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Brexit: 10 साल पहले हुआ एक फैसला, जिसने PM की कुर्सी को बना दिया ‘कांटों का ताज’; आज तक अंजाम भुगत रहा ब्रिटेन | Britain PM Resigns Challenges Faced By UK After Brexit Including Economic Slowdown Immigration Political Instablity



साल 2016 में हुए ऐतिहासिक जनमत संग्रह में ब्रिटेन की जनता ने दुनिया के सबसे बड़े सिंगल मार्केट यानी यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने का रास्ता चुना. इसे नाम दिया गया ‘Brexit’ (ब्रिटेन एग्जिट). उस वक्त बड़े-बड़े वादे किए गए थे कि इस फैसले से देश की तरक्की दोगुनी हो जाएगी, लेकिन आज एक दशक बाद हकीकत इसके ठीक उलट है. ब्रेक्सिट ब्रिटेन के गले की ऐसी हड्डी बन चुका है जिसे न निगलते बन रहा है और न उगलते. अब आलम ये है कि देश एक राजनीतिक अस्थिरता के ऐसे कुचक्र में फंस गया है कि पिछले 10 साल में ब्रिटेन में 7वां प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे.

हर आने वाला प्रधानमंत्री आर्थिक नीतियों और ब्रेक्सिट के भारी दबाव के आगे घुटने टेकने को मजबूर है. यूरोपीय संघ से दूरी बनाने के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था और सियासत दोनों ही हांफती नजर आ रही है. मंहगाई, आर्थिक नीतियां और डांवाडोल अर्थव्यवस्था ही वह मुख्य वजहें रही हैं, जिसके चलते यहां एक के बाद एक प्रधानमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा.

निवेश और व्यापार में भारी गिरावट

आंकड़ों की नजर से देखें तो ब्रेक्सिट ब्रिटेन के व्यापार के लिए किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ है. अलग होने के बाद से यूके में होने वाले बिजनेस निवेश में 12% से लेकर 18% तक की भारी कमी दर्ज की गई है. सेंटर फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी रिसर्च (CEPR) के मुताबिक, यूरोपीय संघ के साथ व्यापार में आई दिक्कतों और स्किल्ड यूरोपीय लेबर की आवाजाही पर लगे प्रतिबंधों के कारण ब्रिटेन की प्रोडक्टिविटी और रोजगार का स्तर 3 से 4% तक गिर गया है.

सबसे बड़ा झटका आम जनता की जेब पर लगा है. यूरोपीय संघ से अलग होने के कारण ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति जीडीपी में करीब 6% से 8% की गिरावट आई है. आर्थिक जानकारों का कहना है कि ब्रेक्सिट ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐसा धीमा जहर बन गया है जो लगातार उसकी ताकत को कम कर रहा है, जिसके चलते टैक्स बढ़ रहे हैं और सरकारी खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है.

बिजनेस पर चौतरफा मार

साल 2016 में भले ही अलग होने का फैसला ले लिया गया था, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी. साल 2020 में जाकर ब्रिटेन औपचारिक रूप से ईयू से अलग हुआ और ट्रेड डील साइन हुई. इसके बाद शुरू हुआ असली सिरदर्द. पहले ब्रिटेन यूरोपीय सीमा में बिना किसी रोक-टोक और बिना किसी कस्टम ड्यूटी के माल भेज सकता था. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि ब्रिटेन से फ्रांस की राजधानी पेरिस में सब्जियां भेजना उतना ही आसान था जितना लंदन भेजना आसान था.

लेकिन अब उसी सब्जियों की गाड़ी को फ्रांस की सीमा पार करने के लिए दर्जनों कस्टम चेक, हेल्थ इंस्पेक्शन और अंतहीन कागजी कार्यवाहियों से गुजरना पड़ता है. इसका सीधा असर बड़ी कंपनियों पर पड़ा है. सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में जर्मन इंजीनियरिंग फर्म ‘बॉश’ के हवाले से बताया है कि ब्रेक्सिट से पहले कंपनी को साल में सिर्फ 40 इंपोर्ट ट्रांजैक्शन मैनेज करने पड़ते थे, जो अब बढ़कर सालाना 10,000 हो चुके हैं. इसके लिए कंपनी को अलग से एक पूरा विभाग बनाना पड़ा है. बड़ी कंपनियां तो यह खर्च झेल गईं, लेकिन छोटे व्यापारियों की कमर टूट गई और हजारों छोटे बिजनेस ने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार करना हमेशा के लिए बंद कर दिया.

