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इजरायल में सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी, क्या नेतन्याहू का दौर खत्म होने वाला है? क्या है आंकड़ों का खेल | Israel PM Netanyahu Faces Tough Battle In Israel Parliamentary Polls With Close Opposition Contest



आज से तीन साल पहले 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद युद्ध, सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही के सवालों से जूझ रहे इजरायल में 27 अक्तूबर 2026 यानी मंगलवार को अहम संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के अहम मोड़ की तरह से भी देखा जा रहा है. शुरुआती मतदान के आंकड़ों में भारी उत्साह दिखा है और वोटिंग प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में अधिक दर्ज किया गया है.

120 सदस्यीय नेसेट (संसद) के लिए हो रहे इस चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की सीधी टक्कर पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे से है. चुनाव से पहले किए गए ओपिनियन पोल्स में लिकुड और आइजेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी पर दिखाई दिया. कई पोल्स में दोनों खेमों को करीब 53-53 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जबकि सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है.

अब आगे की राह क्या है?

यही वजह है कि चुनाव नतीजे आने के बाद भी तस्वीर तुरंत साफ नहीं होगी. इजरायल की राजनीति में गठबंधन की भूमिका बेहद अहम होती है और इस बार भी सरकार गठन के लिए लंबी बातचीत की संभावना जताई जा रही है. कई सर्वे में नेतन्याहू के मौजूदा दक्षिणपंथी गठबंधन को बहुमत से पीछे दिखाया गया है.

मतदान के दिन सामने आए शुरुआती आंकड़ों के अनुसार सुबह 10 बजे तक करीब 16.7 प्रतिशत वोट पड़ चुके थे, जो 2022 के चुनाव की तुलना में अधिक थे. दोपहर तक मतदान 31.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इजरायल में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र हैं.

इस चुनाव में सुरक्षा, गाजा युद्ध, 7 अक्टूबर के हमलों की जिम्मेदारी, न्यायिक सुधार, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों की सैन्य सेवा और देश की भविष्य की दिशा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं. विपक्ष लगातार नेतन्याहू सरकार को सुरक्षा विफलताओं के लिए घेरता रहा है, जबकि नेतन्याहू खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे मजबूत नेता के रूप में पेश कर रहे हैं.

अभी क्या कुछ कहा जा सकता है?

फिलहाल मतदान जारी है और अंतिम नतीजों से पहले यह कहना मुश्किल है कि अगली सरकार कौन बनाएगा. लेकिन इसके साथ ही ये चुनाव नेतन्याहू के साख का सवाल बना हुआ. कुछ सर्वे में उनका पिछड़ना उनकी पार्टी के लिए चिंता का विषय हो सकता है. यानी ये साफ है कि नेतन्याहू के सामने पिछले कई सालों की तुलना में सबसे कठिन चुनौती सामने खड़ी है. अगर किसी भी खेमे को 61 सीटों का आंकड़ा नहीं मिलता, तो सत्ता की चाबी इजरायल की छोटी पार्टियों के हाथ में होगी.

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