
नई दिल्ली:
केंद्र सरकार ने हाल ही में दो बड़े फैसले लिए हैं. पहला- अग्निपथ योजना में बड़ा बदलाव करते हुए अग्निवीरों को दो साल का एक्सटेंशन मिलेगा. और दूसरा- सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि यूजीसी से जुड़े नियमों पर पुनर्विचार किया जाएगा.
इन दोनों फैसलों के बाद एक सवाल उठ रहा है और वह है क्या बीजेपी अब डैमेज कंट्रोल में जुट गई है? सवाल इसलिए क्योंकि कुछ ही महीनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं.
क्यों बीजेपी के इन दोनों फैसलों को डैमेज कंट्रोल माना जा रहा है? समझेंगे लेकिन उससे पहले इनके बारे में विस्तार से समझ लेते हैं.
क्या हैं सरकार के फैसले?
अग्निपथ स्कीम
सबसे बड़ा फैसला अग्निपथ स्कीम को लेकर है. जून 2022 में इस योजना को जब लाया गया था, तब इसका जमकर विरोध हुआ था.
इस योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है. शुरुआत में इसमें प्रावधान था कि चार साल के बाद 25% अग्निवीर ही सेना में परमानेंट होंगे, जबकि बाकी के 75% को रिटायर कर दिया जाएगा.

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लेकिन अब सरकार ने इसमें बड़ा बदलाव किया है. 25% तो परमानेंट होंगे ही, लेकिन बाकी 75% को भी दो साल का एक्सटेंशन मिलेगा. दो साल बाद भी अगर ये चाहेंगे तो इन्हें परमानेंट कर दिया जाएगा.
यूजीसी नियम
वहीं, यूजीसी से जुड़े नियमों के मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सरकार इन नियमों पर पुनर्विचार करने को तैयार है.
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) इन नियमों पर पुनर्विचार कर रहा है और इसके लिए एक समिति बनाने पर भी विचार चल रहा है.

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केंद्र सरकार ने इस साल 13 जनवरी को यूजीसी नियमों को लागू किया था. इन नियमों का सवर्णों ने जमकर विरोध किया था. इन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में यूजीसी (नियम) के प्रावधान 3(C) को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया गया है. आरोप है कि इसके कारण कुछ वर्गों के छात्रों को हायर एजुकेशन से बाहर किया जा सकता है.
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क्यों हैं ये डैमेज कंट्रोल?
हाल ही में बिहार और उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों पर विधान परिषद के चुनाव हुए थे. इन चुनावों में भाजपा को बड़ा झटका लगा था. इसके लिए यूजीसी (नियमों) को भी एक वजह माना गया.
यूपी और बिहार में यूजीसी नियमों का बड़ा असर देखने को मिला. बीजेपी ने बिहार की पटना-शिक्षक सीट गंवा दी. यहां से भाजपा के नवल किशोर यादव पांच बार से विधान पार्षद थे. वाराणसी में भी दो एमएलसी सीटें हार गईं.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी का कोर वोटर बेस नाराज है, उसे नजरअंदाज किया गया है और उसे हाशिए पर धकेल दिया गया है.
कुछ दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी यूजीसी नियमों को असंतुलित बताया था और कहा था कि सभी पक्षों का ध्यान रखा जाना चाहिए.
उत्तर प्रदेश के चुनाव भी करीब हैं और यूजीसी नियमों को लेकर नाराजगी है. बीजेपी के मंत्री भी बंद कमरों में इस बात को मान चुके हैं कि यूजीसी नियमों के कुछ प्रावधान गलत थे.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यूपी में चुनाव आने वाला है और इससे पहले अगर आपका 12% से 16% कोर वोटर खामोश हो जाए तो आप 100% चुनाव हार जाएंगे. यूजीसी नियमों को लेकर बदले रुख की एक बड़ी वजह यूपी चुनाव है.
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अग्निपथ स्कीम में बदलाव क्यों?
अग्निपथ स्कीम को जब 2022 में लाया गया था, तब कई राज्यों में इसे लेकर जमकर विरोध हुआ था. हजारों की तादाद में युवा इसके खिलाफ थे. लेकिन फिर भी सरकार ने इसे लागू किया.
अब जब 18,300 अग्निवीरों के चार साल का कार्यकाल खत्म होने में सिर्फ तीन हफ्ते बाकी थे, तब सरकार ने अग्निपथ स्कीम में बड़ा बदलाव कर दिया. सरकार ने सभी अग्निवीरों को दो साल का एक्सटेंशन दे दिया. साथ ही दो साल बाद परमानेंट सैनिक बनने का रास्ता भी साफ कर दिया.
कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अग्निवीरों के लिए नौकरी का ऐलान किया था. उन्होंने ऐलान किया था कि यूपी की सरकारी नौकरियों में अग्निवीरों को 20% आरक्षण दिया जाएगा. इसके अलावा, उन्हें बिना किसी भर्ती परीक्षा के सीधे नौकरी भी दी जाएगी.
कुछ ही महीनों में पांच महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब ऐसे राज्य हैं जहां के ज्यादातर युवा सेना में भर्ती होते हैं.
यही कारण है कि अग्निपथ स्कीम में बदलाव को चुनावी दांव से जोड़ा जा रहा है.





