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नरोत्तम मिश्रा – जो दूसरों का खेल खत्म करने निकले थे, उनकी अपनी वापसी टिकट पर आकर अटक गई | bjp sideline narottam mishra datia by election


भोपाल:

साल 2017 में जब मैं मुंबई से भोपाल ब्यूरो आया, तब डॉ. नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क मंत्री और सरकार के सबसे मुखर प्रवक्ताओं में से एक थे. वे उन नेताओं में थे जिनके पास हर सवाल का जवाब होता था कभी सीधे, कभी शायराना और कभी ऐसा कि जवाब खबर से बड़ा हो जाए. 23 जून 2017 को भारत निर्वाचन आयोग ने पेड न्यूज से जुड़े मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 10A के तहत नरोत्तम मिश्रा को तीन वर्ष के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था. मामला 2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव खर्च में कथित पेड न्यूज का विवरण शामिल नहीं करने से जुड़ा था. हालांकि, बाद में 18 मई 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस सामग्री पर खर्च किए जाने का पर्याप्त प्रमाण नहीं था. 

उस समय वे मंत्री भी थे और सरकार के प्रवक्ता भी. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैंने उनसे पूछ लिया. क्या नैतिकता के लिहाज से यह उचित है कि जिस व्यक्ति की विधायकी निर्वाचन आयोग ने रद्द कर दी है, वही उस कैबिनेट बैठक की जानकारी दे जिसमें बतौर विधायक उसकी भागीदारी पर ही सवाल है?

2020 में नरोत्तम मिश्रा ने किया था ‘खेल’

नरोत्तम मिश्रा ने सवाल सुना. जवाब भी दिया. लेकिन उस दिन पहली बार समझ आया कि नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक जीवन में कानून, नैतिकता, सत्ता और समय चारों की घड़ियां अक्सर अलग-अलग चलती हैं. समय आगे बढ़ा. 2018 में भाजपा विधानसभा चुनाव हार गई और कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी. लेकिन वह सरकार केवल 15 महीने चली. मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कमलनाथ सरकार गिर गई. इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष तक पहुंचाने वाले भाजपा नेताओं में नरोत्तम मिश्रा भी प्रमुखता से शामिल थे. 

इस कहानी का एक दृश्य उससे करीब छह महीने पहले विधानसभा में लिखा जा चुका था. कांग्रेस सरकार के दौरान एक महत्वपूर्ण मतदान में भाजपा के दो विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी थी. उसके बाद मैंने नरोत्तम मिश्रा का इंटरव्यू किया. उन्होंने कहा था “खेल उन्होंने शुरू किया है, खत्म हम करेंगे.”

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राजनीति में कई बयान सुबह दिए जाते हैं और शाम तक भुला दिए जाते हैं. यह बयान छह महीने बाद सरकार गिरने पर फिर याद आया. नरोत्तम मिश्रा उस ऑपरेशन के बड़े आर्किटेक्ट माने गए. कांग्रेस सरकार चली गई और भाजपा फिर सत्ता में लौट आई. उसके बाद नए मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा विधायकों से रायशुमारी हुई. कई विधायकों ने कथित रूप से नरोत्तम मिश्रा के पक्ष में नारे भी लगाए. उनके समर्थकों को लगा कि जिसने सत्ता की वापसी की पटकथा लिखी, शायद अब वही उसके शीर्ष पर बैठेगा. लेकिन मुख्यमंत्री फिर शिवराज सिंह चौहान बने.

इसके बाद एक इंटरव्यू में नरोत्तम मिश्रा ने अपने माथे की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा था, “मैं इससे नहीं लड़ सकता.” मतलब … किस्मत से. शायद उनके राजनीतिक जीवन की सबसे सटीक व्याख्या इसी एक वाक्य में छिपी है. वे प्रतिद्वंद्वियों से लड़ सकते थे, कांग्रेस की सरकार गिराने की रणनीति बना सकते थे, प्रशासन और संगठन में अपनी जगह बना सकते थे, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी और उनके बीच हर बार कोई अदृश्य रेखा खिंच जाती थी.

