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अगर चुनाव फिक्स हैं तो कांग्रेस बहिष्कार क्यों नहीं करती? राहुल के ‘ध्यान भटकाने’ वाले जवाब में कितना लॉजिक | why-doesnt-congress-boycott-if-polls-are-fixed-answer-beyond-rahul-gandhi-distraction-quip



अगर आप कहते हैं कि अंपायर ही बिका हुआ है, तो फिर खेलें ही क्यों? सुनने में तो यह बात बहुत आसान लगती है, लेकिन असल में ऐसा है नहीं.

राहुल गांधी कई महीनों से यह कहते आ रहे हैं कि भारत का चुनाव आयोग बिका हुआ है. उन्होंने कर्नाटक से लेकर हरियाणा और महाराष्ट्र तक ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया है, बिहार में यात्रा के दौरान भी यह मुद्दा उठाया, और हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से ‘सरकारी गवाह’ बनने को कहा. उनका दावा है कि हाल के चुनावों में वोटर लिस्ट में हेर-फेर की गई है.

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राहुल ने कहा, ‘आज चुनाव का सिस्टम पूरी तरह से खराब हो चुका है और इस तरह चुनी गई संसद से पास किए गए कानूनों को गैर-कानूनी माना जा सकता है, क्योंकि वोट की अहमियत खत्म हो गई है.’ उन्होंने यह बात तब कही, जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग (EC) के अंदर असहमति की खबर छापी.

अखबार की रिपोर्ट पर चुनाव आयोग ने सफाई दी, जिसके बाद कांग्रेस ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘बुनियादी सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं.’

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लेकिन राहुल गांधी से भी उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक अहम सवाल पूछा गया. क्या कांग्रेस चुनावों का बहिष्कार करेगी? राहुल ने पहले अपनी दलीलों का सार बताया. फिर उन्होंने ‘बहिष्कार’ वाले सवाल का जवाब ‘ध्यान भटकाने’ वाली बात कहकर दिया. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘मैं ध्यान भटकाने वाली बातों में नहीं पड़ूंगा. मैं ऐसी बातों से बचूंगा. लेकिन धन्यवाद.’

इस मजाक से आगे बढ़कर, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन ने अब मार्च और रैलियां करने का ऐलान किया है. 30 सितंबर को गठबंधन की बैठक के बाद राहुल ने कहा, ‘हमारी सामूहिक राय है कि (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी, (गृह मंत्री) अमित शाह और ज्ञानेश कुमार ने चुनाव में धांधली की है. हम इसे चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे.’

‘अलग मामला’ से ‘ध्यान भटकाने’ तक

बॉयकॉट की सबसे जबरदस्त मांग राजनीतिक विपक्ष के बाहर से, यानी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से आई है. यह Gen-Z युवाओं का एक विरोध आंदोलन है, जिसके जंतर-मंतर पर किए गए धरने के कारण जुलाई में शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था. 

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने X पर लिखा, ‘जब आप धांधली वाले चुनावों में हिस्सा लेते रहते हैं, तो आप इन चुनावों को जायज ठहराते हैं और इस भ्रम को बनाए रखने में मदद करते हैं कि ये चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हैं.’

राहुल गांधी और कांग्रेस ने कम से कम एक साल तक इस विचार को टाल दिया.

जुलाई 2025 में, जब पूछा गया कि क्या बहिष्कार एक विकल्प है, तो कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने कहा, ‘सभी विकल्पों पर चर्चा हो रही है.’ राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव आयोग अपना काम नहीं कर रहा है.

7 अगस्त 2025 को, जब बहिष्कार के बारे में सीधे पूछा गया, तो राहुल गांधी ने कहा, ‘विपक्षी पार्टियां क्या कदम उठाएंगी, आने वाले दिनों में हम कैसे आगे बढ़ेंगे, यह एक अलग बात है.’ इससे साफ तौर पर कुछ खास पता नहीं चला.

