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सागर रत्ना की सक्‍सेस स्‍टोरी: जहां खरगे ने दी ‘लंच’ पार्टी, राहुल-प्रियंका समेत विपक्ष के नेताओं ने लिया डोसे का मजा | Sagar Ratna Restaurant Success Story Dosa King Jayaram Banan Congress mallikarjun kharge Lunch Invite


दिल्‍ली का एक रेस्‍टोरेंट आज सियासी चर्चा का केंद्र बना हुआ है. कांग्रेस प्रेसिडेंट मल्लिकार्जुन खरगे के बुलावे पर बुधवार दोपहर करीब दो बजे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मनोज झा, पवन खेड़ा समेत विपक्ष के कई नेता लंच करने पहुंचे. आप समझ ही गए होंगे, हम बात कर रहे हैं, जनपथ स्थित सागर रत्‍ना रेस्‍टोरेंट की. मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त के खिलाफ मंगलवार को हुए प्रदर्शन के बाद बुधवार को आगे की रणनीति पर चर्चा भी हुई. 

सागर रत्‍ना रेस्‍टोरेंट का डोसा और दूसरे साउथ इंडियन डिश खूब पसंद किए जाते हैं. तस्‍वीरों में आप देख पाएंगे कि नेताओं ने बड़े ही चाव के साथ यहां डिशेज का मजा लिया. जितना पॉपुलर यहां का खाना है, उससे भी ज्‍यादा दिलचस्‍प इस रेस्‍टोरेंट की सफलता की कहानी है. 

आप जरा कल्‍पना कीजिए, 80 का दौर था. उस बच्‍चे की उम्र महज 3 साल थी. इसी उम्र में घर छोड़कर वो पहुंचा ‘सपनों की मायानगरी’ मुंबई. जेब में पैसे थे नहीं. और ये भी समझ नहीं आ रहा था कि करें तो करें क्‍या. दो वक्‍त की रोटी चाहिए थी. ऐसे में पेट पालने के लिए एक रेस्‍टोरेंट में काम मिला. जूठे बर्तन धोने का काम. महीने भर बर्तन धोने थे और मिलने थे महज 18 रुपये. 

तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही बच्चा आगे चलकर दक्षिण भारतीय खाने का बड़ा रेस्टोरेंट ब्रांड खड़ा करेगा. ये कहानी है सागर रत्ना के संस्थापक जयराम बनान की, जिन्हें ‘डोसा किंग’ कहा गया और उनका शुरू किए गए ‘सागर रत्‍ना’ रेस्‍टोरेंट का आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी बड़ा नाम है.  
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13 साल की उम्र में छोड़ा घर

कर्नाटक के उडुपी में जन्मे जयराम बनान पढ़ाई के दौरान एक कक्षा में फेल हो गए. उन्हें पिता की पिटाई का डर था. इसी डर के चलते करीब 13 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और मुंबई पहुंच गए.

मुंबई में एक परिचित के रेस्टोरेंट में उन्हें काम मिल गया. उम्र कम थी, इसलिए शुरुआत जूठे बर्तन साफ करने से हुई. इसके बदले उन्हें हर महीने सिर्फ 18 रुपये मिलते थे.

करीब छह साल तक उन्होंने इसी तरह काम किया. लेकिन बनान ने इस नौकरी को सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बनाया. उन्होंने रेस्टोरेंट के काम को करीब से समझना शुरू किया.

धीरे-धीरे जिम्मेदारियां बढ़ीं. बर्तन साफ करने वाले कर्मचारी से वो वेटर बने और फिर मैनेजर तक पहुंचे. इसके साथ उनकी सैलरी भी बढ़ती गई और करीब 200 रुपये महीने तक पहुंच गई.

नौकरी में सीखा कारोबार का हुनर

कई साल रेस्टोरेंट में काम करने के बाद जयराम बनान ने अपना कारोबार शुरू करने का फैसला किया. वो दिल्ली पहुंचे और पहले कैंटीन का काम संभाला.

इसके बाद दक्षिण दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में ‘सागर’ नाम से अपना रेस्टोरेंट शुरू किया.

यहां उन्होंने खाने की क्वालिटी, साफ-सफाई और ग्राहक के भरोसे पर खास ध्यान दिया. कारोबार बढ़ा तो कुछ समय बाद ‘सागर रत्ना’ नाम से दूसरा आउटलेट शुरू किया गया.

यहीं से उनका छोटा कारोबार एक बड़े रेस्टोरेंट ब्रांड में बदलने लगा.

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फ्रेंचाइजी मॉडल ने बदल दी रफ्तार

सागर रत्ना ने 1990 के दशक के आखिर में फ्रेंचाइजी मॉडल के जरिए तेजी से विस्तार करना शुरू किया.

दिल्ली से शुरू हुआ ये ब्रांड नोएडा, पंजाब, कर्नाटक, असम और जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों तक पहुंच गया. कनॉट प्लेस और होटल अशोक जैसे प्रमुख स्थानों पर भी इसके आउटलेट खुले.

वैष्णो देवी जैसे धार्मिक स्थलों तक सागर रत्ना की मौजूदगी पहुंची. यानी ब्रांड ने सिर्फ बड़े शहरों पर ही फोकस नहीं किया, बल्कि अलग-अलग तरह के बाजारों में अपनी जगह बनाई.

फिर विदेश पहुंचा डोसे का स्वाद

सागर रत्ना का विस्तार भारत तक सीमित नहीं रहा. 2005 में सिंगापुर में पहला इंटरनेशनल आउटलेट शुरू हुआ. इसके बाद बैंकॉक समेत दूसरे बाजारों में भी ब्रांड पहुंचा.

जिस शख्स ने कभी 18 रुपये महीने के लिए रेस्टोरेंट में जूठे बर्तन मांजे थे, उसके कारोबार का दक्षिण भारतीय स्वाद अब देश की सीमाओं के बाहर भी पहुंच चुका था.

दुनियाभर में 175+ आउटलेट 

जयराम बनान की कहानी की सबसे खास बात उनकी शुरुआत है. उन्होंने कारोबार की शुरुआत किसी बड़े कारोबारी परिवार या बड़ी पूंजी के साथ नहीं की थी.

उनकी पहली सीढ़ी थी 18 रुपये की नौकरी और जूठे बर्तन. रेस्टोरेंट में काम करते हुए उन्होंने कारोबार की बारीकियां सीखीं, फिर उसी अनुभव को अपने कारोबार में इस्तेमाल किया.

आज सागर रत्ना के भारत और विदेशों में 100 से ज्यादा आउटलेट्स हैं. कई रिपोर्टों में इनकी संख्या 175 से ज्यादा बताई गई है. साल 2022 में जयराम बनान को कन्नड़ राज्योत्सव पुरस्कार भी दिया गया.

जूठे बर्तन मांजने से शुरू हुआ सफर ‘डोसा किंग’ की पहचान तक पहुंचा. उनकी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि कारोबार की शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सीखने, मेहनत करने और आगे बढ़ने की कोशिश बड़ी हो तो वही छोटी शुरुआत आगे चलकर बड़े ब्रांड की नींव बन सकती है.

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