धर्म

Parma Ekadashi 2026: 11 जून को बन रहा है चार दुर्लभ योगों का महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त, व्रत विधि और परमा एकादशी की पौराणिक कथा


Parma Ekadashi 2026: 11 जून (गुरुवार) को अधिक ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे धार्मिक ग्रंथों में परमा, पुरुषोत्तमी या कमला एकादशी के नाम से जाना जाता है. अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में आने के कारण यह अत्यंत फलदायी व्रत तीन साल में सिर्फ एक बार आता है. इस साल के बाद अब यह दुर्लभ व्रत 9 अप्रैल 2029 को आएगा.

विख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास में आने वाली यह परमा एकादशी इस बार कई मायनों में बेहद खास है. इस दिन गुरुवार के साथ-साथ अधिकमास का भी अनूठा संयोग मिल रहा है. यह अधिक मास की आखिरी एकादशी होगी.

परमा एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, एकादशी तिथि की गणना इस प्रकार है:

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 11 जून की मध्यरात्रि करीब 12:57 बजे से
  • एकादशी तिथि समाप्त: 11 जून की रात 10:36 बजे तक

सूर्योदय व्यापिनी तिथि में उपवास रखने की सनातनी परंपरा और मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु गुरुवार, 11 जून को ही यह व्रत रखेंगे. इसके अगले दिन यानी 12 जून को द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले व्रत का पारण (व्रत खोलना) कर लिया जाएगा.

परमा एकादशी पर बन रहे हैं 4 दुर्लभ महासंयोग

डा. अनीष व्यास ने बताया कि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस बार परमा एकादशी पर चार बड़े और शुभ योगों का दुर्लभ महासंयोग बन रहा है. इन संयोगों में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, व्रत, दान और मंत्र जाप करने से सामान्य दिनों की तुलना में सहस्त्र (हजार) गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है.

  • सर्वार्थसिद्धि योग: यह योग सभी कार्यों में सफलता और सिद्धि दिलाने वाला माना जाता है.
  • रवि योग: जीवन की तमाम बाधाओं को दूर कर शुभ फल प्रदान करने वाला योग.
  • सिद्धि योग: नए कार्यों की शुरुआत और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसे श्रेष्ठ माना गया है.
  • शिव योग: समाज में मान-सम्मान, समृद्धि और आत्मिक-आध्यात्मिक लाभ देने वाला योग.

परमा एकादशी व्रत की प्रामाणिक विधि

भगवान विष्णु के ‘पुरुषोत्तम रूप’ की आराधना के लिए डा. अनीष व्यास ने निम्नलिखित विधि बताई है:

संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें.

स्वरूप: इस दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज पुरुषोत्तम रूप की पूजा का विधान है, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित रहते हैं.

पूजन सामग्री: पूजा में दीपक, धूप, सुंगधित पुष्प, तुलसी दल और विशेष नैवेद्य अर्पित करें.

संयम व नियम: दिनभर मन और आचरण में संयम रखें. अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार फलाहार या निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखा जा सकता है.

संध्या पूजन व रात्रि जागरण: शाम के समय विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता, एकादशी व्रत कथा का पाठ या विष्णु मंत्रों का जाप करें. इस व्रत में रात में भजन-कीर्तन और जागरण करने का विशेष महत्व है.

पारण व दान: अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ समय पर पारण करें और सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें.

पौराणिक कथा: सुमेधा और पवित्रा की भक्ति

भविष्योत्तर पुराण के ‘एकादशी माहात्म्य’ अध्याय का हवाला देते हुए डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैष्णव परंपरा की कथा के अनुसार, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का नाम, विधि और महत्व बताया था.

कथा के अनुसार, काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम के एक परमार्थी ब्राह्मण और उनकी अत्यंत पतिव्रता पत्नी पवित्रा रहते थे. वे दोनों अत्यंत निर्धन थे, लेकिन अपनी दरिद्रता के बावजूद अतिथि सेवा और धर्म मार्ग से कभी विमुख नहीं हुए. एक बार गरीबी से तंग आकर सुमेधा ने धन कमाने के लिए परदेश जाने का विचार किया, तब पवित्रा ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि भाग्य और पिछले जन्मों के कर्मों का फल घर पर रहकर धर्म मार्ग पर चलने से ही बदलेगा.

कुछ समय बाद उनके निवास पर कौण्डिन्य ऋषि का आगमन हुआ. दंपत्ति ने अपनी फटी-हाल स्थिति में भी ऋषि की उत्तम सेवा की. जब पवित्रा ने ऋषि से अपनी दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा, तब कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें अधिक मास के कृष्ण पक्ष की ‘परमा एकादशी’ का व्रत करने की सलाह दी. ऋषि की आज्ञा पाकर सुमेधा और पवित्रा ने पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ यह व्रत, पूजा, दान और रात्रि जागरण किया.

व्रत का प्रभाव: इस कठिन तपस्या के फलस्वरूप उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आया. कथा के अनुसार, एक राजकुमार ने प्रभावित होकर उन्हें रहने के लिए एक सुंदर भवन और आजीविका के लिए पूरा गांव दान में दे दिया. दोनों ने जीवन पर्यंत भौतिक सुखों का भोग किया और अंत में वैकुंठ (भगवान विष्णु के लोक) को प्राप्त हुए.

कुबेर और राजा हरिश्चंद्र ने भी पाया लाभ

कौण्डिन्य ऋषि ने इस व्रत की महिमा बताते हुए अन्य उदाहरण भी दिए हैं. मान्यता है कि सबसे पहले धनराज कुबेर ने इस व्रत के प्रभाव से ही ‘धनाध्यक्ष’ (देवताओं के कोषाध्यक्ष) का पद पाया था. वहीं, चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र ने भी अपने अत्यंत कठिन समय में इस व्रत को करके अपना खोया हुआ राजपाठ और सुख वापस पाया था.

परमा एकादशी का धार्मिक महत्व

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, ‘परमा’ शब्द का अर्थ ही होता है, सबसे उत्तम. यह एकादशी तीन साल में एक बार आती है, इसलिए इसका पुण्य फल अन्य आम एकादशियों की तुलना में तीन गुना बढ़ जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी जातक पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से परमा एकादशी का व्रत रखता है, उसे 100 अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. यह व्रत मनुष्य के समस्त पापों, दुखों, कष्टों और दरिद्रता का समूल नाश कर जीवन में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और अंत में मोक्ष प्रदान करता है.

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