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“क्या कोर्ट से बड़े हैं विधायक?”; बॉम्बे हाईकोर्ट की मीरा-भयंदर महानगरपालिका को फटकार, जानिए क्या है मामला? | Are MLAs above the court Bombay High Court Slams Mira Bhayander Corporation builder Project case MahaRERA mla court order row Nagar Nigam



मुंबई:

मीरा-भयंदर में एक निर्माण परियोजना को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महानगरपालिका प्रशासन के रवैये पर गंभीर नाराजगी जताई है. अदालत के समक्ष यह मामला तब पहुंचा जब बिल्डर कंपनी “मेसर्स ग्रैंडबिल्ड लैंड डेवलपर्स” को न्यायालय से संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद उसे काम रोकने का नोटिस जारी कर दिया गया. सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि यह कार्रवाई स्थानीय बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता के पत्र और आपत्ति के बाद की गई थी. इस पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या अदालत के आदेश से बड़ा किसी विधायक का निर्देश हो सकता है. मुंबई से NDTV के लिए रुत्तिक गणाकवर की रिपोर्ट.

अदालत ने जताई कड़ी नाराजगी

सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने महानगरपालिका के अधिकारियों के रवैये पर सख्त रुख अपनाया. अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में न्यायालय का स्पष्ट आदेश मौजूद है, तब प्रशासनिक अधिकारियों का प्राथमिक दायित्व उसका पालन करना है. पीठ ने टिप्पणी की, “क्या अदालत से बड़ा विधायक का आदेश है? आप विधायक की सुनते हैं, लेकिन कोर्ट की नहीं.” अदालत की इस टिप्पणी के बाद मामला और गंभीर हो गया.

अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस

अदालत ने प्रथम दृष्टया न्यायालय के आदेश की अवहेलना मानते हुए मीरा-भयंदर महानगरपालिका के आयुक्त राधाबिनोद अरीबम शर्मा और टाउन प्लानिंग असिस्टेंट डायरेक्टर पुरुषोत्तम एम. शिंदे को कारण बताओ नोटिस जारी किया. कोर्ट ने दोनों अधिकारियों से पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए.

माफी स्वीकार करने से इनकार

मामले की सुनवाई के दौरान महानगरपालिका आयुक्त राधाबिनोद अरीबम शर्मा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष पेश हुए और अपने स्तर पर माफी भी मांगी. हालांकि अदालत ने यह कहते हुए माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि मामला साधारण प्रशासनिक गलती का नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेश के कथित उल्लंघन का है. अदालत ने स्पष्ट किया कि अवमानना की कार्यवाही जारी रहेगी.

नोटिस वापस लेने का आदेश

हाईकोर्ट ने महानगरपालिका आयुक्त को निर्देश दिया कि बिल्डर को जारी किए गए सभी “काम रोकने” संबंधी नोटिस तीन कार्य दिवस के भीतर वापस लिए जाएं. अदालत ने कहा कि जब तक अदालत के पूर्व आदेश प्रभावी हैं, तब तक प्रशासन को उनका पालन करना होगा.

महारेरा को भी निर्देश

सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह भी आया कि महाराष्ट्र रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (MahaRERA) ने भी संबंधित प्रोजेक्ट पर रोक लगाकर बिल्डर के बैंक खाते फ्रीज कर दिए थे. इस पर हाईकोर्ट ने महारेरा को निर्देश दिया कि वह पांच दिनों के भीतर अपनी वेबसाइट से परियोजना पर लगी रोक हटाए और बिल्डर के बैंक खातों पर लगाए गए प्रतिबंध भी समाप्त करे.

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