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अमरनाथ का पवित्र शिवलिंग चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ बदलता है अपना आकार, जानिए बाबा बर्फानी का धार्मिक महत्व | Amarnath yatra 2026 guide Amarnath history significance Baba Barfani Amarnath Shivling kaise banta hai



आज यानी 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई है. अमरनाथ यात्रा 28 अगस्त तक चलेगी. जम्मू-कश्मीर के LG मनोज सिन्हा ने पहले जत्थे को जम्मू के भगवती बेस कैंप से बालटाल और पहलगाम के लिए रवाना किया. अमरनाथ यात्रा दो रास्तों से की जाती है. पारंपरिक रास्ता 48 किलोमीटर लंबा नुनवान-पहलगाम से है. दूसरा रास्ता गांदरबल जिले में 14 किलोमीटर लंबे बालटाल से है. चलिए आपको बताते हैं अमरनाथ यात्रा की शुरुआत कब हुई और पवित्र गुफा की भौगोलिक स्थिति और धार्मिक महत्व क्या है.

अमरनाथ यात्रा की शुरुआत कब हुई

ऐतिहासिक तौर पर अमरनाथ यात्रा कब शुरू हुई इसका कोई सटीक लिखित साक्ष्य नहीं है, लेकिन सदियों से यह यात्रा नीलमत पुराण और आइने-अकबरी जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित आस्था का प्रमुख केंद्र रही है. आधुनिक काल में संगठित रूप से यह यात्रा 1998 से या 1872 में मानी जाती है. इसका कोई पक्का ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता. हालांकि, इतिहासकार मानते हैं कि यह यात्रा कई सदियों से चली आ रही है.

पवित्र गुफा की भौगोलिक स्थिति और धार्मिक महत्व

श्री अमरनाथ धाम लिद्दर घाटी के छोर पर एक संकरी घाटी में समुद्र तल से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. भौगोलिक दूरी की बात करें, तो यह पावन स्थल पहलगाम से लगभग 46 किलोमीटर और बालटाल से 14 किलोमीटर की दूरी पर है. हालांकि पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, मूल यात्रा श्रीनगर से शुरू होनी चाहिए, परंतु वर्तमान में अधिकांश श्रद्धालु चंदनवाड़ी से अपनी पैदल यात्रा का शुभारंभ करते हैं और अमरनाथ जी तक जाकर वापस आने में कुल पांच दिन का समय लगाते हैं.

हिंदू धर्म में अमरनाथ जी को प्रमुख धामों में से एक माना गया है. यह पवित्र गुफा देवादिदेव भगवान शिव का साक्षात निवास स्थान है. इस गुफा की मुख्य विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव, जो विनाशक और परम सत्य के रक्षक हैं, स्वयं प्राकृतिक रूप से निर्मित बर्फ के लिंगम (शिवलिंग) के रूप में विराजमान होते हैं. इस अद्भुत शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि यह चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ ही अपना आकार भी बदलता रहता है.

पवित्र गुफा की खोज की लोककथा

इस पवित्र गुफा का ऐतिहासिक उल्लेख प्राचीन पुराणों में भी प्रचुरता से मिलता है, परंतु आधुनिक समय में इसके पुन: मिलने की कहानी अत्यंत रोचक है, जो बूटा मलिक नाम के एक स्थानीय चरवाहे से जुड़ी है. लोककथा के अनुसार, एक बार एक साधु ने बूटा मलिक को कोयले से भरा एक थैला भेंट किया. जब उसने घर लौटकर उस थैले को खोला, तो वह यह देखकर स्तब्ध रह गया कि कोयला सोने के चमकदार सिक्कों में बदल चुका था. अपनी इस असीम प्रसन्नता को व्यक्त करने और साधु का धन्यवाद करने के लिए वह वापस उसी स्थान की ओर भागा. वहां पहुंचने पर साधु तो अंतर्ध्यान हो चुके थे, लेकिन उनके स्थान पर उसे एक भव्य और पवित्र गुफा दिखाई दी, जिसके भीतर बर्फ का अलौकिक शिवलिंग स्थापित था. बूटा मलिक ने तुरंत इस दिव्य खोज की जानकारी ग्रामीणों को दी और तब से यह स्थान पुनः एक महान तीर्थयात्रा के रूप में प्रतिष्ठित हो गया.

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