शिवराज सरकार की वापसी, गृह मंत्री बने थे नरोत्तम मिश्रा

शिवराज सरकार की वापसी के बाद नरोत्तम मिश्रा गृह मंत्री बने. इसके बाद भोपाल में उनकी सुबह लगभग एक राजनीतिक बुलेटिन की तरह शुरू होती थी. हर रोज मीडिया उनके घर के बाहर मौजूद रहती. राज्य की राजनीति हो, कांग्रेस का बयान हो, कानून-व्यवस्था का मामला हो, किसी फिल्म का दृश्य हो, किसी विज्ञापन की तस्वीर हो या किसी अभिनेता का बयान नरोत्तम मिश्रा के पास प्रतिक्रिया तैयार रहती. वे केवल गृह मंत्री नहीं रह गए थे. वे मध्य प्रदेश सरकार के दैनिक राजनीतिक कमेंटेटर बन गए थे. सुबह उनकी बाइट आती और कई बार दोपहर तक वह राष्ट्रीय बहस बन जाती. कभी वे पत्रकारों से बातचीत करते हुए खाना खाते दिखते, कभी बीच निवाले में विपक्ष पर हमला कर देते. उनके यहां राजनीति और नाश्ता कई बार एक ही फ्रेम में दिखाई देते थे.

‘पठान’ के गीत पर नरोत्तम मिश्रा की आपत्ति

मीडिया को कंटेंट मिलता था और नरोत्तम मिश्रा को सुर्खियां. लेकिन लगातार बाइट देने की राजनीति का एक नियम है हर दिन खबर बनाने वाला व्यक्ति किसी दिन खुद भी खबर बन जाता है. दिसंबर 2022 में फिल्म ‘पठान’ के गीत ‘बेशरम रंग’ में दीपिका पादुकोण की भगवा रंग की वेशभूषा पर नरोत्तम मिश्रा ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि फिल्म के दृश्य और परिधान नहीं बदले गए तो मध्य प्रदेश में इसके प्रदर्शन पर विचार किया जा सकता है. एक राज्य का गृह मंत्री, मुंबई की फिल्म, दीपिका पादुकोण की पोशाक और भगवा रंग राष्ट्रीय बहस के लिए इससे ज्यादा विस्फोटक मिश्रण शायद ही बन सकता था.

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सब्यसाची को भी दिया था अल्टीमेटल

यह बयान इतना बड़ा हुआ कि सरकार की दूसरी खबरें पीछे रह गईं. मेरी जानकारी में उस दौर में पार्टी के भीतर से भी उन्हें हर सांस्कृतिक या फिल्मी विवाद पर तत्काल प्रतिक्रिया देने से बचने की सलाह दी गई. लेकिन दीपिका पहला मामला नहीं थीं. इससे पहले वे सनी लियोनी के ‘मधुबन’ गीत को लेकर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दे चुके थे. सब्यसाची मुखर्जी के मंगलसूत्र विज्ञापन को हटाने के लिए अल्टीमेटम दिया था. डाबर के उस करवाचौथ विज्ञापन पर आपत्ति की थी जिसमें दो महिलाओं को एक-दूसरे के लिए व्रत करते दिखाया गया था. Netflix की ‘ए सूटेबल बॉय’ में मंदिर परिसर में चुंबन दृश्य को लेकर कार्रवाई के निर्देश दिए थे. वीर दास, मुनव्वर फारूकी और कुणाल कामरा जैसे कलाकार भी उनके बयानों के निशाने पर आए. 

एक समय ऐसा लगने लगा था कि मुंबई में कोई फिल्म, गाना या विज्ञापन रिलीज होने से पहले सेंसर बोर्ड से ज्यादा भोपाल की प्रतिक्रिया का इंतजार करेगा.  समर्थकों के लिए वे हिंदू भावनाओं की रक्षा करने वाले नेता थे. आलोचकों के लिए वे गृह मंत्रालय से सांस्कृतिक सेंसर बोर्ड भी चला रहे थे. लेकिन दोनों पक्षों में एक बात पर सहमति थी नरोत्तम मिश्रा खबर बनाना जानते थे.

कोरोना काल में सरकार लोगों से मास्क पहनने की अपील कर रही थी. इसी दौरान सितंबर 2020 में नरोत्तम मिश्रा एक कार्यक्रम में बिना मास्क दिखाई दिए. जब पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने सहज अंदाज में कह दिया, “मैं मास्क नहीं पहनता, इसमें क्या है.” बयान तुरंत वायरल हुआ. सवाल उठा कि जिस सरकार को नियम लागू कराने हैं, उसका गृह मंत्री ही नियम को हल्के में कैसे ले सकता है?

