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Opinion: भारत-नेपाल कभी एक दूसरे के विरोधी नहीं रहे… अब सोचना चाहिए आखिर गलती कहां हो रही थी | Nepal India Relations Enter A New Diplomatic Era Amid Political Stability Balen Shah New Delhi



दुनिया इस वक्त बदलती हकीकतों और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है. वैश्विक समीकरण इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि हर राष्ट्र को अपनी प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय हितों की हिफाजत के लिए हर पल चौकन्ना रहना पड़ रहा है. 

नेपाल और भारत के सदियों पुराने ताल्लुकात भी इस जमीनी हकीकत से अछूते नहीं हैं. भूगोल, साझी तहजीब, गहरा जन-संपर्क और लोकतंत्र के प्रति दोनों देशों की निष्ठा इस रिश्ते की बेहद मजबूत बुनियाद हैं. लेकिन बदलते दौर के साथ कूटनीति के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं और इस नए दौर में दोनों देशों के रिश्तों में एक नया सवेरा दस्तक दे रहा है.

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नेपाल के हालिया आम चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की अभूतपूर्व जीत हुई है. पार्टी ने करीब दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है. इसके बाद देश में लंबे समय के बाद राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद जगी है. हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब नेपाल में किसी सरकार को इतना बड़ा जनादेश मिला हो. साल 2017 के चुनावों में भी वामपंथी गठबंधन (CPN-UML और माओवादी केंद्र) को ऐसा ही भारी बहुमत मिला था, लेकिन आपसी अंतर्विरोधों के कारण वह ऐतिहासिक मौका हाथ से निकल गया और देश का कूटनीतिक संतुलन बिगड़ गया.

लेकिन Gen Z आंदोलन के बाद अब नेपाल एक नए मोड़ पर है. युवा प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व में देश की सोच बदली है. प्रधानमंत्री शाह ने साफ कर दिया है कि नेपाल अब दो बड़े देशों के बीच महज एक ‘बफर स्टेट’ रहने या दोनों से ‘बराबर दूरी’ बनाए रखने की पुरानी रिवाजों पर नहीं चलेगा. इसके बजाय, नेपाल अब एक डायनेमिक ब्रिज बनेगा और दोनों पड़ोसियों के साथ समान निकटता की नीति पर आगे बढ़ेगा.

दिल्ली दरबार में नई कूटनीतिक हलचल

इसी नई सोच के तहत हाल ही में RSP के अध्यक्ष रवि लामिछाने ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के न्यौते पर भारत का पांच दिनों का अहम दौरा किया. इस दौरे को दोनों देशों के बदलते राजनीतिक माहौल में रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की एक रणनीतिक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. लामिछाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्री जैसी शीर्ष हस्तियों से मुलाकात यह साफ करती है कि नई दिल्ली नेपाल के इस नए सियासी परिदृश्य को बेहद गंभीरता और गर्मजोशी से देख रही है.

लामिछाने के लौटते ही नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल भी आधिकारिक दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे. विदेश मंत्री जयशंकर और खनाल के बीच हुई मुलाकातों के बाद कई शुरुआती समझौते हुए, जो यह इशारा करते हैं कि नेपाल की नई सरकार के साथ भारत के सहयोग की शुरुआत काफी खुशनुमा रही है.

सीमा विवाद की कड़वाहट 

हालांकि, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसी पुरानी कड़वाहट आज भी दोनों देशों के रिश्तों पर अपनी परछाई डाल रही है. इस ऐतिहासिक सीमा विवाद को आपसी भरोसे और संवेदनशीलता के साथ केवल द्विपक्षीय बातचीत और खामोश कूटनीति के जरिए ही सुलझाया जा सकता है. जल्दबाजी, बयानबाजी या किसी भी तरह के राजनीतिक अतिवाद से इसका कोई हल नहीं निकलने वाला. सबसे बड़ी बात यह है कि किसी एक मुद्दे के गतिरोध के कारण पूरे रिश्ते को बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के संसद में दिए बयान को लेकर जो अंदेशे बने थे, उन्हें विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि प्रधानमंत्री का इशारा ‘क्रॉस-बॉर्डर कब्जे’ की तरफ था, न कि वे इस मामले में ब्रिटिश मध्यस्थता चाहते हैं. घरेलू राजनीति में प्रशासनिक कमियां तो माफ की जा सकती हैं, लेकिन कूटनीति में थोड़ी सी भी नासमझी बहुत भारी पड़ सकती है.

