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क्रांति या उथल-पुथल नहीं, बुद्ध के मध्यम-मार्ग और स्थिरता के उपासक हैं नरेंद्र मोदी | Why Narendra Modi Is Not a Revolutionary but a Gradual Reformer


नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के तौर पर 25 साल देखने के बाद अब सबको ये मान लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी क्रांतिकारी नहीं हैं. वे जिद्दी नहीं हैं और कोई भी बदलाव वे सनक या विचारधारा के लिए नहीं करते. मुख्यमंत्री बनने के दिन से विश्लेषकों ने उन्हें आयरन हैंड वाला नेता बताया, जो सब कुछ बदल कर रख देगा. आलोचक और प्रशंसक दोनों तरह के विश्लेषक उनसे भारी बदलाव या उथल-पुथल की उम्मीद करते रहे. लेकिन उन सभी आशंकाओं को खारिज करने का समय आ गया है. 

अब निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी सिर्फ बदलने के लिए कोई बदलाव नहीं करेंगे. नरेंद्र मोदी ऐसे सुधारवादी नेता हैं, जो झटके से बदलाव करने की जगह, निरंतरता बनाए रखते हुए क्रमिक बदलाव को पसंद करते हैं.

नरेंद्र मोदी ने क्या बदलाव किए हैं

ऐसा नहीं है कि मोदी ने बदलाव नहीं किया है. मोदी ने राजनीतिक परंपराओं व परिवारवाद को चुनौती दी है. राजधानियों में जमे हुए हितों और इलीट समूहों को चुनौती दी है. और ऐसी नीतियां लागू की हैं, जिन्होंने सरकार के काम करने के तरीके को बदला है.

लेकिन सुधारवादी और क्रांतिकारी होने में एक बड़ा फर्क है.

मोदी ने शायद ही कभी सिर्फ बदलाव के लिए या सिर्फ विचारधारा के कारण, चीजों को बदला है. क्रांतिकारी इसलिए बदलाव करता है क्योंकि उसे पुरानी व्यवस्था को तोड़ना होता है. सुधारवादी इसलिए बदलाव करता है क्योंकि कई बार पुरानी व्यवस्था को बचाने के लिए उसमें सुधार करना जरूरी होता है.

मोदी की राजनीति की शायद यही सबसे ज्यादा नजरअंदाज की गई विशेषता है. मूल रूप से नरेंद्र मोदी बुद्ध के मध्यम मार्ग पर चलते हैं. वो वैचारिक अतियों से बचते हैं. उनकी राजनीतिक शैली हमेशा जोश पैदा नहीं करती. लेकिन वह लंबे समय की स्थिरता पर जोर देती है. वे अपने कार्यों से सनसनी पैदा नहीं करते.ये उनके स्वभाव के विरुद्ध है.

इसे पिछली यूपीए सरकार की नीतियों के साथ मोदी के संबंध से समझा जा सकता है.

नरेंद्र मोदी ने मनरेगा में क्या बदला

मोदी और बीजेपी यूपीए सरकार की कई योजनाओं को लागू करने के तरीके के आलोचक थे. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा, उनकी आलोचना का एक प्रमुख विषय था. इसमें भ्रष्टाचार, लीकेज और खराब क्रियान्वयन के आरोप लगाए जाते थे.

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लेकिन जब मोदी सत्ता में आए, तो उन्होंने इस योजना को खत्म नहीं किया. इसके बजाय, सरकार ने ग्रामीण रोजगार की गारंटी के विचार को बनाए रखा और उसे लागू करने के तरीके में बदलाव किया. कई प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया. लीकेज और भ्रष्टाचार को कम करने की कोशिश की गई. ये योजना नए नाम के साथ आज भी जारी है.

यह घटना बहुत कुछ बताती है.

यह मोदी के शासन के तरीके का एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाती है. वे किसी नीति को लागू करने के तरीके को गलत मान सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जिस समस्या को हल करने के लिए वह नीति बनाई गई थी, उस नीति को भी वे गलत मानते हैं. उन्होंने आधार और बायोमैट्रिक पहचान प्रक्रियाओं को भी जारी रखा और उनका विस्तार किया.

यह कोई छोटी बात नहीं है.

यही सोच सरकार के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देती है. पिछली सरकार की बनाई हुई कोई नीति सिर्फ इसलिए रिजेक्ट करने के लायक नहीं हो जाती कि उसे विरोधी दल की सरकार ने बनाया था. इसी तरह, कोई मौजूदा संस्था सिर्फ इसलिए गैर-जरूरी नहीं हो जाती कि नई सरकार सत्ता में आ गई है.

आर्थिक उदारीकरण पर मोदी मोदी सरकार का क्या रुख है

आर्थिक उदारीकरण के मामले में भी मोदी कमोबेश पीवी नरसिंह राव की शुरू की गई दिशा पर ही आगे बढ़ते हैं. इसमें उन्होंने कई इनोवेशन किए हैं, कुछ प्रक्रियाओं को गति दी है और उद्योग और विकास के क्षेत्र की कई बाधाओं को दूर किया है. इकॉनोमी को डिजिटल रास्ते से फॉर्मल किया गया है. जीएसटी से टैक्स कलेक्शन को सरल बनाया है, जिससे टैक्स रेवेन्यू बढ़ा है. कई पुराने और अनावश्यक कानूनी और प्रॉसेस की बाधाओं को दूर किया गया है, पर मूल दिशा विकास और उदारीकरण की ही है.