जब विपक्ष के निशाने पर आ गए थे नरोत्तम मिश्रा

अगले दिन उन्होंने माफी मांग ली और कहा कि उनका बयान प्रधानमंत्री की भावना के अनुरूप नहीं था. यह नरोत्तम शैली का एक और नमूना था पहले बेधड़क बयान, फिर विवाद, फिर स्पष्टीकरण और आखिर में एक नई खबर. अगस्त 2021 में दतिया में बाढ़ आई. नरोत्तम मिश्रा राहत कार्य देखने और फंसे लोगों तक पहुंचने निकले. उनकी नाव एक पेड़ गिरने के कारण क्षतिग्रस्त हो गई. वे बाढ़ के पानी के बीच एक इमारत की छत पर फंस गए और अंततः वायुसेना के हेलिकॉप्टर से उन्हें एयरलिफ्ट करना पड़ा.  तस्वीरें सामने आईं तो विपक्ष को राजनीतिक पंचलाइन मिल गई “बचाने गए गृह मंत्री को खुद बचाना पड़ा.” लेकिन यह प्रसंग केवल मजाक नहीं था. वे वास्तव में जोखिम लेकर बाढ़ प्रभावित इलाके में पहुंचे थे. फर्क इतना था कि राजनीति में नीयत से ज्यादा दृश्य चलता है. और दृश्य यह था कि नीचे बाढ़ थी, ऊपर हेलिकॉप्टर और बीच में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रस्सी से ऊपर खींचे जा रहे थे.

नरोत्तम मिश्रा की राजनीति भी कई बार ऐसी ही रही वे हर संकट में उतरते थे, लेकिन कई बार कहानी का नियंत्रण उनके हाथ से निकल जाता था. खरगोन में अप्रैल 2022 की रामनवमी हिंसा के बाद नरोत्तम मिश्रा ने कहा था “जिन घरों से पत्थर आए हैं, उन घरों को पत्थर का ढेर बना देंगे.” इसके बाद आरोपियों से जुड़े मकानों और दुकानों पर बुलडोजर कार्रवाई हुई.  यह केवल बयान नहीं था, उस दौर की भाजपा राजनीति की नई शब्दावली थी.

एफआईआर बाद में, चेतावनी पहले

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर सत्ता का प्रतीक बन चुका था. मध्य प्रदेश में नरोत्तम मिश्रा उसके सबसे मुखर प्रवक्ता बन गए. उनकी राजनीति में शब्द अक्सर प्रशासनिक कार्रवाई से पहले पहुंचते थे. एफआईआर बाद में होती, चेतावनी पहले आ जाती. जांच बाद में होती, राजनीतिक फैसला पहले सुनाई देता. समर्थकों को इसमें निर्णायक नेतृत्व दिखाई देता था. आलोचकों को कानून की प्रक्रिया से पहले सजा सुनाने की प्रवृत्ति. लेकिन नरोत्तम जानते थे कि टीवी कैमरे को लंबी कानूनी व्याख्या नहीं, एक तेज वाक्य चाहिए और तेज वाक्य उनके पास हमेशा होता था.

मध्य प्रदेश की राजनीति में समय-समय पर यह खबर उड़ती रही कि नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं. कभी शिवराज सिंह चौहान को केंद्र भेजे जाने की चर्चा के साथ उनका नाम आता, कभी नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों में, कभी जातीय समीकरण में और कभी दिल्ली से उनकी निकटता के कारण. लेकिन हर बार खबर आगे बढ़ी और कुर्सी वहीं रही. 2023 का विधानसभा चुनाव आया तो नरोत्तम मिश्रा अपने पुराने गढ़ दतिया से हार गए. वे तीन बार लगातार इस सीट से जीते थे, लेकिन कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें पराजित कर दिया.