इसी तरह एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप (EPG) की रिपोर्ट को तैयार हुए आठ साल बीत चुके हैं. अगर इस रिपोर्ट को लेकर कोई अड़चन है, तो उस पर खुलकर बात होनी चाहिए. क्या आज की हकीकत को देखते हुए जॉइंट टास्क फोर्स नहीं बनाया जा सकता? अगर पुरानी विरासत के कुछ मुद्दे अभी सुलझाना नामुमकिन लग रहा हो, तो उन्हें कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल देना ही अक्लमंदी है. कूटनीति का मतलब जिद नहीं, बल्कि हालात के हिसाब से खुद को ढालना है.

‘रोटी-बेटी’ के रिश्ते को आधुनिक रफ्तार देने की दरकार

सदियों पुराने ‘रोटी-बेटी’ के पारंपरिक रिश्ते को अब आधुनिक रंग देने की जरूरत है. आज के दौर में सिर्फ भावुकता से काम नहीं चलेगा, इसके लिए मजबूत बुनियादी ढांचे और गहरे आर्थिक सहयोग की सख्त दरकार है.

इसे एक मिसाल से समझा जा सकता है. नेपाल में उत्तर की तरफ चीन से रेल जोड़ने की चर्चा तो बहुत जोर-शोर से होती है, लेकिन दक्षिण में रक्सौल-काठमांडू रेलवे लाइन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. जबकि यह सिर्फ 136 किलोमीटर लंबी लाइन भौगोलिक रूप से बेहद आसान, सस्ती और आर्थिक रूप से कहीं ज्यादा फायदेमंद है. अगर दोनों तरफ की सरकारें मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं, तो यह प्रोजेक्ट नेपाल में पर्यटन और व्यापार की तकदीर बदल सकता है.

पानी, बिजली और साझी तहजीब का भविष्य

जल और ऊर्जा के क्षेत्र में भी साझेदारी को नए मुकाम पर ले जाना होगा. नेपाल पनबिजली में आत्मनिर्भर होने की कगार पर है और भारत उसके लिए सबसे बड़ा और प्राकृतिक बाजार है. कोसी, गंडक और शारदा जैसी सदियों पुरानी सिंचाई संधियों की समीक्षा आज के वक्त की मांग है, क्योंकि ये परियोजनाएं पुरानी तकनीक पर आधारित हैं. इसके साथ ही, पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना जैसी बड़ी योजनाएं आपसी अविश्वास के कारण क्यों रुकी हुई हैं, इस पर भी आत्ममंथन करना होगा.

रामायण सर्किट, बौद्ध-लुम्बिनी सर्किट और सांस्कृतिक सर्किट जैसे प्रोजेक्ट दोनों देशों के लिए ‘विन-विन’ यानी फायदे का सौदा हैं. जनकपुर और अयोध्या का रिश्ता या लुम्बिनी, बोधगया और सारनाथ का आपसी जुड़ाव हमारी साझी सभ्यता की पहचान हैं. भारत और नेपाल कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं. हमारी 1750 किलोमीटर लंबी खुली सीमा सिर्फ दो देशों को जोड़ती नहीं है, बल्कि यह दो ‘जुड़वां देशों’ की साझी तहजीब का आईना है.

तकदीर बदलने का वक्त

नेपाल को भारत के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने पर कोई ऐतराज नहीं है और भारत ने भी हमेशा नेपाल की संप्रभुता का सम्मान किया है. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार को नेपाल-भारत संबंधों को नई ऊर्जा देने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए और भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को भी सिर्फ भाषणों तक सीमित न रहकर जमीनी हकीकत बनना होगा.

आखिर में, दोनों देशों को यह देखना होगा कि भारत और नेपाल के सीमावर्ती इलाके (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल का उत्तरी हिस्सा और नेपाल का तराई-मधेस) आज भी विकास की दौड़ में पिछड़े हैं और गरीबी से जूझ रहे हैं. दोनों सरकारों को ईमानदारी से सोचना होगा कि दुनिया भर में जहां सीमाएं आर्थिक तरक्की का केंद्र बनती हैं, वहीं हमारी सीमा पर ऐसा क्यों नहीं हो सका? इस ऐतिहासिक रिश्ते को अब पुरानी बेरुखी से निकालकर एक नई कूटनीतिक रफ्तार देने का वक्त आ गया है.

(बिश्वदीप पांडेय नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (NCP-प्रचंड गुट) के केंद्रीय समिति सदस्य हैं. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों डॉ. बाबूराम भट्टराई और प्रचंड के कार्यकाल में सलाहकार और सचिवालय की भूमिकाएं निभाई हैं.)



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