
जिस देश में मृत आत्माओं तक को प्रसन्न करने के लिए कौओं (काकबलि) और कुत्तों (श्वान बलि) को भोजन कराने की परंपरा हो, जहां विश्व के कल्याण की कामना करते हुए नारियल फोड़कर हवन आदि किया जाता हो, उस देश में अक्सर तंत्र के नाम नर बलि जैसी घटनाएं क्यों सुनाई देती हैं? हाल फिलहाल में मध्य प्रदेश में नर बलि के दो केस परेशान करने वाले हैं. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक पिता ने खजाने को पाने के लिए अपनी ही बेटी को ‘बलि’ देने के बाद खेत में दफना दिया तो दूसरी ओर रायसेन में खजाने के लालच में कुछ लोगों के द्वारा कथित तौर पर करोड़पति व्यापारी की ‘बलि’ देने की बात सामने आई है. सवाल यही है कि क्या इस तरह की बलि से कामना पूरी होती है? आइए तंत्र और बलि से जुड़े सच को विस्तार से जानते हैं.
तंत्र क्या है?
सबसे पहले बात करते हैं उस तंत्र की जिसके नाम पर अक्सर देश में कभी पशुओं की तो कभी पक्षियों की और कभी-कभी आम इंसान तक की बलि दिये जाने की खबरे आती हैं. तकरीबन चार दशक से ज्यादा समय से तंत्र की साधना करने वाले तांत्रिक योगी रमेश जी महाराज के अनुसार तंत्र वेद से पहले की विद्या है. हमारे वेद ऋषियों द्वारा निर्मित है तो वहीं तंत्र भगवान शंकर का पावन प्रसाद है. यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के बीच का संवाद है. इस तरह तंत्र के जनक भगवान शिव माने जाते हैं. शाक्त, शैव, गाणपत्य इन सभी में तंत्र की अलग-अलग विधा है, लेकिन मूल रूप से तंत्र शिव से ही संबंधित है. भगवान शिव और माता पार्वती के जितने भी संवाद हुए, वे सभी तंत्र का हिस्सा है.
तंत्र कैसे काम करता है?

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तंत्र का सिद्धांत है – ‘तनोति त्रायति इति तंत्रः’ अर्थात् जो आपकी बुद्धि और आंतरिक शक्तियों का विस्तार करे, जो आपके भीतर चैतन्यता लाए और जो आपका उद्धार और उत्थान करे, उसे तंत्र कहते हैं. सरल भाषा में इसे आप तकनीक, सिद्धांत या फिर नियम कह सकते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि आप किस नियम से साधना करेंगे? किस आसन पर बैठेंगे? किस दिशा की ओर बैठकर साधना करेंगे? कितने समय तक साधना करेंगे तो आपका कार्य सिद्ध होगा. यह सब बातें तंत्र बताता है, क्योंकि तंत्र एक सिस्टम या फिर कहें एक तरह की तकनीक है.
तंत्र विद्या के विशेषज्ञ रमेश तांत्रिक इसे और सरल तरीके से समझाते हुए कहते हैं कि पहले हम परतंत्र थे, फिर स्वतंत्र हुए, फिर गणतंत्र आया और अब प्रजातंत्र है. हमारे शरीर में भी स्नायु तंत्र है. कहने का तात्पर्य यह कि तंत्र सर्वत्र है. यह हर जगह रचा-बसा है. तंत्र की खास बात यह है कि वह आपको देता है, आपसे कुछ लेता नहीं है. तंत्र आपको सिखाता है कि मंत्रों का किस तरह से उच्चारण किया जाए. तंत्र सिखाता है कि किस तरह से यज्ञ किया जाए. तंत्र सिखाता है कि यंत्र को किस तरह से बनाया जाए और उसको कैसे जागृत किया जाए.
बलि का तंत्र से क्या नाता है?

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तंत्र में बलि का मतलब है किसी वस्तु को नष्ट कर देना. कहने का तात्पर्य यह है कि तंत्र साधना करते हुए आप अपने किसी दुर्गुण की बलि दीजिए. यानि उसे छोड़कर जब आप तंत्र साधना करेंगे तभी आप तंत्र में आगे बढ़ सकते हैं. तंत्र में मारण, मोहन, उच्चाटन आदि तमाम चीजें हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई किसी का मार दे. बल्कि यह तो साधना है, जिसके माध्यम से भगवान या देवी से प्रार्थना की जाती है कि आप न्याय करें और दुष्टों का अंत करें.
रमेश तांत्रिक के अनुसार तंत्र के नाम पर बहुत लोगों ने अपनी दुकान चला रखी है और इसे विकृत करने का काम किया है. तंत्र में किसी भी पशु-पक्षी या जानवर आदि के बलि की कोई परंपरा नहीं है. लोगों को समझना होगा कि सारे जगत की अंबा क्या किसी मुर्गे, कबूतर या बकरे का खून पीकर प्रसन्न होंगी? तंत्र में जीवों की बलि की कोई परंपरा नहीं है, नरबलि तो बहुत दूर की बात है. मौजूदा समय में जितने भी जानवर की बलि दी जा रही है, उसे कोई देवी या देवता को नहीं खाता है, बल्कि के बाद उसे खाने वाला तो वही इंसान होता है. रमेश तांत्रिक के अनुसार लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि जब तक आपके भीतर सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः की भावना नहीं होगी, तब तक तंत्र आपको कुछ नहीं दे सकता है.
कुछ ऐसा रहा है बलि का इतिहास

