने कहा कि विदेश मंत्रालय, न्याय मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, नेशनल पुलिस एजेंसी और अन्य विभागों की इंटेलिजेंस टीमें जानकारी तो इकट्ठा करती हैं, लेकिन अक्सर इंटेलिजेंस को सही ढंग से या रणनीतिक तरीके से एक-दूसरे के साथ शेयर नहीं कर पातीं. ब्राउन ने जापान में रूस की जासूसी गतिविधियों पर एक किताब भी लिखी है. शुक्रवार से CIRO को ‘नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो’ में अपग्रेड किया गया.

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यह एक ऑपरेशनल और एडमिनिस्ट्रेटिव संस्था होगी, जो अलग-अलग सरकारी संस्थाओं से इंटेलिजेंस इकट्ठा करेगी और उसका एनालिसिस करेगी. सबसे अहम बात यह है कि इस ब्यूरो का महत्व बढ़ा दिया गया है और अब दूसरे मंत्रालयों के लिए अपनी जानकारी शेयर करना जरूरी कर दिया गया है. इसकी देखरेख नई बनी ‘नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल’ करेगी, जिसके प्रमुख ताकाइची होंगी और जिसमें बड़े मंत्री शामिल होंगे. इसके नेशनल इंटेलिजेंस के दायरे में आतंकवाद विरोधी कोशिशें, राष्ट्रीय आपातकालीन स्थिति में कार्रवाई और विदेशी इंटेलिजेंस (जैसे जासूसी या गुप्त रूप से प्रभाव डालने वाले ऑपरेशन) के खिलाफ जवाबी कार्रवाई शामिल होगी.

कभी थी सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी

कभी इंपीरियल जापान के पास सुरक्षा और खुफिया विभाग का एक खूंखार तंत्र था, जिसका इस्तेमाल 1900 के दशक की शुरुआत में असहमति को दबाने के लिए उसके अपने ही नागरिकों के खिलाफ किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद, देश में लोकतंत्र लाने और उसकी इंटेलिजेंस एजेंसी की ताकत कम करने की जान-बूझकर कोशिश की गई. लेकिन इसका मतलब यह है कि जापान में अब कुछ बड़ी कमजोरियां हैं – जो एक ऐसे विकसित देश के लिए अजीब बात है जो भू-राजनीति में इतनी अहम भूमिका निभाता है.

उदाहरण के लिए, जापान के पास अपनी कोई विदेशी इंटेलिजेंस सर्विस नहीं है. रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) थिंक टैंक में इंडो-पैसिफिक सुरक्षा मामलों के सीनियर रिसर्च फेलो फिलिप शेटलर-जोन्स ने कहा कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड जैसे अमेरिका के दूसरे बड़े सहयोगियों की तुलना में यह बात अजीब है. उन्होंने कहा कि वहां जासूसी रोकने वाला कोई कानून भी नहीं है, जिसका मतलब है कि विदेशी जासूस और स्थानीय मुखबिर “कानून तोड़े बिना” जापान के अंदर से जानकारी इकट्ठा कर सकते हैं.

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शेटलर-जोन्स ने कहा, “युद्ध के बाद के हालात की वजह से यह एक अजीब स्थिति है. जापान पर कब्जे और उसके बाद अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंधों का मतलब था कि जापान सरकार को असल में ऐसा ज्यादा काम नहीं करना पड़ा, क्योंकि अमेरिका उनकी सुरक्षा करता था.” लेकिन इन कमजोरियों का जापान की सुरक्षा और दुनिया के दूसरे देशों के बीच उसकी स्थिति पर बड़ा असर पड़ता है. ब्राउन ने कहा, “जापान को जानकारी लीक करने वाला देश माना जा रहा है – और अगर ऐसा है, तो दूसरे देश जानकारी शेयर करने में हिचकिचाएंगे, क्योंकि हो सकता है कि अगले ही दिन वह जानकारी अखबारों में छप जाए या किसी विदेशी ताकत तक पहुंच जाए.”

इसके कुछ नतीजे और भी गंभीर हैं. जुलाई में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक चौंकाने वाली जांच में यह बात सामने आई कि कैसे मॉस्को ने इन कमजोरियों का फायदा उठाकर जापान के पुर्जे हासिल किए और उन्हें रूस पहुंचाया – जिनका इस्तेमाल बाद में यूक्रेन के खिलाफ मिसाइलों और ड्रोन में किया गया. जापान के पहले के नेताओं ने बदलाव लाने की कोशिश की है, जिनमें सबसे मशहूर पूर्व प्रधानमंत्री यासुहिरो नाकासोन थे. उन्होंने 1983 में चेतावनी दी थी कि जापान “जासूसों के लिए स्वर्ग” बन गया है. लेकिन जासूसी-रोधी कानून के लिए उनके प्रस्ताव – जिसमें मौत की सजा का प्रावधान था – का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और वह पास नहीं हो सका.

ब्राउन ने कहा कि इस विफलता की एक वजह यह भी थी कि यह सब दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बहुत जल्द बाद हो रहा था. इंपीरियल जापान द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की यादें लोगों के मन में अभी भी ताजा थीं – जिससे यह डर पैदा हो रहा था कि ऐसा कोई भी कानून या खुफिया तंत्र में सुधार, देश को फिर से निगरानी, ​​सैन्यवाद और दमन की ओर ले जा सकता है.

अभी क्यों पड़ी जरूरत?

