
शाम का वक्त, चौक पर चाय की दुकान. रेडियो पर खबर चल रही है कि AI अब चिट्ठी लिख लेता है, हिसाब कर लेता है, यहां तक कि कहानी भी सुना देता है. बगल में बैठा एक नौजवान, जो शहर की किसी कंपनी में कंप्यूटर पर काम करता है, धीरे से अपने पिता से पूछता है, “पापा, अगर मशीन ही सब करने लगी, तो मेरी नौकरी का क्या होगा?” ये सवाल आज लाखों घरों में पूछा जा रहा है. और डर बेवजह भी नहीं है.

डर कहां से आया?
AI बनाने वाली बड़ी कंपनियों के मालिक खुद अलग-अलग बातें कह रहे हैं. एक बड़ी AI कंपनी, एंथ्रोपिक, के प्रमुख डारियो अमोदेई ने चेतावनी दी है कि आने वाले सालों में दफ्तरों की शुरुआती नौकरियों में से करीब आधी पर खतरा आ सकता है. वहीं, कंप्यूटर चिप बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, एनविडिया, के प्रमुख जेन्सन हुआंग इससे सहमत नहीं. उनकी बात सीधी है:
यानी असली मुकाबला मशीन से नहीं, उस आदमी से है जो मशीन से दोस्ती कर चुका है.
ये पहली बार नहीं हो रहा
जरा अपने गांव को याद कीजिए. जब पहला ट्रैक्टर आया था, तो लोगों ने कहा था, “अब हल चलाने वालों का क्या होगा?” बैलों से जुताई का काम सचमुच कम हुआ. पर साथ ही ट्रैक्टर चलाने वाले ड्राइवर चाहिए थे, मरम्मत करने वाले मिस्त्री चाहिए थे, पुर्जे बेचने वाली दुकानें खुलीं, डीजल पंप लगे. काम खत्म नहीं हुआ, बदल गया. या फिर नुक्कड़ का STD बूथ याद कीजिए. पीले रंग का, जहां लाइन लगाकर दूसरे शहर बात होती थी. मोबाइल आया तो बूथ बंद हो गए. पर उसी नुक्कड़ पर मोबाइल रिचार्ज, मोबाइल रिपेयर और कवर बेचने वाली दस दुकानें खुल गईं.

जब बैंकों में ATM आए, तब भी डर था कि कैशियर की नौकरी चली जाएगी. पर बैंकों ने नई शाखाएँ खोलीं, और कर्मचारी पैसे गिनने के बजाय लोगों को लोन, बीमा और खाते के बारे में समझाने लगे. आंकड़े भी यही कहते हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 2025 की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक दुनिया भर में करीब 9 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं, लेकिन करीब 17 करोड़ नई नौकरियां बनेंगी. यानी नौकरियां घटेंगी कम, बढ़ेंगी ज्यादा. बस वे नई होंगी, और उनके लिए नया हुनर चाहिए होगा.
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कौन सा काम बदलेगा, कौन सा टिकेगा?
एक आसान तरीका है. जो काम हर दिन एक जैसा होता है, जैसे फॉर्म में आंकड़े भरना, एक ही तरह के जवाब देना या सीधा-सादा हिसाब-किताब, वह काम मशीन तेजी से सीख लेगी.
पर जिस काम में हाथ का हुनर लगे, दिल लगे या आमने-सामने भरोसा लगे, वहां मशीन बहुत पीछे है. नर्स का मरीज का हाथ थामना, बिजली मिस्त्री का खंभे पर चढ़ना, किसान का मिट्टी सूंघकर नमी पहचानना, या टीचर का किसी उदास बच्चे को देखकर समझ जाना कि घर में कुछ गड़बड़ है. ये काम AI नहीं कर सकता.
हजारीबाग की महिलाएं आज भी मिट्टी की दीवारों पर सोहराय और खोवर की चित्रकारी करती हैं, जैसे उनकी दादी-नानी करती थीं. सोहराय फसल कटने के बाद, पशुओं के त्योहार पर बनती है, और खोवर शादी-ब्याह के मौसम में. यानी हर रेखा के पीछे एक रीति है, एक मौसम है, एक कहानी है. अभी तक तो लगता है कि यह हुनर मशीन के बस का नहीं. पर सच यह भी है कि AI बहुत तेजी से सीखता है. कुछ तस्वीरें देखकर ही वह किसी भी शैली की नक़ल करने लगता है. हो सकता है कल वह सोहराय जैसी तस्वीरें भी बनाने लगे.

