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स्तन कैंसर ‘बड़ी इमरजेंसी नहीं’… सरकार का कोर्ट में जवाब; 57 बार लिस्ट हुआ केस, सुनवाई से पहले मरीज की मौत | Kerala High Court breast cancer medication Case listed 57 times patient died before hearing


तिरुवनंतपुरम:

केरल हाईकोर्ट की फाइलों के ढेर में कहीं एक ऐसी याचिका पड़ी है, जो उस महिला से ज्यादा जी चुकी है, जिसने इसे दायर किया था. जून 2022 में वह कोर्ट गई, उनकी बस एक मांग थी, कैंसर की एक दवा, जो जान बचा सकती है, उसे सस्ता कर दिया जाए, लेकिन फैसला आने से पहले ही वह चल बसीं. कोर्ट ने फिर भी केस को बंद नहीं होने दिया. अदालत ने कहा, यह सिर्फ एक महिला का मामला नहीं, हर उस महिला का मामला है जिसे यह दवा चाहिए, चार साल बीत गए केस 57 बार सुनवाई के लिए लिस्ट हुई, फैसला अब भी नहीं आया.

अब ज्योत्सना सिंह और के एम गोपाकुमार ने हाईकोर्ट के मुख्य जज को चिट्ठी लिखी है. गुजारिश है कि इस केस की सुनवाई हो जाने दीजिए, यह चिट्ठी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई है, चिट्ठी में लिखा है, “जिसने यह लड़ाई शुरू की, वह अब नहीं है, यही बताता है कि देरी की कीमत कितनी बड़ी होती है, खासकर जब बात जान बचाने वाली दवा की हो.”

रिबोसिक्लिब नाम की एक दवा है, ये महिलाओं में तेजी से फैलने वाले स्तन कैंसर को रोकने के लिए एक बड़ी उम्मीद है, लेकिन इसकी एक महीने की कीमत है – 78,468 रुपये, एक और दवा है, एवेमसिक्लिब इसकी कीमत 47,752 से 95,584 रुपये महीना है. गरीब या मिडिल क्लास ऐसे घरों के लिए यह दवा नहीं, एक बोझ है. इलाज कराएं या घर चलाएं, बस यही चुनाव बचता है.

महिला ने सिर्फ इतना मांगा था कि सरकार एक कानून का इस्तेमाल करे, जिससे यही दवा भारत में ही, सस्ते दाम पर बन सके, कई बार ऐसी दवाएं 90-95% तक सस्ती हो जाती हैं, लेकिन सरकार ने मना कर दिया और कहा कि स्तन कैंसर कोई ‘बड़ी इमरजेंसी नहीं है.’

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लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं. 2022 में भारत में स्तन कैंसर के करीब 1.9 लाख नए मामले सामने आए, 98,337 महिलाओं ने इसकी वजह से जान गंवाई, यह भारत में कैंसर से होने वाली मौतों की सबसे बड़ी वजह है, फरवरी 2026 में सरकार ने खुद संसद में बताया कि यह संख्या बढ़कर 2.4 लाख तक पहुंच सकती है, इन आंकड़ों में वे सब महिलाएं भी छिपी हैं, जो अब भी इस केस के खत्म होने का इंतज़ार कर रही हैं.

57 सुनवाई, लेकिन फैसला अब भी नहीं

कोर्ट ने कभी इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था, एक मदद करने वाला वकील नियुक्त किया, सरकार से पूरा जवाब मांगा, दवा बनाने वाली कंपनियों को भी बुलाया, जब सरकार ने कहा कि एक पुरानी दवा से काम चल जाएगा, तो वकील ने साबित कर दिया कि वह पुरानी दवा शुरुआती कैंसर में काम ही नहीं करती.

एक ख़ास शनिवार भी तय हुआ था, सिर्फ इसी केस को सुनने और ख़त्म करने के लिए 21 जनवरी 2023 की तारीख़ थी, लेकिन जजों की ड्यूटी बदल गई, और सुनवाई रद्द हो गई, उसके बाद फिर कभी अंतिम सुनवाई नहीं हुई.

2025 में सारी बहस पूरी हो चुकी थी, केस बार-बार फैसले के लिए तैयार’ की लिस्ट में आया, हर बार टल गया, पिछली बार 2 जुलाई 2026 को लगा था, अब 15 जुलाई को लगेगा.

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चिट्ठी में आखिर क्या लिखा है?

“इस केस का जल्दी फ़ैसला होना, उस महिला को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और उन हज़ारों महिलाओं के लिए उम्मीद की एक किरण है, जो इस बीमारी से लड़ रही हैं, लेकिन कोर्ट तक पहुंचने का रास्ता नहीं जानतीं.”

अभी के लिए, फ़ाइल इंतज़ार में पड़ी है, एक और तारीख़, एक और टलना, उस महिला के लिए जो अब यह देखने के लिए नहीं है कि कहानी कैसे ख़त्म होती है, और हज़ारों और महिलाओं के लिए जो अब भी पूछ रही हैं क्या हम देख पाएंगे?

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