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जब सभी धर्मों के लिए एक समान कानून तो फिर UCC से अनुसूचित जनजाति को छूट क्यों? Explained | uniform-civil-code-ucc-tribal-exemption-reasons-explained



नई दिल्ली:

मध्य प्रदेश में भी जल्द ही समान नागरिक संहिता (UCC) लागू हो सकती है. सोमवार को मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने विधानसभा में UCC बिल पेश कर दिया. इसे ‘मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता 2026′ नाम दिया गया है. हालांकि, यह बिल अभी पास नहीं हुआ है. एक दिन पहले ही इस बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दी थी.

अगर यह बिल पास हो जाता है तो UCC लागू करने वाला मध्य प्रदेश चौथा राज्य बन जाएगा. इससे पहले उत्तराखंड, गुजरात और असम में इसे लागू किया जा चुका है. पश्चिम बंगाल की सरकार भी इस पर काम कर रही है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है कि समान नागरिक संहिता का मकसद सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान न्याय सुनिश्चित करना है. उन्होंने कहा कि ‘हम ऐसा कानून लाएंगे, जिसमें राम, रहीम, रविंदर और रॉबिन सब एक समान होंगे.’

UCC में क्या-क्या है?

सीएम मोहन यादव ने बताया कि UCC सभी समुदायों में केवल एक ही शादी को अनिवार्य बनाता है और कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है.

उन्होंने कहा कि बिल के तहत अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच शादी पर रोक लगाई गई है और मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है. उन्होंने कहा कि इस बिल के कानून बन जाने के बाद विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है.

उन्होंने कहा कि बिल में मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है. उन्होंने कहा कि इस बिल के तहत लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है.

उन्होंने कहा कि इसके तहत तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए ‘निकाह हलाला’ जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा. 

इसके साथ ही बिल में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास ‘लिव-इन रिलेशनशिप का बयान’ जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है. मुख्यमंत्री ने बताया कि बिल में ‘लिव-इन’ से पैदा हुए बच्चों को वैध दर्जा दिए जाने का प्रावधान किया गया है. उन्होंने कहा कि इसके तहत यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही गुजारा भत्ता का दावा कर सकती है.

बिल में बिना रजिस्ट्रेशन के एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 रुपये जुर्माने का; गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 रुपये जुर्माने का और रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

उन्होंने कहा कि संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह बिल संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा.

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लेकिन अनुसूचित जनजाति पर क्यों नहीं?

चाहे उत्तराखंड हो या असम या फिर गुजरात और अब मध्य प्रदेश… जहां कभी भी UCC लाई गई है, वहां इसके प्रावधानों से अनुसूचित जनजाति (ST) को छूट मिली है. अगर केंद्रीय स्तर पर भी UCC आती है तो उसमें अनुसूचित जनजाति को शामिल नहीं किया जाएगा.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में 24 मई को फिर से कहा था कि सभी आदिवासी समुदायों यानी अनुसूचित जनजातियों को उनकी पारंपरिक जमीन, जंगलों और रीति-रिवाजों से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा के लिए UCC के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा.

यह कोई राजनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे संविधान की मूल भावना, ऐतिहासिक संरक्षण और जनजातीय समुदायों की अनूठी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े बेहद संवेदनशील और कानूनी कारण हैं.

इसके पीछे हैं 4 बड़े कारण

  1. संवैधानिक कवच: संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची पूर्वोत्तर राज्यों और देश के आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता देती है. 6वीं अनुसूची के तहत शादी, तलाक, संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार पर खुद के कानून बनाने और न्यायिक सुनवाई करने के लिए ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (ADC) बनाने का अधिकार देती है. 
  2. पारंपरिक कानून: आदिवासी समाज सदियों से पारंपरिक कानून मानते आ रहे हैं. कई जनजातियों में शादी और तलाक की ऐसी अनूठी रस्में हैं, जो बाकी धर्मों के कानूनों से बिल्कुल अलग हैं. उदाहरण के लिए मेघालय की खासी और गारो जैसी जनजातियों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था है, जहां संपत्ति की मालकिन परिवार की सबसे छोटी बेटी होती है. अगर UCC लागू होता है तो इससे उनकी पहचान बदल जाएगी.
  3. अपनी खास पहचान: माना जाता है कि अगर आदिवासी समाज को ‘समानता’ के नाम पर उन्हें मुख्यधारा के कानूनों को मानने पर मजबूर किया जाता है तो इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और जीवनशैली धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी. आदिवासी समाज इसे अपने जल-जंगल-जमीन पर अधिकारों के लिए खतरे के रूप में देखते हैं.
  4. लॉ कमीशन की रिपोर्ट: UCC पर 21वें लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में आदिवासियों को इसमें शामिल न करने की साफ बात कही थी. इसमें कहा गया था कि ‘एकजुट’ देश होने के लिए ‘एकरूपता’ यानी एक जैसा होना जरूरी नहीं है. असली चुनौती और लक्ष्य यह है कि हम अपनी विविधताओं को मानवाधिकारों के सिद्धांतों के साथ मिलाएं.

क्या है समान नागरिक संहिता?

संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है. अनुच्छेद 44 शादी, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार और बच्चे की कस्टडी के बारे में समान कानून का कॉन्सेप्ट देता है.

सुप्रीम कोर्ट भी कई बार संसद को समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दे चुकी है. 1985 के शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को एक समान नागरिक संहिता बनानी चाहिए, क्योंकि ये एक ऐसा साधन है जिससे कानून के सामने समान सद्भाव और समानता आती है.

कुल मिलाकर, अभी देश में अलग-अलग धर्मों में शादी, तलाक और उत्तराधिकार समेत कई मामलों पर अलग-अलग कानून हैं. समान नागरिक संहिता इन्हीं सब अलग-अलग कानूनों को एक समान कर देती है.

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