
10th Muharram History: इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की 10वीं तारीख को ‘आशूरा’ (Ashura) कहा जाता है. दुनिया भर के इतिहास में इस दिन को सबसे गमगीन और दर्दनाक दिनों में से एक माना गया है. यह दिन किसी त्योहार का नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले शहीदों की याद का दिन है.
आइए जानते हैं कि आशूरा का ऐतिहासिक महत्व क्या है और क्यों हजरत इमाम हुसैन (RA) की शहादत की दास्तां आज भी हर इंसान की आंखें नम कर देती है.
आशूरा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
इस्लामिक इतिहास के अनुसार, मुहर्रम का 10वां दिन (आशूरा) बेहद खास और पवित्र माना गया है. कर्बला की घटना से सदियों पहले भी इस दिन का बड़ा महत्व था. माना जाता है कि इसी दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (AS) और उनके अनुयायियों को फिरौन के क्रूर जुल्म से निजात दिलाई थी, जिसके उपलक्ष्य में यहूदी और बाद में मुस्लिम समाज के लोग रोजा (Fasting) रखते आए हैं.
हालांकि, सन 61 हिजरी (680 ईसवी) में इसी तारीख को इराक के कर्बला के मैदान में एक ऐसी दर्दनाक घटना घटी, जिसने इस दिन को कयामत तक के लिए गहरे शोक और आंसुओं में डुबो दिया.
हजरत इमाम हुसैन की शहादत की पूरी दास्तां
कर्बला का यह संग्राम किसी सत्ता या जमीन के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि हक (सत्य) और बातिल (अन्याय/अधर्म) के बीच का वैचारिक संघर्ष था.
यजीद का क्रूर शासन और इमाम हुसैन का इनकार
उस दौर में दमिश्क के क्रूर और विलासी शासक यजीद ने खुद को जबरन इस्लामी खलीफा घोषित कर दिया था. वह इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों को बदलकर अपनी मर्जी का दमनकारी शासन चलाना चाहता था. अपनी सत्ता को वैध साबित करने के लिए उसे पैगंबर मोहम्मद साहब के प्यारे नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन (RA) के समर्थन (बैअत) की जरूरत थी. इमाम हुसैन ने दोटूक शब्दों में यजीद के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया और कहा कि एक अत्याचारी कभी दीन और इंसानियत का रहनुमा नहीं हो सकता.
कर्बला का घेराव और पानी पर कड़ा पहरा
जब इमाम हुसैन अपने परिवार, छोटे बच्चों और वफादार साथियों के साथ मक्का से कूफा की ओर बढ़ रहे थे, तब यजीद की हजारों की विशाल फौज ने उन्हें कर्बला के तपते रेगिस्तान में चारों तरफ से घेर लिया. मुहर्रम की 7 तारीख से ही यजीदी सेना ने इमाम हुसैन के खेमे के लिए फरात नदी का पानी पूरी तरह बंद कर दिया. तपती धूप, रेतीले बवंडर और तीन दिनों की भीषण प्यास के बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया.
10 मुहर्रम: इंसानियत को झकझोर देने वाला खूनी दिन
10वें दिन (आशूरा) यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के महज 72 वफादार साथियों पर हमला बोल दिया. एक-एक करके इमाम हुसैन के भाई, उनके भतीजे (कासिम), उनके 18 वर्षीय पुत्र (अली अकबर) जंग के मैदान में शहीद हो गए. जुल्म की हद तो तब पार हो गई जब यजीदी फौज के तीरंदाजों ने इमाम हुसैन के 6 महीने के मासूम बेटे अली असगर के गले पर तीर चलाकर उन्हें भी शहीद कर दिया.
सजदे में सर्वोच्च बलिदान
जब इमाम हुसैन अकेले बचे और जख्मों से पूरी तरह चूर थे, तब उन्होंने असर की नमाज अदा करने का फैसला किया. जैसे ही वे खुदा की इबादत में सजदे (सिर झुकाना) में गए, यजीदी फौज के शियाम (Shimr) ने पीछे से वार कर उनकी गर्दन पर तलवार चला दी. इमाम हुसैन ने मुस्कुराते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन जुल्म और तानाशाही के सामने घुटने नहीं टेके.
दुनिया भर में कैसे याद किया जाता है आशूरा?
आज भी दुनिया भर के लोग इस दिन को अलग-अलग तरीकों से याद कर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं:
शोक सभाएं और जुलूस (Commemoration): शिया और सूफी समुदाय के लोग इस दिन को गहरे शोक (मातम) के रूप में मनाते हैं. मजलिसों (धार्मिक सभाओं) के जरिए कर्बला की कहानी सुनाई जाती है और शांतिपूर्ण जुलूस निकालकर इमाम हुसैन के सब्र और बलिदान को सलाम किया जाता है.
उपवास और इबादत (Fasting & Prayers): सुन्नी समुदाय के लोग इस दिन पैगंबरों की जीत और अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए 9वीं-10वीं या 10वीं-11वीं मुहर्रम का विशेष रोजा रखते हैं.
सबील और दान (Charity): इस दिन इंसानियत की सेवा के लिए जगह-जगह मुफ्त पानी और शरबत की ‘सबील’ (प्याऊ) लगाई जाती है और गरीबों में खाना बांटा जाता है, ताकि कर्बला के प्यासे शहीदों की याद को जिंदा रखा जा सके.
कर्बला की यह ऐतिहासिक दास्तां सदियों बाद भी दुनिया को यह संदेश देती है कि संख्या बल चाहे कितना भी कम हो, सच्चाई और न्याय के मार्ग पर हमेशा अडिग रहना चाहिए. यही कारण है कि मुहर्रम का 10वां दिन आज भी इतिहास का सबसे गमगीन लेकिन सबसे प्रेरणादायक दिन माना जाता है.
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