
Nirjala Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी व्रत को सभी 24 एकादशियों में सबसे सर्वश्रेष्ठ और पवित्र माना जाता है. मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन बिना जल ग्रहण किए पूरी श्रद्धा से उपवास रखता है, उसे सालभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है. वर्ष 2026 में यह व्रत बेहद खास होने वाला है क्योंकि इस दिन तीन अत्यंत शुभ योगों का महासंयोग बन रहा है.
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास (पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान) के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन के सभी दोषों और कष्टों से मुक्ति मिलती है.
निर्जला एकादशी 2026: मुख्य तिथियां और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस साल उदयातिथि के आधार पर 25 जून 2026 को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा.
| तिथि व मुहूर्त | समय और दिनांक |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 24 जून 2026, शाम 06:13 बजे से |
| एकादशी तिथि समाप्त | 25 जून 2026, रात 08:09 बजे तक |
| व्रत की तारीख (उदयातिथि) | 25 जून 2026 |
त्रिपुष्कर/शुभ योगों का महासंयोग
25 जून को पूजा-पाठ करने के लिए तीन बेहद प्रभावशाली योग बन रहे हैं, जो साधक को मनोवांछित फल प्रदान करेंगे:
- रवि योग: सुबह 05:25 बजे से शाम 04:29 बजे तक
- शिव योग: सुबह 10:22 बजे से लेकर पूरे दिन
- सिद्ध योग: सुबह 10:53 बजे से लेकर पूरे दिन
सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ है यह व्रत हिंदू धर्म और स्कंद पुराण के अनुसार, सालभर में आने वाली सभी 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ, पवित्र और कठिन माना जाता है. ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली इस एकादशी में सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है, इसलिए इसे ‘निर्जला’ कहा जाता है.
धार्मिक मान्यता है कि भीषण गर्मी के इस महीने में बिना जल के रहकर जो व्यक्ति यह उपवास पूरी निष्ठा से करता है, उसे सालभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल अकेले इस एक व्रत से मिल जाता है. इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से उपासना करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं.
पौराणिक कथा और ‘भीमसेनी एकादशी’ का इतिहास पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडव पुत्र भीमसेन को बहुत अधिक भूख लगती थी, जिसके कारण उनके लिए हर महीने आने वाले एकादशी व्रतों को रख पाना असंभव था. लेकिन वे भी पाप मुक्त होना और मृत्यु के बाद मोक्ष पाना चाहते थे.
जब उन्होंने अपनी यह पीड़ा महर्षि वेद व्यास जी को बताई, तो महर्षि ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का एकमात्र व्रत करने का सुझाव दिया. महर्षि की आज्ञा मानकर भीम ने पूरी श्रद्धा से यह कठिन और निर्जल उपवास किया और इसके पुण्य प्रभाव से वे पाप मुक्त होकर अंत में मोक्ष को प्राप्त हुए. इसी कारण इस व्रत को भीमसेनी एकादशी, पांडव एकादशी या भीम एकादशी भी कहा जाता है.
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विधि निर्जला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाकर भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पीले फूल व पीले वस्त्र अर्पित करें. भगवान को सात्विक चीजों का भोग लगाएं और उसमें तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य शामिल करें, क्योंकि बिना तुलसी के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते हैं.
इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की भी आरती करें. पूरे दिन और रात भगवान का स्मरण, ध्यान और मंत्र जाप करना चाहिए. इसके बाद अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सुबह सूर्योदय के बाद पुनः पूजा करके गरीबों व ब्राह्मणों को दान या भोजन कराने के बाद ही स्वयं प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए.
तुलसी पूजन का महत्व और ध्यान रखने योग्य बातें कुंडली विश्लेषक डा. अनीष व्यास के अनुसार, निर्जला एकादशी पर तुलसी पूजन का विशेष महत्व होता है क्योंकि तुलसी माता को लक्ष्मी जी का प्रतीक और विष्णु प्रिया माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए दूध में केसर मिलाकर उनका अभिषेक करना चाहिए, विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करना चाहिए और भोग में पीली वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए.
निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें?
इस पवित्र दिन पर कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है ताकि आपकी पूजा सफल हो सके:
अवश्य करें ये कार्य (सकारात्मक प्रभाव के लिए)
- केसर का अभिषेक: दूध में केसर मिलाकर भगवान विष्णु का अभिषेक करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है.
- दोषों से मुक्ति: कुंडली के सभी दोषों को समाप्त करने के लिए इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें.
- पितरों का आशीर्वाद: भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने बैठकर गीता का पाठ करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है.
- पीली वस्तुओं का भोग: श्रीहरि को पीले रंग की मिठाई या फल अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है.
भूलकर भी न करें ये गलतियां (वर्जित कार्य)
तुलसी में जल न चढ़ाएं: एकादशी के दिन माता तुलसी में जल अर्पित नहीं करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन तुलसी माता भी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. इस दिन तुलसी पत्ता तोड़ना भी वर्जित है.
चावल का प्रयोग वर्जित: भगवान विष्णु की पूजा में कभी भी अक्षत (चावल) अर्पित न करें और न ही इस दिन घर में चावल का सेवन करें.
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