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क्या भारत में हैं तेल के कुएं? अब समंदर में भी खजाना ढूंढेगी सरकार… लेकिन है ये बड़ा रिस्क | samudra-manthan-yojana-oil-wells-in-india-import-dependency


नई दिल्ली:

तेल और गैस की असल कीमत क्या होती है? होर्मुज संकट ने बता दी. भारत के लिए तो इसकी अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि कच्चे तेल और गैस के लिए हम बहुत ज्यादा आयात पर ही निर्भर हैं. इसलिए अब सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे समंदर के अंदर तेल और गैस के खजानों को ढूंढा जाएगा. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई कैबिनेट मीटिंग में सरकार ने इसके लिए 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी है. इसका मकसद गहरे समंदर में तेल-गैस की खोज करना, कुओं की ड्रिलिंग करना और नई खोजों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है.

यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि भारत दुनिया में तीसरा बड़ा देश है, जहां कच्चे तेल की सबसे ज्यादा खपत होती है. इसके साथ ही, भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है. इस पर सालाना 13 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं. 

क्या है ‘समुद्र मंथन’ योजना?

ये दुनिया का शायद पहला ऐसा प्रोग्राम है जिसमें समंदर में तेल और गैस की खोज के लिए बजट से पैसा दिया जाएगा. इसका मकसद समंदर के गहरे पानी में मौजूद भंडारों का पता लगाना है, जिन्हें अभी तक ढूंढा नहीं गया है, ताकि आयात होने वाले कच्चे तेल और गैस पर बढ़ती निर्भरता को कम किया जा सके.

इस योजना के तहत सरकार गहरे समंदर और बहुत गहरे पानी में खोज के लिए कुआं खोदने की लागत का आधा हिस्सा या 650 करोड़ रुपये सीधे बजट से देगी.

एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी PTI से कहा, ‘शायद यह पहली बार जब दुनिया में कोई सरकार बजट से ऐसी खोज के लिए पैसा दे रही है.’ उन्होंने कहा कि अगले 5 सालों में कुल 60 कुओं के लिए बजट से पैसा दिया जाएगा.

इसके साथ ही सरकार कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी कुछ पैसा देगी. इसमें समंदर के नीचे पाइपलाइन और जमीन पर तेल-गैस लाने और प्रोसेस करने की सुविधाएं शामिल हैं. 

अधिकारियों का कहना है कि प्राइवेट कंपनियां ऐसी खोज से बचती रही हैं, क्योंकि अगर कोई खोज नहीं होती है तो सारा पैसा बर्बाद हो जाता है. एक अधिकारी ने कहा, ‘प्राइवेट कंपनियां सिर्फ ड्रिलिंग पर पैसा खर्च कर रही थीं. यानी पहले से ही जो कुएं हैं, उनसे तेल या गैस निकाल रही थीं.’

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कहां खर्च होगा इतना पैसा?

इस स्कीम के तहत 2031 तक 84,084 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इसमें आधे से ज्यादा यानी 43,200 करोड़ रुपये सिर्फ गहरे समंदर में ड्रिलिंग के लिए खर्च होंगे. कुल 60 कुएं ढूंढे जाने हैं और इस हिसाब से हर एक कुएं की खोज पर 650 करोड़ रुपये सरकार खर्च करेगी. ये एक तरह का ‘रिस्क’ है और इसे सरकार खुद उठाने को तैयार है.

कुएं से तेल या गैस निकालने के बाद उसे प्रोडक्शन तक पहुंचाने के लिए जरूरी कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये रखे हैं. ये पैसा पाइपलाइन और प्रोसेसिंग सुविधाओं पर खर्च होगा. 

बाकी बची रकम में से 28,534 करोड़ रुपये ऑफशोर डेटा जुटाने में खर्च किए जाएंगे. यानी यह पैसा उन चीजों पर खर्च होगा, जिससे कुआं खोदने से पहले किसी बेसिन का पता चलता है.

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क्यों जरूरी है कुएं ढूंढना?

ताकि कच्चे तेल के आयात और गैस पर निर्भरता कम हो सके. 27 जुलाई को ही राज्यसभा में सरकार ने बताया है कि 5 साल में कच्चे तेल का आयात कम होने की बजाय बढ़ा ही है. 

पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी की ओर से राज्यसभा में दिए जवाब में बताया है कि 2021-22 में भारत अपनी जरूरत का 85.5% कच्चा तेल आयात करता था. 2025-26 में यह बढ़कर 88.7% तक पहुंच गया. 

एक तरफ जहां आयात पर निर्भरता बढ़ी है तो दूसरी तरफ डोमेस्टिक प्रोडक्शन भी घट गया है. 2021-22 में 29.7 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) का प्रोडक्शन हुआ था, जो 2025-26 में घटकर 28 MMT हो गया.

डोमेस्टिक प्रोडक्शन में गिरावट का कारण बताते हुए सरकार ने कहा कि पुराने कुओं में उत्पादन घट गया है. इन कुओं में पानी या रेत भरने के कारण प्रोडक्शन पर असर पड़ा है.

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तो क्या भारत में तेल के कुएं हैं?

भारत में तेल का सफर 150 साल से भी ज्यादा पुराना है. भारत में पहली बार तेल का कुआं असम के डिगबोई में मिला था. इसकी खोज 1867 में हुई थी. दिसंबर 1901 तक डिगबोई में पहली रिफाइनरी चालू हो गई. 

तेल की खोज सिर्फ असम तक ही सीमित नहीं रही. पश्चिमी तट पर गुजरात भी एक एनर्जी हब के तौर पर उभरा. अंकलेश्वर, कलोल, मेहसाणा, नवागाम और साणंद जैसे जिलों में तेल के बड़े भंडार हैं. वहीं, पश्चिम भारत में राजस्थान का बाड़मेर सबसे अहम क्षेत्र है. 

अरब सागर में तट से लगभग 160 किलोमीटर दूर स्थित ‘मुंबई हाई’ भारत का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाला ऑफशोर ऑयल फील्ड है. यानी यहां समंदर के नीचे से तेल और गैस निकाली जाती है. 1974 में खोजे गए इस क्षेत्र में तेल के बड़े-बड़े भंडार हैं. इसके अलावा, कृष्णा-गोदावरी बेसिन तेल और गैस के लिए एक उभरता हुआ केंद्र है.

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डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन (DGH) के मुताबिक, 1889 से 2025 तक 966 बार तेल और गैस की खोज हुई है. इनमें से 312 में सिर्फ तेल और 360 में गैस मिला है. जबकि 286 में तेल और गैस दोनों मिला है.

DGH के मुताबिक, सबसे ज्यादा 217 कुएं गुजरात में हैं. इसके बाद असम है, जहां 159 कुएं हैं. मुंबई ऑफशोर में 142, आंध्र प्रदेश में 98, राजस्थान में 57 और तमिलनाडु में 48 कुएं हैं. अब तक जितने भी भंडार मिले हैं, उनमें से ज्यादातर समंदर की गहराई में ही मिले हैं.

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‘समुद्र मंथन’ योजना से क्या होगा?

जब जमीन की खुदाई करने पर तेल या गैस का भंडार मिलता है तो उसे ‘ऑनशोर’ कहा जाता है. इसी तरह समंदर की गहराई में खुदाई करने पर मिलने वाले खजाने को ‘ऑफशोर’ कहते हैं. ‘समुद्र मंथन’ योजना के तहत, समंदर की गहराई में जाकर तेल और गैस का खजाना ढूंढा जाएगा. 

सरकार अब इसी पर जोर दे रही है. इसलिए सरकार ने अब खोज का दायरा भी बढ़ा दिया है. सरकार ने 99% से ज्यादा ‘NO GO’ क्षेत्रों को हटा दिया है. इससे भारत के एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन (EEZ) का 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का इलाका पहली बार खोज के लिए उपलब्ध हुआ है. 

इसका मतलब हुआ कि अब तक जिन इलाकों में खोज करने पर पाबंदी थी, उसे हटा लिया गया है.

सरकार को उम्मीद है कि अगर इस स्कीम के तहत तेल और गैस का भंडार मिल जाता है तो उससे भारत को फायदा होगा और आयात पर निर्भरता कम होगी. लेकिन यह एक बहुत बड़ा रिस्क भी है. क्योंकि समंदर में खजाना ढूंढने में काफी समय लग जाता है और इस बात की भी गारंटी नहीं है कि जहां कुआं खोदा गया है वहां तेल या गैस मिलेगी ही मिलेगी.

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