जापान और दुनिया, दोनों के लिए हालात अब बहुत अलग हैं. ब्राउन ने कहा कि अब इतना समय बीत चुका है कि जापानी लोगों के मन से युद्ध की यादें और पुलिस-राज (पुलिस स्टेट) में लौटने का डर कम हो गया है. साथ ही, यह बात भी अब ज्यादा समझी जा रही है कि जापान को नए और बड़े खतरों का सामना करना पड़ रहा है. समुद्र के उस पार उत्तर कोरिया, चीन और रूस हैं. इन सभी के पास जासूसी की ऐसी ताकतवर क्षमताएं हैं, जिनसे निपटने के लिए जापान पूरी तरह तैयार नहीं है. अमेरिका का सहयोगी होने और अपने सैन्य ठिकानों पर लगभग 55,000 अमेरिकी सैनिकों को जगह देने की वजह से, जापान एक आसान और आकर्षक निशाना बन जाता है.

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ब्राउन ने कहा कि ये देश जापान में अमेरिकी सैनिकों की गतिविधियों और अमेरिका के नए हथियारों की तैनाती के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं. रूस राजनीतिक राज चुराने में दिलचस्पी ले सकता है, जैसे कि यूक्रेन को लेकर जापान की भविष्य की नीति क्या होगी. चीन जापानी कंपनियों से टेक्नोलॉजी से जुड़े राज हासिल करने की उम्मीद कर सकता है.

RUSI की शेटलर-जोन्स ने कहा कि जापानी लोग इसलिए भी ज्यादा चिंतित हैं क्योंकि ये तीनों देश अब पहले के कई सालों की तुलना में ज्यादा एकजुट हैं.”

इन सब बातों से यह एहसास होता है कि इस इलाके में सत्ता का संतुलन बदल रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि चीन का दबदबा बढ़ रहा है. शेटलर-जोन्स ने कहा, “ऐसा लगता है कि जापान को (अमेरिका के साथ) गठबंधन और खुद के लिए और ज्यादा कुछ करना होगा. यूरोप और यूक्रेन में युद्ध को देखते हुए यह एहसास और मजबूत हुआ है कि आपको सक्रिय रहना होगा – भले ही आप इतने भाग्यशाली हों कि आपके पास अमेरिका जैसा बड़ा और शक्तिशाली सहयोगी हो.”

ताकाइची, जिन्होंने जापान की सुरक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने का खुलकर समर्थन किया है, इस पजल का आखिरी हिस्सा हैं. इस साल फरवरी में हुए अचानक चुनाव में जबरदस्त जीत के बाद, अब संसद के ताकतवर निचले सदन में उनके पास ऐतिहासिक सुपर-मेजोरिटी है – जिससे बहुत कम विरोध के साथ कानूनी बदलाव करने का रास्ता साफ हो गया है.

यह विवादित क्यों है?

हर कोई इंटेलिजेंस में सुधार की कोशिशों के पक्ष में नहीं है. पब्लिक ब्रॉडकास्टर NHK के मुताबिक, कई सांसदों ने नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो बनाने वाले बिल का विरोध किया और मई में संसदीय वोटिंग से पहले इसके खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में 200 से ज्यादा लोग शामिल हुए. जापान में इतनी संख्या भी काफी बड़ी मानी जाती है.

NHK के अनुसार, कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद मकोतो ओनिकी ने कहा, “किसी देश का इंटेलिजेंस सिस्टम उसके सबसे ताकतवर संस्थानों में से एक होता है, और अगर इसे मनमाने ढंग से काम करने दिया जाए, तो यह नागरिकों के मानवाधिकारों का गंभीर और अनुचित तरीके से उल्लंघन कर सकता है.”

ओनिकी ने कहा, “मैं इस बिल का विरोध करता हूं. यह न सिर्फ निजी जानकारी और प्राइवेसी में बेवजह दखल की चिंताएं बढ़ाता है, बल्कि लोकतांत्रिक निगरानी जैसे किसी भी चेक-एंड-बैलेंस के बिना इसके अधिकार को भी मजबूत करता है — यह बिल गंभीर कमियों वाला है.”

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ताकाइची के एजेंडे में अगले कुछ मुद्दे – जासूसी-रोधी कानून और विदेशी खुफिया सेवा – शायद और ज्यादा विवाद पैदा करेंगे.

ब्राउन ने कहा, “दुनिया भर में ऐसे कानून हैं जो पूरी तरह से ठीक और लोकतांत्रिक हैं, लेकिन ऐसी तानाशाही सरकारें भी हैं जो आलोचकों पर मुकदमा चलाने के लिए ऐसे कानूनों का इस्तेमाल करती हैं.” उदाहरण के लिए, रूस अक्सर सरकार का विरोध करने वालों पर विदेशी एजेंट होने का आरोप लगाता है – जैसा कि उसने विपक्षी नेता और क्रेमलिन के आलोचक एलेक्सी नवलनी के साथ किया था, जिनकी जेल में हत्या कर दी गई थी.

शेटलर-जोन्स ने कहा कि सत्ता के इस दुरुपयोग से बचने के लिए, यूके और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में अपनी खुफिया एजेंसियों को जवाबदेह ठहराने के लिए सुनवाई, कमेटियां और दूसरे उपाय मौजूद हैं. उन्होंने जापान की नई खुफिया एजेंसी के बारे में आगे कहा, “हमने निगरानी के तरीकों के बारे में उतनी जानकारी नहीं देखी है जितनी हमें उम्मीद थी, इसलिए मुझे लगता है कि लोगों का इस बारे में सवाल पूछते रहना बिल्कुल सही है.”



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