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उर्दू की वो किताब जिस पर बनी 2 हिंदी फिल्में, एक में रेखा, दूसरी में ऐश्वर्या, पहली बनी यादगार दूसरी बनी टॉर्चर | two hindi films made on umrao jan ada inspired by urdu novel rekha aishwarya cast one blockbuster second flopped


उर्दू के मशूहर लेखक मिर्जा हादी रुसवा का उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ भारतीय साहित्य की सबसे चर्चित रचनाओं में गिना जाता है. साल 1899 में प्रकाशित इस किताब ने न सिर्फ साहित्य प्रेमियों का दिल जीता, बल्कि बॉलीवुड फिल्ममेकर्स को भी अपनी ओर आकर्षित किया. इसी कहानी पर दो बड़ी फिल्में बनीं, पहली 1981 में निर्देशक मुजफ्फर अली लेकर आए, जिसमें रेखा ने उमराव जान का किरदार निभाया. दूसरी बार 2006 में जे.पी. दत्ता ने इसी कहानी को बड़े पर्दे पर उतारा और इस बार मुख्य भूमिका में ऐश्वर्या राय बच्चन नजर आईं. दिलचस्प बात यह है कि दोनों फिल्मों की तुलना आज भी की जाती है. एक फिल्म क्लासिक बन गई, जबकि दूसरी दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी.

रेखा की ‘उमराव जान’ बनी सिनेमाई इतिहास का हिस्सा

1981 में रिलीज हुई उमराव जान को हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है. फिल्म में रेखा के अलावा फारूक शेख, राज बब्बर और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार थे. रेखा ने एक तवायफ और शायरा के किरदार को जिस खूबसूरती से निभाया, उसने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया. फिल्म के गीत ‘इन आंखों की मस्ती’ और ‘दिल चीज क्या है’ आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं.

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IMDb पर फिल्म को शानदार रेटिंग मिली है और इसे भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शामिल किया जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 50 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में करीब 19.35 करोड़ रुपये का कारोबार किया था. मुजफ्फर अली की बारीक निर्देशन शैली और खय्याम का संगीत फिल्म की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं.

ऐश्वर्या राय की ‘उमराव जान’ क्यों नहीं दोहरा सकी जादू?

साल 2006 में निर्देशक जे.पी. दत्ता ने उमराव जान का नया संस्करण बनाया. फिल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन के साथ अभिषेक बच्चन, शबाना आजमी और सुनील शेट्टी नजर आए. फिल्म को भव्य सेट, शानदार कॉस्ट्यूम और बड़े बजट के साथ तैयार किया गया था. हालांकि रिलीज के बाद इसे दर्शकों और समीक्षकों से मिली जुली प्रतिक्रिया मिली.

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करीब 15 करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ 19 करोड़ रुपये के आसपास का कारोबार कर सकी. कई समीक्षकों का मानना था कि फिल्म तकनीकी रूप से मजबूत होने के बावजूद रेखा वाली उमराव जान की भावनात्मक गहराई और जादू को दोहरा नहीं सकी. यही वजह है कि आज भी जब उमराव जान का जिक्र होता है, तो सबसे पहले रेखा का चेहरा लोगों के जेहन में उभरता है.

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