राजनीतिक अस्थिरता की भी वजह है Brexit

  • डेविड कैमरन ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के लिए कैंपेन चलाने और ब्रेक्ज़िट रेफरेंडम हारने के बाद 2016 में इस्तीफा दे दिया था. 
  • थेरेसा मे ने 2019 में अपने ब्रेक्जिट विथड्रॉल एग्रीमेंट के लिए पार्लियामेंट की मंजूरी बार-बार न मिलने के बाद इस्तीफा दे दिया था.
  • बोरिस जॉनसन ने 2022 में  ब्रेक्जिट को लागू करने के दवाब,  कई स्कैंडल और मंत्रियों के इस्तीफों की लहर के बाद इस्तीफा दिया था. 
  • लिज ट्रस ने 2022 में अपनी सरकार की आर्थिक योजनाओं से शुरू हुए बाजार में उथल-पुथल के बीच 49 दिनों में ही इस्तीफा दिया है. इनका इस्तीफा भी Brexit  का Spill eFfect के तौर पर देखा गया. 
  • ऋषि सुनक सत्ता विरोधी लहर और चरमराती अर्थव्यवस्था के वजह से चुनाव हारे, अर्थव्यवस्था का गर्त में जाने के पीछे Brexit  को ही माना जाता है.

इमीग्रेशन कंट्रोल का वादा पूरी तरह फेल

ब्रेक्सिट के पक्ष में वोट देने वाले नेताओं ने जनता से सबसे बड़ा वादा यह किया था कि यूरोपीय संघ से अलग होते ही देश में बाहरी लोगों यानी इमीग्रेशन (प्रवासियों) की संख्या पर लगाम लग जाएगी. लेकिन जमीनी आंकड़े बताते हैं कि यह वादा पूरी तरह खोखला साबित हुआ. साल 2021 में नया इमीग्रेशन सिस्टम लागू होने के बाद से ब्रिटेन में नेट माइग्रेशन औसतन 5.5 लाख सालाना रहा है, जबकि साल 2010 के दशक में यह आंकड़ा महज 2.5 लाख था.

हद तो तब हो गई जब साल 2023 में नेट माइग्रेशन का आंकड़ा लगभग 9.5 लाख के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया, क्योंकि गैर-यूरोपीय नागरिकों की संख्या में अचानक भारी उछाल आया. यानी जिस इमीग्रेशन को रोकने के लिए ब्रिटेन ने इतना बड़ा कदम उठाया, वह घटने के बजाय दोगुने से ज्यादा बढ़ गया. यही वजह है कि हाल ही में आए YouGov के पोल में 10 में से 6 ब्रिटिश नागरिकों ने माना कि ब्रेक्सिट पूरी तरह से फेल रहा है.

लंदन का फाइनेंशियल मार्केट ही एकमात्र उम्मीद

इस चौतरफा आर्थिक संकट और नुकसान के बीच ब्रिटेन के लिए राहत की बस एक ही खिड़की खुली है और वह है उसकी सर्विसेज एक्सपोर्ट और लंदन का वित्तीय बाजार. ब्रिटेन आज भी अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सर्विसेज एक्सपोर्टर है. ब्रिटेन की जीडीपी में फाइनेंशियल और प्रोफेशनल सर्विसेज का योगदान करीब 11% है और यह सेक्टर 25 लाख लोगों को रोजगार देता है.

शुरुआत में डर था कि ब्रेक्सिट के बाद लंदन अपनी वित्तीय बादशाहत पेरिस या फ्रैंकफर्ट जैसे यूरोपीय शहरों के हाथों गंवा देगा, लेकिन यह डर गलत साबित हुआ. विदेशी निवेश के मामले में लंदन आज भी यूरोप में सबसे आगे है. साल 2015 से 2025 के बीच ब्रिटेन ने अकेले फाइनेंशियल सर्विसेज में 949 विदेशी निवेश प्रोजेक्ट्स को आकर्षित किया, जो फ्रांस और जर्मनी के कुल मिलाकर मिले प्रोजेक्ट्स से भी ज्यादा है. हालांकि, सिर्फ इस एक सेक्टर के दम पर पूरे देश की डूबती अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता को संभालना नामुमकिन साबित हो रहा है.

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