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आजादी के 75 साल बाद भी अररिया में नहीं बना पुल, जान जोखिम में डाल लोग करते है नाव का सफर | Araria 75 years after independence no bridge built students risk their lives traveling by boat



देश की आजादी के सात दशक से अधिक बीत जाने के बाद भी बिहार के अररिया जिले का बांडोब  गांव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है. भारत-नेपाल सीमा पर स्थित इस गांव के हजारों ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. विशेषकर बकरा नदी पर पुल का अभाव यहां की लाखों की आबादी के लिए हर दिन जानलेवा साबित हो रहा है.

नाव और बांस की चचरी पर टिकी जिंदगी

बांडोब गांव के लोगों की पूरी दिनचर्या आज भी नाव और बांस की चचरी पर टिकी है. नदी पर पुल न होने के कारण छात्र, बीमार, महिलाएं और बुजुर्ग अपनी जान जोखिम में डालकर कंट्री मेड नाव के सहारे जिला और प्रखंड मुख्यालय तक पहुंचने को मजबूर हैं. ग्रामीण बताते हैं कि जब नदी में पानी कम होता है, तो वे अपने पैसों से बांस की चचरी  बनाते हैं, लेकिन बरसात के दिनों में नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश होने पर बकरा नदी विकराल रूप धारण कर लेती है, जिससे चचरी बह जाती है और इकलौता सहारा नाव ही बचती है.

जनप्रतिनिधियों पर लगे अनदेखी के आरोप

ग्रामीणों का आरोप है कि दशकों से सांसद, विधायक से लेकर स्थानीय अधिकारियों तक पुल निर्माण की गुहार लगाई गई है, लेकिन आज तक सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले हैं. ग्रामीणों का दर्द है कि इस उपेक्षा के पीछे की वजह उनका पिछड़ापन और क्षेत्र विशेष की डेमोग्राफी है. पुल न होने के कारण यहां अक्सर हादसे होते हैं, जिनमें कई लोगों ने अपनी जान भी गवाई है.

प्रशासन की चेतावनी और ग्रामीणों की मांग

नेपाल के तराई क्षेत्रों में हो रही भारी बारिश के बाद बकरा नदी फिर उफान पर है और प्रशासन ने बाढ़ को लेकर अलर्ट भी जारी किया है. बावजूद इसके, बांडोब घाट पर पुल के निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो रही है. ग्रामीणों ने एक बार फिर सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि हजारों लोगों की सुरक्षा को देखते हुए बांडोब घाट पर अविलंब पुल निर्माण की स्वीकृति दी जाए। पुल बनने से न केवल अररिया, बल्कि पलासी प्रखंड के हजारों लोगों को आवागमन की सुरक्षित सुविधा मिलेगी. फिलहाल, ग्रामीणों का यह सफर कब तक मौत के साये में बीतेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है.

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