धर्म

कौन हैं काकभुशुण्डि? जिनका नाम राम मंदिर विवाद के बाद अचानक आ गया हर जुबान पर


Kakabhushundi: अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से सनातन परंपरा, रामायण और प्रभु श्री राम से जुड़े कई ऐसे प्रसंग और पात्र अचानक चर्चा में आ गए हैं, जिनके बारे में आम लोग पहले बहुत कम जानते थे. इन्हीं दिव्य नामों में से एक नाम जो इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर हर सनातनी की जुबान पर है, वह है, ‘काकभुशुण्डि’.

आखिर कौन हैं काकभुशुण्डि? उन्हें कौवे का रूप क्यों मिला और रामचरितमानस में उनका स्थान इतना महत्वपूर्ण क्यों है? आइए जानते हैं इस रहस्यमयी और परम प्रतापी रामभक्त की पूरी कहानी.

कौन थे काकभुशुण्डि? 

गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी का विस्तृत और अत्यंत दिव्य वर्णन मिलता है. शास्त्रों के अनुसार, काकभुशुण्डि जी भगवान श्री राम के अनन्य और परम भक्त हैं. उनका स्वरूप बड़ा ही अनूठा है, उनका मुख कौवे जैसी चोंच वाला है, जबकि शेष शरीर एक दिव्य मनुष्य की भांति है.

उन्हें हिंदू धर्मग्रंथों में एक ऐसे ‘चिरंजीवी’ (अमर) महात्मा के रूप में दर्शाया गया है, जिन्होंने समय के चक्र से परे जाकर हर युग में प्रभु श्री राम की लीलाओं को न केवल देखा, बल्कि जिया है.

ब्राह्मण से कैसे बने ‘कौवा’? जानिए श्राप की कहानी

पौराणिक कथाओं के अनुसार, काकभुशुण्डि जी अपने पूर्व जन्म में अयोध्या के एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण थे. वे भगवान शिव के परम भक्त थे, लेकिन उनके भीतर ज्ञान का अहंकार आ गया था. एक बार मंदिर में जब वे शिव आराधना कर रहे थे, तब उनके गुरु वहां आए. अहंकार वश वे अपने गुरु के सम्मान में खड़े नहीं हुए.

अपने भक्त की इस अशिष्टता पर भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें अजगर बनने का श्राप दे दिया. हालांकि, उनके दयालु गुरु ने भगवान शिव से क्षमा-प्रार्थना की. गुरु की प्रार्थना से पिघलकर महादेव ने श्राप का प्रभाव कम कर दिया और कहा कि अनेक जन्मों के कष्ट भोगने के बाद तुम्हें अंततः रामभक्ति प्राप्त होगी.

अपने अंतिम जन्म में जब वे एक ऋषि के आश्रम में ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, तब ऋषि ने उन्हें सगुण (साकार) रामभक्ति के बजाय निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने को कहा. लेकिन काकभुशुण्डि केवल श्री राम के बाल रूप की भक्ति चाहते थे. इस बहस से क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें ‘कौवा’ (काक) बन जाने का श्राप दे दिया. काकभुशुण्डि ने इस श्राप को भी प्रभु की इच्छा मानकर हंसते-हंसते स्वीकार कर लिया.

जब गरुड़ देव का अहंकार टूटना था, तब काम आए काकभुशुण्डि

रामायण काल की एक प्रसिद्ध घटना है जब मेघनाद ने युद्ध के दौरान भगवान राम को ‘नागपाश’ में बांध लिया था. उस समय देवर्षि नारद के कहने पर पक्षीराज गरुड़ ने आकर नागों को खाकर प्रभु राम को मुक्त कराया था.

लेकिन इसके बाद गरुड़ देव के मन में एक गहरा संदेह (भ्रम) पैदा हो गया कि “जो साक्षात् भगवान हैं, वे एक साधारण राक्षस के नागपाश में कैसे बंध सकते हैं? क्या राम सचमुच भगवान हैं?”

इस संदेह के निवारण के लिए गरुड़ देव पहले ब्रह्मा जी और फिर भगवान शिव के पास गए. तब महादेव ने उनसे कहा कि इस संशय का अंत केवल काकभुशुण्डि जी ही कर सकते हैं. जब गरुड़ देव नील पर्वत पर काकभुशुण्डि जी के पास पहुंचे, तो उन्होंने गरुड़ जी को विस्तार से रामकथा सुनाई, जिससे गरुड़ देव का सारा मोह और संदेह नष्ट हो गया.

महादेव से मिला ‘इच्छा-मृत्यु’ का वरदान

काकभुशुण्डि जी की अनन्य रामभक्ति और उनके मुख से निकलने वाली दिव्य रामकथा इतनी मंत्रमुग्ध करने वाली थी कि स्वयं भगवान शिव ने भी एक बार वेश बदलकर उनसे कथा सुनी थी.

उनकी इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया. इस वरदान के कारण काल (समय) का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वे जब चाहें, अपनी इच्छा से शरीर का त्याग कर सकते हैं या युगों-युगों तक जीवित रह सकते हैं.

राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या में राम लला के आगमन के बाद, सनातन संस्कृति के छिपे हुए मोतियों को टटोलने की जिज्ञासा बढ़ी है. यही कारण है कि ज्ञान और भक्ति के शिखर पुरुष काकभुशुण्डि जी की कथा आज हर सनातनी के लिए प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है.

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