अगले महीने, राहुल गांधी ने और भी बातें कहीं. उन्होंने कहा, ‘मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाग लेना है. मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है. यह भारत में संस्थाओं का काम है. लेकिन वे ऐसा नहीं कर रही हैं.’ 

उस साल नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में, RJD-कांग्रेस गठबंधन को BJP के नेतृत्व वाले NDA से भारी हार का सामना करना पड़ा.

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विपक्ष का तर्क

विपक्ष के दो नेताओं ने तर्क दिया है कि राहुल गांधी ने अपनी बात ठीक से नहीं रखी. कांग्रेस वर्किंग कमेटी के स्थायी सदस्य और पार्टी अध्यक्ष के कार्यालय का कामकाज देखने वाले गुरदीप सिंह सप्पल ने लिखा, ‘बायकॉट का मतलब है मैदान छोड़ना, और मैदान छोड़ने को विरोध नहीं कहा जा सकता.’ 

उन्होंने तर्क दिया कि जो पार्टी चुनाव लड़ती है, उसके हर बूथ पर पोलिंग एजेंट होते हैं और उसे नतीजों को कोर्ट में चुनौती देने का अधिकार होता है. उन्होंने लिखा, ‘बायकॉट से धांधली नहीं रुकती, बल्कि इससे गवाह ही हट जाते हैं.’

ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने ‘X’ पर सप्पल की बात का जवाब एक फॉर्मूले के साथ दिया और कहा- ‘विपक्ष का चुनाव बहिष्कार = बीजेपी की सभी सीटों पर जीत.’

बायकॉट से असल में क्या होता है?

रिसर्चर और थिंक टैंक की रिपोर्ट बताती हैं कि हालात मायने रखते हैं. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के मैथ्यू फ्रैंकल की 2010 की एक पॉलिसी रिपोर्ट में 1990 से 2009 के बीच हुए 171 बायकॉट का आकलन किया गया, जिनमें से कई दक्षिण अमेरिका और मध्य पूर्व में हुए थे. 

उन्हें लगा कि इनमें से सिर्फ 4 प्रतिशत बायकॉट का ही सकारात्मक नतीजा निकला. उन्होंने ‘धमकाओ लेकिन शामिल हो’ वाले तरीके को अपनाने की बात कही, जो उनकी रिपोर्ट का शीर्षक भी था.

बांग्लादेश में, खालिदा जिया की BNP ने 2014 के चुनावों का बायकॉट किया. इसका नतीजा यह हुआ कि शेख हसीना की अवामी लीग ने एक और दशक तक शासन किया, जब तक कि विरोध-प्रदर्शनों के जरिए उन्हें सत्ता से नहीं हटाया गया. 

इसके बाद हुए चुनावों में जिया के बेटे प्रधानमंत्री बने, क्योंकि हसीना और उनकी लीग को चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया गया था. 

बांग्लादेशी पॉलिटिकल साइंटिस्ट अली रियाज, जो बाद में अंतरिम सरकार के संविधान सुधार आयोग के प्रमुख बने, ने 2024 के चुनावों के बाद कहा कि विपक्षी पार्टी के बायकॉट ने हसीना सरकार के क्रूर तरीकों को तो उजागर किया, लेकिन यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाया क्योंकि वे कोई साझा मंच नहीं बना पाए या लोगों को सड़कों पर एकजुट नहीं कर पाए.

उन्होंने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि विपक्ष की एकता ही बायकॉट को सार्थक बना सकती है.

इतिहास के प्रोफेसर और राजनीतिक कमेंटेटर हरजेश्वर पाल सिंह ने NDTV को बताया कि भारत में भी ऐसे कुछ उदाहरण रहे हैं. 