हार के बाद उन्होंने शायराना अंदाज में कहा “समंदर की लहरें पीछे जाती दिखें तो किनारे पर घर मत बना लेना, मैं लौटकर आऊंगा.” यह वाक्य नरोत्तम मिश्रा की राजनीति जैसा ही था हार में भी घोषणा, पीछे हटने में भी वापसी की चेतावनी. इसके बाद चर्चा चली कि उन्हें लोकसभा भेजा जा सकता है. फिर राज्यसभा का नाम आया. कभी कहा गया कि वे मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन सकते हैं. पार्टी ने उन्हें कांग्रेस और दूसरे दलों के नेताओं को भाजपा में शामिल कराने वाली ‘न्यू जॉइनिंग टीम’ की जिम्मेदारी दी. उन्होंने दावा किया कि अभियान के दौरान बड़ी संख्या में लोग भाजपा में शामिल हुए.

वे दूसरों के लिए भाजपा के दरवाजे खोलते रहे. लेकिन जब दतिया उपचुनाव आया, अपने लिए वही दरवाजा नहीं खुला.  दतिया उपचुनाव नरोत्तम मिश्रा की वापसी का सबसे स्वाभाविक रास्ता था. वे महीनों से तैयारी कर रहे थे. सभाएं कर रहे थे. कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे. पुरानी गलतियों के लिए माफी मांग रहे थे. यहां तक कि नामांकन पत्र भी खरीद लिया था. लेकिन भाजपा ने आखिरी समय में संघ पृष्ठभूमि वाले पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया.

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जिस नेता ने कभी कहा था “खेल उन्होंने शुरू किया है, खत्म हम करेंगे” उसकी अपनी वापसी का खेल पार्टी ने टिकट की घोषणा से पहले ही खत्म कर दिया. नरोत्तम मिश्रा ने प्रतिक्रिया में कहा कि उन्हें कोई नाराजगी नहीं है. लेकिन दतिया में उनके समर्थक सड़कों पर उतर आए. इस्तीफे हुए, नारे लगे और पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं को संभालना पड़ा.

राजनीति का व्यंग्य देखिए कांग्रेस सरकार गिराने के जिन आर्किटेक्ट की रणनीति की पूरे देश में चर्चा हुई, उन्हें अपनी पुरानी सीट पर उम्मीदवार बनाने के लिए दिल्ली तैयार नहीं हुई. नरोत्तम मिश्रा की कहानी किसी सीधे ग्राफ की तरह नहीं है. वे निर्वाचन आयोग से अयोग्य घोषित हुए, अदालत से राहत लेकर लौटे. भाजपा सत्ता से बाहर हुई, वे सरकार गिराने के बड़े किरदार बने. मुख्यमंत्री पद की चर्चा हुई, कुर्सी किसी और को मिली. गृह मंत्री बने, हर सुबह सुर्खियां बनाईं. फिल्मों से लेकर बाढ़ और बुलडोजर तक हर बड़े दृश्य में मौजूद रहे. चुनाव हारे, लेकिन वापसी का वादा किया.

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फिर उपचुनाव आया. लहर भी लौटी. बस नाव किसी और को मिल गई. शायद इसीलिए उनका वह वाक्य “मैं किस्मत से नहीं लड़ सकता” उनके किसी भी राजनीतिक भाषण से ज्यादा सच्चा लगता है. नरोत्तम मिश्रा ने विरोधियों से कई लड़ाइयां जीतीं. कांग्रेस की सरकार गिराने के खेल में निर्णायक भूमिका निभाई. अपनी बाइट से फिल्म कंपनियों को गीत और विज्ञापन बदलने पर मजबूर किया. बुलडोजर को राजनीतिक भाषा बनाया. बाढ़ में फंसकर भी सुर्खियों से बाहर नहीं हुए. लेकिन अंत में उनकी सबसे कठिन लड़ाई किसी विरोधी पार्टी, किसी अभिनेता, किसी अदालत या किसी पत्रकार से नहीं थी. वह लड़ाई पार्टी की उस सूची से थी, जिसमें उनके नाम की जगह किसी और का नाम लिख दिया गया. कभी उन्होंने कहा था “मैं लौटकर आऊंगा.” अब मध्य प्रदेश की राजनीति इंतजार करेगी कि यह वाक्य फिर भविष्यवाणी साबित होता है या नरोत्तम मिश्रा की लंबी सियासी कहानी का सबसे चर्चित, लेकिन अधूरा संवाद बनकर रह जाता है.




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