

पुणे के डोंजे गांव स्थित नाना पाटेकर के फार्महाउस पर गुरुवार रात राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ. वहां सिर्फ फिल्मी सितारे और नेता नहीं थे. मराठवाड़ा और विदर्भ से आए दर्जनों किसान देर रात तक इकट्ठा रहे. ‘नाना अमर रहे… नाना अमर रहे’ के नारे गूंजते रहे. जिन खेतों से नाना को प्यार था, उन्हीं खेतों में वे पंचतत्व में विलीन हो गए.
75 साल की उम्र में गोवा में कार्डियक अरेस्ट से निधन के बाद नाना का पार्थिव शरीर उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार पुणे लाया गया. फार्महाउस की जमीन पर अंतिम संस्कार हुआ. वहां मौजूद किसान साथी एनडीटीवी से बात करते हुए भावुक हो गए.
किसानों के लिए बनाया फाउंडेशन
नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ स्क्रीन पर दमदार रोल तक सीमित नहीं थी. 2015 में मराठवाड़ा-विदर्भ में किसान संकट की खबरों ने उन्हें झकझोर दिया. लक्जरी कार के लिए रखे 1.5 करोड़ रुपये उन्होंने किसानों के लिए लगा दिए. मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन शुरू किया. फाउंडेशन ने लाखों किसानों को राहत दी, विधवाओं को सहायता, जल संरक्षण, नदी-नालों का पुनरुद्धार और आपदा राहत का काम किया. नाना खुद फार्म पर खेती करते थे और पैदावार किसानों में बांटते थे. समाजसेवी के रूप में उनकी यह छवि एक्टर वाली छवि से भी बड़ी साबित हुई.
अंतिम संस्कार में घूंगा ‘नाना अमर रहे‘
अंतिम संस्कार के दौरान किसानों का जमावड़ा भावुक करने वाला था. कई लोग रातभर वहां डटे रहे. भीड़ में ‘नाना अमर रहे’ के नारे बार-बार गूंजे. परिवार, फिल्म जगत और राजनीतिक हस्तियां भी मौजूद रहीं, लेकिन किसानों की मौजूदगी ने नाना के असली सरोकार को रेखांकित किया.
नाना पाटेकर ने कभी खुद को सिर्फ स्टार नहीं माना. वे कहते थे कि वे गांव के आदमी हैं. उनकी यह सरलता और किसानों के प्रति समर्पण अंतिम पल तक दिखाई दिया. जिन खेतों से प्यार था, उन्हीं में विलीन हो गए. किसान दोस्त आखिर तक उनके साथ टिके रहे. नाना अमर रहेंगे.
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