उन्होंने याद करते हुए कहा, ‘1992 में पंजाब में उग्रवाद के माहौल और लगभग पांच साल तक राष्ट्रपति शासन रहने के बाद, अकाली दल के ज्यादातर गुट विधानसभा चुनावों से दूर रहे.’ वोटिंग प्रतिशत 24% से भी कम रहा और कांग्रेस जीत गई. 

उन्होंने बताया, ‘बादल के अकाली दल ने मैदान कांग्रेस के लिए छोड़ दिया था, लेकिन आखिरकार 1997 में वे सत्ता में लौट आए.’ उन्होंने इसे ‘अभी नुकसान, बाद में फायदा’ वाले नतीजे के तौर पर देखा, लेकिन इसमें शुरुआती नुकसान ने ‘अकालियों का अस्तित्व ही लगभग खत्म कर दिया था.’

उन्होंने मोल-भाव के उदाहरण के तौर पर आजादी से पहले के भारत का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया, ‘कांग्रेस ने 1920 में अंग्रेजों की बनाई गई परिषदों का बहिष्कार किया, और कुछ ही सालों बाद उनमें चुनाव लड़ने के लिए लौट आई. पहले तो उसने उन चुनावों के बहिष्कार की धमकी दी, और फिर 1937 के चुनावों के बाद बदले में कुछ रियायतें हासिल करने में भी कामयाब रही.’

1947 के बाद भारत में इस तरह के बहिष्कार मुख्य रूप से उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में हुए हैं. किसी भी राष्ट्रीय पार्टी ने लोकसभा चुनाव का बहिष्कार नहीं किया है.

1937 में भी, जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिटिश शासन के तहत चुनावों में हिस्सा लेने का समर्थन किया था. 9 फरवरी, 1937 को बॉम्बे में एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘देश में केवल दो ताकतें हो सकती हैं, एक जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करती है, और दूसरी, सरकार.’

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कानून क्या कहता है और आगे क्या हो सकता है?

नेहरू को छोड़ दें, तो भारत और पूरे उपमहाद्वीप में लगभग हर चीज के लिए क्रिकेट का उदाहरण दिया जाता है.

1978 में पाकिस्तान के साहीवाल में, भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी ने अपने बल्लेबाजों को मैदान से बाहर बुला लिया था. उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि अंपायर बाउंसर गेंदों को ‘खतरनाक खेल’ या ‘वाइड’ नहीं मान रहे थे. जीत के लिए 14 गेंदों पर 23 रन चाहिए थे और आठ विकेट हाथ में थे, यानी जीत मुमकिन थी. लेकिन बेदी ने मैच का बहिष्कार करने का फैसला किया. स्कोरबुक में पाकिस्तान की जीत दर्ज हुई. 

भारत का चुनाव कानून भी कुछ इसी तरह काम करता है. चुनाव तब भी वैध माना जाता है, चाहे कितने भी लोग वोट दें या न दें. अगर सिर्फ एक उम्मीदवार हो, तो उस व्यक्ति को बिना वोटिंग के ही चुना हुआ घोषित कर दिया जाता है.

क्रिकेट वाली मिसाल पर बात करते हुए, हरजेश्वर पाल सिंह ने कहा कि नेताओं के मंच से किए गए दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर वैचारिक जोश की कमी है. 

उन्होंने कहा, ‘सवाल यह है कि क्या कप्तान के कहने पर भी उम्मीदवार या नेता मैदान छोड़ देंगे?’ 

उन्होंने तर्क दिया कि, उदाहरण के लिए, अगर राहुल गांधी चुनाव के बहिष्कार का ऐलान भी कर दें, तो भी हो सकता है कि निर्वाचन क्षेत्र के नेता चुनावी मैदान में उतर जाएं, या किसी ऐसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाएं या नई पार्टी बना लें जो चुनाव लड़ रही हो. उन्होंने यह भी कहा, ‘और हो सकता है कि बीजेपी विरोधी सभी पार्टियां इस बात से सहमत न हों.’