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जाने-माने इतिहासकार डॉ. सुशील पांडेय के अनुसार ऋग्वैदिक काल जिसे इतिहासकार 1500 से 1000 के बीच मानते हैं, उसमें आम लोगों के द्वारा किसी राजा को स्वेच्छा से जो शाक-सब्जी, जौ आदि अनाज कर के रूप दिया जाता था, वह बलि कहलाता था. बलि का प्रारंभिक रूप किसी भी राजा को स्वैच्छिक रूप से दिया जाने वाला एक प्रकार उपहार या फिर कहें भेंट हुआ करता था. उत्तर वैदिक काल यानि 1000 से 600 ईसापूर्व में जब एक तरह की राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो गई तो राजा को दिया जाने वाला यह कर स्थायी हो गया. यानि उस समय बलि नाम का यह कर देना अनिवार्य हो गया था. जिसमें व्यक्ति को अपने अनाज आदि से में से एक हिस्सा राजा को देना होता था.
बलि की इस परंपरा को जब हम धार्मिक दृष्टि से देखते हैं तो हिंदू धर्म में इंद्र और अग्नि दो ऐसे देवता हुए हैं, जिनका आवाहन बलि को ग्रहण करने के लिए किया जाता है. ये दोनों ऐसी दैवीय शक्तियां हैं, जिसे मानव और परमपिता ईश्वर के बीच में मध्यस्थ माना जाता है. इन देवताओं को दी जाने वाली बलि का अर्थ किसी की जान लेना नहीं बल्कि भेंट या उपहार देना रहा है. बलि को देने के लिए शाक-पुष्प, जौ आदि चीजें अनुष्ठान के दौरान मंत्र को जपते हुए डाली जाती रही हैं. इस तरह की बलि का उद्देश्य सुख-समृद्धि, सौभाग्य और आरोग्य की कामना से जुड़ा रहा है.
कब शुरु हुई पशु बलि की परंपरा?
डॉ. सुशील पांडेय के अनुसार समय चक्र जब आगे बढ़ा तो मौर्य काल के आस-पास पशुओं की बलि भी दी जाने लगी. बहुत सारे इतिहासकार इस परंपरा के शुरु होने के बाद ही बौद्ध धर्म के उदय को बड़ा कारण मानते हैं. डॉ. पांडेय के अनुसार हमारे यहां बलि की पंरपरा अधिकतर अनार्यों में देखने को मिलती है. वे चीनी यात्री व्हेनसांग का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि जब वह भारत आया तो उसने खुद इस बात का वर्णन किया है कि भारत में तीन जगह उसकी बलि देने का प्रयास किया गया था, लेकिन सौभाग्य से वह हर बार बच गया. डॉ. पांडेय के अनुसार वैदिक परंपरा में कहीं बलि का उल्लेख नहीं मिलता है, बल्कि जनजातीय लोगों में जरूर इसका जिक्र आता है. वे कामाख्या मंदिर में भी दी जाने वाली बलि को भी जनजातीय परंपरा से जोड़कर बताते हैं.
बहरहाल, बात की शुरुआत जिस गुप्त नवरात्रि से हुई थी उसमें की जाने वाली साधना की बात करें तो इसमें साधक प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त रात्रि सूक्त का पाठ करता है, लेकिन बावजूद कई ऐसे लोग हैं जिनकी देवी की पूजा के बाद भी यह शिकायत बनी रहती है कि उसके उपर किसी ने तंत्र करवा दिया है. जबकि तंत्र कभी किसी पर किया नहीं जाता है, यह तो स्वयं के माध्यम से की जाने वाली साधना है.
दरअसल, आज के दौर में कोई आदमी काला कपड़ा पहनने के बाद अपने गले में हड्डियों की माला लटका कर बैठ जाए तो लोग उसे बहुत बड़ा तांत्रिक समझने लगते हैं, जबकि उसका तंत्र से कोई नाता नहीं होता है. मौजूदा स्थिति यह है कि जिन्होंने तंत्र से जुड़ा कोई ग्रंथ तक नहीं देखा और न ही किसी योग्य गुरु से दीक्षा या शिक्षा ली, वे ऐसे ही गले में हड्डी माला पहन कर लोगों के सामने नाचते हैं और जब बहुत ज्यादा अजीबो-गरीब हरकत करने लग जाते हैं तो लोग उन्हें अघोरी कहना शुरू कर देते हैं. जबकि अघोर परंपरा के साधुओं की अपनी एक अलग ही दुनिया है, जिसकी साधना करना सब के बस की बात नहीं है. देश के भीतर तंत्र की यह विकृति है तो विदेश में इसे लोगों ने यौन संबंध से जोड़ बेचना शुरु कर दिया है. ऐसे में तंत्र के नाम पर गुमराह करने वालों से उचित दूरी बनाए रखने में ही समझदारी है.