पर अगर ऐसा हुआ भी, तो इन कलाकार दीदियों के लिए दरवाजे बंद नहीं होंगे, बल्कि नए खुलेंगे. AI की मदद से वे नए डिजाइन सोच सकेंगी, पुरानी कला को नए जमाने के कपड़ों, थैलों और घर की सजावट से जोड़ सकेंगी, और कम समय में ज़्यादा काम कर सकेंगी. जो चित्र कभी गांव की एक दीवार तक सीमित था, वह सात समंदर पार किसी घर की दीवार तक पहुंच सकता है.
AI को डर नहीं, औजार बनाइए
2023 में अर्थशास्त्री एरिक ब्रिनजोल्फसन ने अमेरिका के एक कॉल सेंटर के करीब पांच हजार कर्मचारियों पर स्टडी किया. उन्हें एक AI सहायक दिया गया, जिसने कंपनी के सबसे अच्छे कर्मचारियों से गुर सीखे थे. पुराने कर्मचारियों पर खास असर नहीं पड़ा, पर नए कर्मचारियों का काम 34 प्रतिशत तक बढ़ गया. यानी AI दफ्तर के उस अनुभवी बड़े बाबू जैसा है, जो हर नए आदमी को पहले ही दिन अपने सारे गुर सिखा दे.
अब इसे अपनी ज़िंदगी में सोचिए:
- किराने वाले राजू भैया AI से अपनी दुकान के लिए WhatsApp पर ऑफर का मैसेज लिखवा सकते हैं, और हिसाब भी रख सकते हैं.
- सिलाई करने वाली सलमा मोबाइल पर नए डिज़ाइन देखकर ग्राहक को पहले ही दिखा सकती है कि कपड़ा कैसा दिखेगा.
- स्वयं सहायता समूह की दीदियां अपने अचार और पापड़ के लिए अंग्रेजी में डिटेल्स लिखवाकर ऑनलाइन बेच सकती हैं.
- कॉलेज जाने वाला अमित AI से बोलकर अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कर सकता है, बिना किसी के सामने झिझके.

हमारे देश के आधे लोगों की उम्र 28 साल से कम है. जापान में यह उम्र करीब 49 साल है, चीन में करीब 39. यानी दुनिया बूढ़ी हो रही है और भारत जवान है. सवाल ये है कि हमारे नौजवान मशीन से होड़ करेंगे, या उसे अपना औजार बनाकर दुनिया से होड़ करेंगे.
एक खतरा, जिस पर कोई बात नहीं करता
असली खतरा ये नहीं कि मशीन हमारी नौकरी छीन लेगी. असली खतरा ये है कि हम धीरे-धीरे सोचना छोड़ दें. पहले हम दस फोन नंबर याद रखते थे. अब अपने घर वालों का नंबर भी याद नहीं. पहले रास्ता पूछकर चलते थे, अब मोबाइल न हो तो मोहल्ले में भी भटक जाएं. अपनी किताब “Will Artificial Intelligence Enslave Humans by 2033?” में मैंने यही लिखा है: अगर इंसान कभी मशीन का गुलाम बना, तो वह गुलामी जंजीरों में नहीं आएगी, सुविधा बनकर आएगी. एक-एक छोटे आराम के साथ. इसलिए AI से काम लीजिए, पर अपना दिमाग उसे मत सौंपिए.
इस हफ्ते ये पांच काम कीजिए
- अपने फोन में कोई मुफ्त AI ऐप खोलकर देखिए. उससे हिंदी में कोई सवाल पूछिए. डरने की कोई बात नहीं, ये बस एक नया औजार है.
- अपने रोज के काम का एक छोटा हिस्सा उससे करवाकर देखिए. कोई चिट्ठी, कोई हिसाब, कोई संदेश.
- बच्चों को रटना नहीं, सवाल पूछना सिखाइए. आने वाले जमाने में वही आगे बढ़ेगा जो सही सवाल पूछना जानता है.
- कोई हाथ का हुनर जरूर सीखिए. बिजली, नलसाजी, सिलाई, खेती की नई तकनीक. ये काम मशीन से सबसे आखिर में छिनेंगे.
- सरकार के मुफ्त कोर्स देखिए. “स्किल इंडिया डिजिटल” पोर्टल पर डिजिटल और AI से जुड़े कई कोर्स मुफ्त या बहुत कम पैसे में मिलते हैं.
आखिरी बात
चाय की दुकान पर बैठे उस नौजवान को उसके पिता ने क्या जवाब दिया होगा, पता नहीं. पर अगर मुझसे पूछा जाए, तो मेरा जवाब होगा:
नोट- डॉ. मनीष रंजन भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आठ किताबें लिख चुके हैं, जिनमें “Will Artificial Intelligence Enslave Humans by 2033?” भी शामिल है. वे ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय और यूसी बर्कले, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व छात्र हैं. उन्हें प्रधानमंत्री पुरस्कार और राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार मिल चुका है, और वे 2025 के “भारत के टॉप 25 चेंजमेकर्स” में शामिल किए गए. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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