प्रोफेसर ने चुनाव में हिस्सा लेने के पक्ष में आगे तर्क दिया, ‘भले ही इस बात को मान लिया जाए कि बीजेपी कुछ राज्यों में कांग्रेस को जीतने देती है जहां बीजेपी की कोई मजबूत स्थिति नहीं है या ‘निष्पक्षता का दिखावा बनाए रखने के लिए’, फिर भी इससे राहुल गांधी की पार्टी को कुछ सत्ता हासिल होती है. अगर आप फंड जुटाने और पार्टी को चलाने – भले ही एक आंदोलन के तौर पर ही क्यों न हो – के लिहाज से प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं, तो यह बात अहम है.’

इस बात पर जोर देते हुए कि चुनावों के अलावा भी लोगों की राय में ही असली ताकत होती है, उन्होंने कहा, ‘अगर कांग्रेस लोगों तक सही ढंग से अपनी बात पहुंचा सके, तो जनमत को अपने पक्ष में किया जा सकता है. जनमत के कुछ क्षेत्रों में मोदी सरकार के लिए चुनौतियां पहले ही उभर रही हैं. जैसा कि कहा जाता है, कुछ न कुछ तो बदलना ही है.’

इस बीच, चुनाव आयोग ने कहा है कि फैसला लेने की प्रक्रिया में अंदरूनी आपत्तियां शामिल थीं. आयोग के प्रेस नोट में कहा गया, ‘किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना एक सामान्य बात है.’ बीजेपी ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है और कहा है कि कांग्रेस का आरोप बस हार न पचा पाने की वजह से है.

कांग्रेस और अन्य दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए कई तरीके अपनाए हैं. अप्रैल में, राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने ज्ञानेश कुमार को हटाने पर वोटिंग के लिए उनके नोटिस को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. 

अगर मंजूरी मिल भी जाती, तो हटाने के प्रस्ताव के लिए दोनों सदनों में ‘स्पेशल मेजॉरिटी’ की जरूरत होती, जो INDIA ब्लॉक के पास नहीं है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.

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अब लड़ाई सड़क पर होगी!

अब लड़ाई सड़क पर लड़ी जाएगी. 30 सितंबर को INDIA गठबंधन की बैठक के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक बड़े आंदोलन का ऐलान किया. उन्होंने पांच मांगें रखीं:- 

  • SIR से पहले वाली वोटर लिस्ट को फिर से लागू करना. 
  • नाम हटाने से पहले अपील का साफ अधिकार देना.
  • प्रशासनिक खामियों की वजह से नाम कटने से सुरक्षा. 
  • पहली बार वोट देने वालों के लिए आसान रजिस्ट्रेशन.
  • इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) की जगह फिर से बैलेट पेपर का इस्तेमाल करना.

पार्टी ने कहा, ‘वोट चोरी के खिलाफ हमारी लड़ाई बंद कमरों तक सीमित नहीं रहेगी.’

6 अक्टूबर को दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर तक एक विरोध मार्च निकालने की योजना है. इसके बाद ज़िलों में रैलियां होंगी और फिर 1 नवंबर को राजधानी में एक बड़ी सभा होगी. AAP और DMK ने BJP के खिलाफ आवाज तो उठाई, लेकिन वे INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल नहीं हुए. CJP ने भी 2 अक्टूबर को अपनी रैली तय की है, जिसे कुछ पार्टियों का समर्थन मिल रहा है.

2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों के अगले बड़े दौर में देश का अहम राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जहां 2017 से बीजेपी सत्ता में है.

राहुल गांधी ने बहिष्कार के सवाल को ध्यान भटकाने वाली बात बताया है, लेकिन एक साल पहले कही गई उनकी बात आज भी यह बताती है कि उनकी पार्टी क्या कर रही है और वह यह कि ‘मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिस्सा लेना है. मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है. यह काम भारत की संस्थाओं का है.’





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