

मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाली जिस मां ने अपने बच्चों को पालने के लिए पूरी जिंदगी खपा दी, उस मां की अंतिम यात्रा में उसके चार में से एक भी बेटा शामिल नहीं हुआ. हालांकि, दिल को झकझोर देने वाली इस घटना के बीच इंसानियत का एक अलग चेहरा भी सामने आया. बुजुर्ग लता बाई के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी एक समाजसेवी संस्था ने निभाई. जिन लोगों ने जीवन के आखिरी समय में उन्हें आठ महीने तक संभाला वे ही उनकी अंतिम विदाई के साथी बने.
आठ महीने से वृद्धाश्रम में रह रहीं थीं
लता बाई की स्थिति की जानकारी जब ‘प्रीयु फाउंडेशन’ के अजय नागदा को मिली, तो उन्होंने उनकी मदद की. मेडिकल जांच के बाद लता बाई को ‘जानकी वृद्धाश्रम’ में आश्रय दिया गया. करीब आठ महीने तक वृद्धाश्रम में उनकी देखभाल होती रही. इस दौरान संस्था के लोग ही उनके साथ परिवार की तरह खड़े रहे.
बेटों ने मुखाग्नि देने से किया इनकार
रीजनल पार्क मुक्तिधाम में किया अंतिम संस्कार
इसके बाद पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने पर प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम ने लता बाई की अंतिम विदाई का जिम्मा उठाया. रीजनल पार्क मुक्तिधाम में पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया. लेकिन, अंतिम यात्रा में शामिल हुए लोगों को भी लता बाई के बेटों के व्यवहार ने झकझोर दिया. उन्होंने कहा था कि जिंदगी भर बच्चों के लिए जीने वाली मां को आखिरी सफर में उसके चार बेटों का कंधा भी नहीं मिल सका.
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