किसी को ये आशंका नहीं है कि वे अचानक वामपंथी हो जाएंगे या ऐसा बदलाव कर देंगे कि औद्योगिक विकास रुक जाए. पॉलिसी में वे निरंतरता बनाए रखते नजर आते हैं. किसी भी निवेशक को वे चिंतित करने के पक्षधर नहीं हैं. 

मोदी अपने कई पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक संविधानवादी भी नजर आते हैं. मोदी की अपनी राजनीतिक यात्रा भी इस सोच को समझने में मदद करती है. वे दिल्ली के पारंपरिक सत्ता और विशेषाधिकार वाले इलीट नेटवर्क से होकर राष्ट्रीय राजनीति में नहीं आए हैं. उन्हें कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली. वे संगठन के काम, राजनीतिक लामबंदी और चुनावों के रास्ते आगे बढ़े.

क्या नरेंद्र मोदी संविधान के रक्षक हैं

उन्हें लोकतंत्र और चुनावी राजनीति से गहरा लगाव है. वडनगर से गांधीनगर और फिर नई दिल्ली तक की उनकी यात्रा कई मायनों में भारत के चुनावी लोकतंत्र की वजह से संभव हुई. वे लोकतांत्रिक व्यवस्था से सबसे ज्यादा लाभ पाने वाले नेताओं में से एक हैं. यह अनुभव महत्वपूर्ण है.

इसलिए वे संविधान के रक्षक हैं. इसलिए वे चुनावी लोकतंत्र के प्रशंसक हैं. मोदी ने भारत पर कभी इस तरह शासन नहीं किया, जैसे यह देश पूरी तरह नए सिरे से बनाया जाना बाकी हो.

उन्हें एक स्थिर संविधान मिला. नौकरशाही मिली. अर्थव्यवस्था मिली. न्यायपालिका मिली. एक संघीय व्यवस्था मिली. संसदीय व्यवस्था मिली. और एक जटिल सामाजिक व्यवस्था मिली. उन्होंने जरूरत पड़ने पर इनकी दिशा बदलने की कोशिश की है. लेकिन उन्होंने इनकी मूल संरचना को खत्म करने की कोशिश नहीं की.

मोदी के दौर में हुए संवैधानिक बदलाव इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं. 2014 से 2026 के बीच संविधान में महत्वपूर्ण बदलाव हुए. लेकिन ये बदलाव संविधान में दिए गए संशोधन के प्रावधानों से किए गए. EWS आरक्षण और महिलाओं के आरक्षण जैसे संशोधनों ने संवैधानिक व्यवस्था के मूल स्वरूप या बेसिक स्ट्ररक्चर बदलने की कोशिश नहीं की. साथ ही कार्यकाल की लंबाई को देखें तो मोदी ने बेहद कम संविधान संशोधन किए हैं और हर संविधान संशोधन विपक्ष के समर्थन से किया है, जबकि कई बार वे काम विपक्ष के विरोध के बावजूद कर सकते थे. 

इस अंतर पर ध्यान देना जरूरी है. भारत का संविधान सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं है. यह वह आधारभूत ढांचा है, जो भाषा, धर्म, क्षेत्र और सामाजिक विविधता वाले इस विशाल देश को एक साथ रखता है. ऐसी व्यवस्था में बदलाव के लिए यह तय करना पड़ता है कि क्या बचाना है और क्या बदलना है.

प्राचीन भारतीय परंपराओं को कितना महत्व दिया

मोदी लगातार भारतीय सभ्यता को भारत की सार्वजनिक आत्म-समझ के केंद्र में लाने की कोशिश करते रहे हैं. योग, आयुर्वेद, पारंपरिक ज्ञान और प्राचीन भारतीय परंपराओं को उनके कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं ज्यादा पहचान मिली है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं. 2014 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इसका प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव को 175 देशों का समर्थन मिला. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया.

इस प्रयास के पीछे एक महत्वपूर्ण विचार है. आधुनिक होने का मतलब अपनी संस्कृति को भूल जाना नहीं है. भारत तकनीक, वैश्वीकरण और आर्थिक आधुनिकीकरण को अपना सकता है.इसके साथ ही वह अपनी सभ्यतागत विरासत को पुराना या शर्मिंदगी की चीज नहीं मानता. बल्कि उस पर गर्व करता है.

कुल मिलाकर, उनका तरीका संस्थागत निरंतरता के भीतर जरूरी सुधारों के ज्यादा करीब है. वे यह नहीं मानते कि उनसे पहले बनी हर व्यवस्था सिर्फ इसलिए गलत है क्योंकि वह उनसे पहले बनी थी.

मोदी हाईवे बना सकते हैं. डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दे सकते हैं. कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ा सकते हैं. स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित कर सकते हैं. तकनीकी आधुनिकीकरण को आगे बढ़ा सकते हैं. और साथ ही मंदिरों, योग, शास्त्रीय भाषाओं, कुंभ मेले, आयुर्वेद और प्राचीन भारतीय परंपराओं को भी महत्व दे सकते हैं.

शायद यही मोदी की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है.

जो बचाया जा सकता है, उसे बचाइए.
जिसे बदलना जरूरी है, उसे बदलिए.
हर नएपन को प्रगति समझने की गलती मत कीजिए.

मोदी के दौर ने निश्चित रूप से भारत को बदला है. लेकिन यह शास्त्रीय अर्थ में कोई क्रांति नहीं रही है. इसलिए बेहतर सवाल यह नहीं है कि मोदी ने कितना बदला. सवाल यह है कि उन्होंने कितना नहीं बदला.

इस सवाल का जवाब हमें उस व्यक्ति, उस राजनेता और उसके शासन के दर्शन के बारे में बहुत कुछ बताता है.

(डिस्क्लेमर: लेखक सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ सलाहकार हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)



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